लंबित मुकदमे और सजा में असमानता: न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत
न्याय में देरी और असंगत दंड निर्धारण न्याय व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ हैं। बेहतर न्यायिक क्षमता, प्रभावी प्रकरण प्रबंधन और स्पष्ट दंड सिद्धांत अधिक निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित कर सकते हैं।
- हालिया बहस में भारत के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय दंड निर्धारण परिषद पर फिर ध्यान केंद्रित हुआ है। प्रस्ताव का उद्देश्य स्पष्ट दिशानिर्देशों और बेहतर दंड संबंधी आँकड़ों से असंगत सजाओं की समस्या दूर करना है।
- यह दोषसिद्धि के बाद के सुधार से संबंधित है, जबकि न्यायिक लंबितता अनिर्णीत मामलों से जुड़ी है। दोनों न्याय व्यवस्था में जनविश्वास प्रभावित करते हैं।
दोनों चुनौतियों को समझना
- न्यायिक लंबितता का अर्थ निपटारे की प्रतीक्षा कर रहे मुकदमे हैं। न्यायाधीशों के रिक्त पद, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा, प्रक्रियागत जटिलताएँ, बार-बार स्थगन और साक्ष्य जुटाने की कठिनाइयाँ देरी बढ़ाती हैं।
- लंबी मुकदमेबाजी खर्च बढ़ाती है, गवाहों की गवाही कमजोर करती है और राहत मिलने में विलंब करती है। इसके विपरीत, दंड निर्धारण में अपराध सिद्ध होने के बाद सजा तय की जाती है। इसलिए त्वरित निपटारे और न्यायसंगत दंड के लिए परस्पर संबंधित, लेकिन अलग सुधार आवश्यक हैं।
मौजूदा कानूनी सुरक्षा उपाय
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 258(2) के अनुसार, सत्र न्यायाधीश को दोषसिद्धि के बाद सजा के प्रश्न पर अभियुक्त को सुनना होगा, जब तक वह धारा 401 के अंतर्गत कार्रवाई नहीं करता। इससे दोषसिद्ध व्यक्ति को सजा से पहले प्रासंगिक परिस्थितियाँ प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
- धारा 401 पात्र मामलों में परिवीक्षा या भर्त्सना के बाद रिहाई का प्रावधान करती है। धारा 402 के अनुसार, निर्दिष्ट सुधारात्मक विकल्प अपनाए जा सकते थे, लेकिन नहीं अपनाए गए, तो विशेष कारण दर्ज करना आवश्यक है। ये प्रावधान वैधानिक सीमाओं में व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुरूप दंड निर्धारण का महत्त्व दर्शाते हैं।
इंग्लैंड और वेल्स के उदाहरण
- वहाँ दंड निर्धारण परिषद के दिशानिर्देश चरणबद्ध पद्धति अपनाते हैं। न्यायालय इरादे और योजना सहित अपराधी की दोषिता तथा शारीरिक चोट, मानसिक क्षति और आर्थिक नुकसान सहित अपराध से हुई हानि का आकलन करते हैं।
- इसके बाद सजा बढ़ाने और घटाने वाली परिस्थितियों पर विचार होता है। प्रासंगिक दिशानिर्देशों का सामान्यतः पालन आवश्यक है, जब तक ऐसा करना न्यायहित के विरुद्ध न हो। यह पद्धति एकरूपता और व्यक्तिगत परिस्थितियों के विचार को साथ लेकर चलती है।
प्रस्तावित भारतीय ढाँचा
- प्रस्तावित भारतीय परिषद अपराध-विशिष्ट दिशानिर्देश और पहचान गोपनीय रखने वाला दंड संबंधी डेटाबेस विकसित कर सकती है। इसका उद्देश्य न्यायिक विवेक बनाए रखते हुए तर्कों में संगति लाना होगा। यह अभी सुधार का प्रस्ताव है; परिषद स्थापित करने की घोषणा नहीं है।
लंबित मामलों का समाधान
- रिक्त पद भरना, न्यायालयों की सुविधाएँ सुधारना और सुनवाई का बेहतर समय निर्धारण आवश्यक हैं। इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग और डिजिटल अभिलेख प्रशासनिक बाधाएँ कम कर सकते हैं। ई-कोर्ट्स परियोजना के अंतर्गत विकसित राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड लंबित और निपटाए गए मामलों की जानकारी से निगरानी में सहायता करता है।
- इससे बाधाएँ पहचानने और पुराने मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलती है। मध्यस्थता तथा अन्य वैध समझौता तंत्र अपने कानूनी दायरे में उपयुक्त विवादों के समाधान में सहायक हो सकते हैं।
आगे की राह
- सुधारों में समयबद्धता और निष्पक्षता, दोनों का मूल्यांकन होना चाहिए। दंड संबंधी मार्गदर्शन के लिए विश्वसनीय साक्ष्य, न्यायिक प्रशिक्षण, सार्थक सुनवाई और नियमित समीक्षा आवश्यक हैं। प्रशासनिक सुधारों में प्रक्रियागत सुरक्षा बनी रहनी चाहिए।
MCQ - HINDI
प्रश्न - भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- धारा 258(2) सत्र विचारण में दोषसिद्ध अभियुक्त को सजा के प्रश्न पर सुनने का प्रावधान करती है, जब तक न्यायाधीश धारा 401 के अंतर्गत कार्रवाई नहीं करता।
- धारा 402 के अंतर्गत, निर्दिष्ट सुधारात्मक विकल्प लागू किए जा सकते थे, लेकिन नहीं किए गए, तो विशेष कारण दर्ज करना आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c)
व्याख्या: धारा 258(2) निर्दिष्ट अपवाद के अधीन सजा पर सुनवाई का प्रावधान करती है। धारा 402 लागू होने योग्य निर्दिष्ट सुधारात्मक विकल्प नहीं अपनाने पर विशेष कारण दर्ज करना अनिवार्य बनाती है।