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Current Affairs - Daily 30 अक्टूबर 2026

जीन एडिटिंग और भारत की नई फसल क्रांति

नई जीन एडिटिंग तकनीकें भारत को अधिक उत्पादक, जलवायु-सहिष्णु और संसाधन-कुशल धान और गेहूं विकसित करने का अवसर देती हैं। एपोमिक्सिस जैसी तकनीकें किसानों को hybrid vigour वाले बीज दोबारा उपयोग करने में भी सक्षम बना सकती हैं।

जीन एडिटिंग और भारत की नई फसल क्रांति

  • पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — जैव प्रौद्योगिकी, कृषि, खाद्य सुरक्षा, जलवायु-सहिष्णु खेती तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी।
  • स्रोत एवं तिथि: द हिंदू, 29 अक्टूबर 2026।

हालिया संदर्भ

भारत प्रमुख खाद्य फसलों, विशेषकर धान, में सुधार के लिए CRISPR जैसी जीन एडिटिंग तकनीकों का तेजी से उपयोग कर रहा है, जबकि एपोमिक्सिस (Apomixis) जैसी नई तकनीकों पर शोध भविष्य में बीज उत्पादन की व्यवस्था को और बदल सकता है।

व्यापक नीतिगत मुद्दा यह है कि धान और गेहूं भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए केंद्रीय महत्त्व रखते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन, जल संकट, मृदा क्षरण तथा उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम करने की आवश्यकता के कारण फसलों की नई पीढ़ी विकसित करना आवश्यक हो गया है।

जीन एडिटिंग और ट्रांसजेनिक GM एक समान नहीं हैं

जीन एडिटिंग वैज्ञानिकों को किसी पौधे के अपने DNA में लक्षित परिवर्तन करने की अनुमति देती है।

पारंपरिक ट्रांसजेनिक आनुवंशिक संशोधन के विपरीत, कुछ CRISPR-संपादित पौधों की अंतिम किस्म में बाहरी आनुवंशिक सामग्री मौजूद नहीं रहती। भारत की नई धान किस्मों में जीन एडिटिंग उपकरणों के अवशेष नहीं पाए गए। इससे अंतिम आनुवंशिक परिवर्तन उन उत्परिवर्तनों के समान हो जाते हैं, जो पारंपरिक प्रजनन के माध्यम से भी उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन जीन एडिटिंग इन्हें कहीं अधिक तेजी और सटीकता से संभव बनाती है।

यह अंतर विनियमन, जनस्वीकृति और उन्नत फसल किस्मों को किसानों तक पहुँचाने की गति के लिए महत्त्वपूर्ण है।

भारत की जीन-संपादित धान में उपलब्धि

भारत ने 2025 में जीन-संपादित धान किस्मों की खेती की अनुमति देकर एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया।

इसके दो प्रमुख उदाहरण DRR धान 100 और पूसा DST राइस 1 हैं। पहली किस्म को जल्दी पकने और अनाज उत्पादकता बढ़ाने के लिए विकसित किया गया, जबकि दूसरी को लवणीय और क्षारीय मिट्टी में बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार किया गया।

इन संपादित किस्मों से अधिक उपज, कम जल आवश्यकता तथा उर्वरक उपयोग और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में संभावित कमी जुड़ी हुई है।

मौलिक अनुसंधान अभी भी क्यों महत्त्वपूर्ण है?

CRISPR एक उपकरण है, मौलिक विज्ञान का विकल्प नहीं।

धान के उदाहरण इसलिए संभव हुए क्योंकि शोधकर्ता पादप आनुवंशिकी और विकास संबंधी पूर्ववर्ती अनुसंधान के माध्यम से बालियों के निर्माण, दानों की संख्या और लवण सहनशीलता को प्रभावित करने वाले जीन पहले ही पहचान चुके थे।

पुष्पन, पादप शरीर क्रिया विज्ञान, मेजबान-रोगजनक अंतःक्रिया और तनाव जीवविज्ञान जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक शोध के बिना सटीक जीन एडिटिंग के पास उपयोगी लक्ष्य ही सीमित होंगे।

एपोमिक्सिस क्या है?

एपोमिक्सिस (Apomixis) अलैंगिक बीज उत्पादन की वह प्रक्रिया है, जिसमें पौधे सामान्य लैंगिक निषेचन की प्रक्रिया के बिना प्रजनन करते हैं।

कृषि की दृष्टि से इसका महत्त्व बहुत बड़ा है, क्योंकि यह संकर ओज या हाइब्रिड विगर (Hybrid Vigour/Heterosis) को कई पीढ़ियों तक बनाए रखने में सक्षम हो सकती है। सामान्यतः किसान संकर बीज को बचाकर अगली पीढ़ी में वही प्रदर्शन प्राप्त नहीं कर सकते।

एपोमिक्सिस के माध्यम से उच्च प्रदर्शन वाला संकर पौधा बीज के माध्यम से प्रभावी रूप से अपनी आनुवंशिक प्रतिकृति तैयार कर सकता है।

इस तकनीक का सफल प्रदर्शन पहली बार 2018 में धान में किया गया था और तब से इसकी दक्षता में काफी सुधार हुआ है। शोध समूह मक्का और ज्वार जैसी फसलों में भी इस तकनीक की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं।

भारत की सार्वजनिक बीज प्रणाली क्यों महत्त्वपूर्ण है?

भारत में धान और गेहूं प्रजनन में सार्वजनिक क्षेत्र की मजबूत उपस्थिति है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research—ICAR) की प्रयोगशालाएँ, राज्य कृषि विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय बीज निगम (National Seeds Corporation) ब्रीडर बीज विकसित करने तथा उन्नत किस्मों के बीज गुणन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। निजी कंपनियाँ भी भाग लेती हैं, विशेषकर संकर धान और बढ़ते हुए गेहूं क्षेत्र में।

यह संस्थागत संरचना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित जीन-संपादित किस्मों को संभावित रूप से प्रतिबंधात्मक लाइसेंस व्यवस्था के बिना व्यापक स्तर पर वितरित किया जा सकता है।

गेहूं अगली चुनौती है

भारत ने अभी तक कोई जीन-संपादित गेहूं किस्म जारी नहीं की है।

धान या मक्का जैसी फसलों की तुलना में गेहूं में संकरण जैविक रूप से अधिक कठिन है, लेकिन विश्व स्तर पर शोध तेजी से आगे बढ़ रहा है। अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में सूखा-सहिष्णु आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित गेहूं तथा CRISPR-संपादित गेहूं किस्मों पर चल रहे कार्य का उल्लेख किया गया है।

भारत के लिए रणनीतिक अवसर यह है कि वह अपने मजबूत सार्वजनिक प्रजनन नेटवर्क को नई जीन एडिटिंग तकनीकों के साथ जोड़े।

मूल नीतिगत सीख

कृषि जैव प्रौद्योगिकी का अगला चरण केवल “GM फसलें” विकसित करने तक सीमित नहीं है।

यह सटीक जीन एडिटिंग, मौलिक पादप विज्ञान, जलवायु-सहिष्णु प्रजनन और एपोमिक्सिस जैसी नवाचारी प्रजनन तकनीकों के उपयोग के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने के साथ जल, उर्वरक और कीटनाशक उपयोग की तीव्रता कम करने से जुड़ा है।

भारत की प्रमुख ताकत उसकी व्यापक सार्वजनिक अनुसंधान और बीज-वितरण प्रणाली है। लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब मौलिक पादप-विज्ञान अनुसंधान युवा वैज्ञानिकों के लिए आकर्षक बना रहे और प्रयोगशाला की खोजों को खेत परीक्षण, विनियमन तथा बीज गुणन के माध्यम से कुशलतापूर्वक किसानों तक पहुँचाया जा सके।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“खाद्य सुरक्षा का भविष्य केवल जैव प्रौद्योगिकी उपकरणों पर नहीं, बल्कि मजबूत मौलिक पादप विज्ञान और सार्वजनिक प्रजनन संस्थानों पर भी निर्भर करेगा।” भारतीय कृषि में जीन एडिटिंग और एपोमिक्सिस के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

फसलों में जीन एडिटिंग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. CRISPR का उपयोग किसी पौधे के अपने जीनोम में लक्षित परिवर्तन करने के लिए किया जा सकता है।
  2. प्रत्येक जीन-संपादित फसल की अंतिम अवस्था में अनिवार्य रूप से कोई विदेशी जीन मौजूद होता है।
  3. जीन एडिटिंग ऐसे उपयोगी उत्परिवर्तन उत्पन्न कर सकती है, जिन्हें पारंपरिक प्रजनन से प्राप्त करने में कहीं अधिक समय लग सकता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1
B. केवल 1 और 3
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: जीन एडिटिंग मूल जीन में सटीक परिवर्तन कर सकती है और कुछ संपादित फसलों की अंतिम किस्म में विदेशी आनुवंशिक सामग्री मौजूद नहीं होती। इसलिए यह पारंपरिक प्रजनन की तुलना में उपयोगी उत्परिवर्तन कहीं अधिक तेजी से उत्पन्न कर सकती है।

प्रश्न 2

एपोमिक्सिस के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह सामान्य लैंगिक निषेचन प्रक्रिया के बिना बीज निर्माण की अनुमति देती है।
  2. यह कई पीढ़ियों तक संकर ओज को बनाए रखने में संभावित रूप से सक्षम हो सकती है।
  3. इसके उपयोग में किसानों को प्रत्येक मौसम में नया संकर बीज खरीदना अनिवार्य होता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: एपोमिक्सिस पौधे को सामान्य निषेचन के बिना आनुवंशिक रूप से समान बीज उत्पन्न करने की अनुमति दे सकती है। यदि इसे फसलों में सफलतापूर्वक लागू किया जाए, तो यह संकर ओज को बनाए रख सकती है और किसानों की बार-बार नया संकर बीज खरीदने की आवश्यकता कम कर सकती है।