भारत में राष्ट्रीय मीडिया परिषद
डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारिता के विस्तार ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि पत्रकार की पहचान कौन तय करे और क्या सरकारी मान्यता ही पेशेवर पत्रकारिता का आधार होनी चाहिए।
भारत में राष्ट्रीय मीडिया परिषद
- पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — मौलिक अधिकार, मीडिया, शासन, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाएँ।
- स्रोत एवं तिथि: द हिंदू, 26 अक्टूबर 2026।
हालिया संदर्भ
सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले फ्रीलांस और स्वतंत्र पत्रकारों पर हाल में लगाए गए प्रतिबंधों ने एक बुनियादी प्रश्न को फिर से प्रमुख बना दिया है: किसे पत्रकार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए?
प्रेस सूचना ब्यूरो (Press Information Bureau—PIB) या राज्य-स्तरीय मान्यता जैसी सरकारी व्यवस्थाएँ आधिकारिक कार्यक्रमों और सूचनाओं तक पहुँच प्रदान करती हैं, लेकिन हर सक्रिय पत्रकार को ऐसी मान्यता नहीं मिलती। इससे तब कठिनाई पैदा होती है, जब प्रशासन किसी प्रतिबंधित या संवेदनशील स्थान से रिपोर्टिंग की अनुमति तय करने के लिए सरकारी मान्यता को ही व्यावहारिक कसौटी मान लेता है।
पत्रकार कौन है?
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता, 2020 (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020) कार्यरत पत्रकार की व्यापक परिभाषा देती है। इसके तहत वह व्यक्ति, जिसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता है और जो मुद्रित, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल मीडिया में कार्य करता है, निर्धारित वैधानिक शर्तों के अधीन कार्यरत पत्रकार माना जा सकता है।
हालाँकि मीडिया पारितंत्र तेजी से बदल चुका है। स्थापित मीडिया संस्थानों के कर्मचारियों के साथ-साथ अब फ्रीलांसर, स्वतंत्र रिपोर्टर, कैमरा पेशेवर और डिजिटल सामग्री निर्माता भी सक्रिय हैं।
समस्या यह है कि विशेषकर डिजिटल क्षेत्र में पेशेवर पत्रकारिता और सामान्य सामग्री निर्माण के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता जा रहा है।
सरकारी मान्यता और पेशेवर स्थिति एक समान नहीं हैं
सरकारी मान्यता मुख्यतः एक पहुंच व्यवस्था है। यह पात्र पत्रकारों को कुछ आधिकारिक संस्थानों और कार्यक्रमों को कवर करने की सुविधा देती है।
लेकिन मान्यता प्रायः संस्थागत मानदंडों पर निर्भर करती है, जैसे प्रसार संख्या, सब्सक्राइबर आधार, लाइसेंसिंग या डिजिटल पहुँच। इसलिए मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थान में काम करने वाले प्रत्येक पत्रकार को व्यक्तिगत रूप से मान्यता मिले, यह आवश्यक नहीं है।
इसलिए यदि मान्यता को ही पत्रकारिता की एकमात्र पहचान मान लिया जाए, तो वास्तविक पत्रकार केवल इसलिए बाहर हो सकते हैं क्योंकि वे किसी कोटा, संस्थागत ढाँचे या औपचारिक व्यवस्था में शामिल नहीं हैं।
राष्ट्रीय मीडिया परिषद का प्रस्ताव क्यों?
एक राष्ट्रीय मीडिया परिषद मुद्रित, टेलीविज़न और डिजिटल मीडिया में पत्रकारों की पेशेवर पहचान के लिए एक साझा तंत्र उपलब्ध करा सकती है।
इसके संभावित कार्यों में पेशेवर रजिस्टर बनाए रखना, नैतिक मानक तय करना, पहचान-पत्र जारी करना और शिकायतों का निपटारा करना शामिल हो सकता है।
ऐसी व्यवस्था पेशेवर पहचान के लिए सरकारी विभागों पर निर्भरता कम कर सकती है और फ्रीलांस पत्रकारों को अधिक स्पष्ट संस्थागत मार्ग दे सकती है।
लेकिन इससे एक कठिन संवैधानिक प्रश्न भी उठता है: क्या पत्रकारिता को लाइसेंस-आधारित पेशा बनाया जाना चाहिए?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लाइसेंस व्यवस्था को जटिल बनाती है
पत्रकारिता का गहरा संबंध अनुच्छेद 19(1)(क) से है, जो वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
चिकित्सा या विधि जैसे पेशों के विपरीत, सार्वजनिक संचार को केवल लाइसेंस प्राप्त पेशेवरों तक सीमित करना सरल नहीं है। नागरिकों को भी सूचना एकत्र करने, विचार व्यक्त करने और सार्वजनिक घटनाओं का दस्तावेजीकरण करने का अधिकार है।
यदि कोई अनिवार्य लाइसेंस यह तय करने लगे कि कौन रिपोर्ट कर सकता है और कौन नहीं, तो इससे प्रवेश पर बाधा उत्पन्न हो सकती है और प्रेस पर अत्यधिक नियंत्रण का जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए चुनौती यह है कि पेशेवर पहचान तो विकसित हो, लेकिन उसे बोलने या रिपोर्ट करने की अनुमति में न बदला जाए।
मौजूदा संस्थाओं की सीमाएँ
भारत में पहले से भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India) जैसी संस्थाएँ मौजूद हैं, लेकिन उसका कार्यक्षेत्र मुख्यतः प्रेस और पत्रकारिता मानकों पर केंद्रित है। यह पूरे समकालीन मीडिया पारितंत्र को समाहित करने वाली एकीकृत पेशेवर पहचान व्यवस्था नहीं है।
डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारिता और प्लेटफॉर्म-आधारित रिपोर्टिंग ने संस्थागत परिदृश्य को और अधिक खंडित बना दिया है।
इसलिए किसी भी नई परिषद को दोहराव से बचना होगा और मौजूदा विनियामक तथा स्व-विनियामक संस्थाओं के साथ अपने संबंध को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा।
मूल नीतिगत सीख
वास्तविक नीतिगत समस्या केवल यह तय करना नहीं है कि कौन स्वयं को पत्रकार कह सकता है।
भारत को पेशेवर पहचान, पहुँच हेतु सरकारी मान्यता और रिपोर्ट करने व अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता — इन तीनों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।
एक राष्ट्रीय मीडिया परिषद मानकों को बेहतर बना सकती है और फ्रीलांसरों तथा स्वतंत्र पत्रकारों को अधिक औपचारिक पहचान दे सकती है, लेकिन उसे स्वतंत्र, पारदर्शी और इस प्रकार संरचित होना चाहिए कि पंजीकरण या मान्यता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रयोग के लिए लाइसेंस न बन जाए।
संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न
“पत्रकारिता के विनियमन में पेशेवर पहचान और अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।” भारत में राष्ट्रीय मीडिया परिषद के गठन के पक्ष और उससे जुड़ी चिंताओं की चर्चा कीजिए।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
प्रश्न :
पत्रकारिता के विनियमन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पत्रकारिता गतिविधि से संबंधित है।
- कोई पेशेवर मीडिया निकाय सभी अपंजीकृत व्यक्तियों को रिपोर्टिंग से रोकने की शक्ति के बिना भी नैतिक मानक निर्धारित कर सकता है।
- पेशेवर पहचान को बोलने की अनिवार्य अनुमति में बदल देना संवैधानिक चिंताएँ उत्पन्न करेगा।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: D
व्याख्या: पत्रकारिता का गहरा संबंध अनुच्छेद 19(1)(क) से है। एक पेशेवर निकाय नैतिकता और जवाबदेही को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन पंजीकरण को बोलने या रिपोर्ट करने की पूर्व-शर्त बनाना गंभीर संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न करेगा।