सार्वजनिक परिसंपत्तियों का विनिवेश: दक्षता, पारदर्शिता और जनहित के नैतिक प्रश्न
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के सुधारों, अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री और रणनीतिक विनिवेश प्रस्तावों ने सार्वजनिक संपदा के नैतिक प्रबंधन पर चर्चा को फिर उभारा है। केंद्रीय बजट 2026–27 और नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति के संदर्भ में प्रमुख प्रश्न यह है कि विनिवेश से राजकोषीय दक्षता बढ़ाते हुए पारदर्शिता, न्यायसंगत मूल्यांकन, कर्मचारियों के हित और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
सार्वजनिक परिसंपत्तियों के विनिवेश से जुड़े नैतिक प्रश्न
- भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के पुनर्गठन, अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री और रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया ने सार्वजनिक सम्पत्तियों के नैतिक प्रबन्धन का प्रश्न फिर से प्रासंगिक बना दिया है।
- केन्द्रीय बजट 2026–27 तथा सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति, 2021 के परिप्रेक्ष्य में यह विचारणीय है कि क्या सार्वजनिक सम्पत्तियों का हस्तान्तरण वित्तीय दक्षता, पारदर्शिता, सामाजिक न्याय और दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों के बीच उचित सन्तुलन स्थापित कर सकता है।
विनिवेश क्या है?
- विनिवेश सार्वजनिक उद्यमों में सरकारी इक्विटी की आंशिक अथवा पूर्ण बिक्री है। अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री में सामान्यतः प्रबन्धकीय नियन्त्रण बना रहता है, जबकि रणनीतिक विनिवेश में नियन्त्रण हस्तान्तरित हो सकता है।
- परिसम्पत्ति मुद्रीकरण में निश्चित अवधि की लीज अथवा रियायत द्वारा स्थायी स्वामित्व हस्तान्तरण के बिना भी आर्थिक मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए विनिवेश, निजीकरण और मुद्रीकरण का अन्तर महत्वपूर्ण है।
संवैधानिक एवं कानूनी आधार
- संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक-आर्थिक न्याय तथा अनुच्छेद 38 में लोककल्याण सार्वजनिक सम्पत्तियों के प्रबन्धन को नैतिक आधार प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 39(b) समुदाय के भौतिक संसाधनों के स्वामित्व एवं नियन्त्रण के सार्वजनिक हित में वितरण से सम्बन्धित है; प्रत्येक निजी सम्पत्ति स्वतः सामुदायिक संसाधन नहीं है।
- अनुच्छेद 298 सरकारी व्यापार और सम्पत्ति के निपटान तथा अनुच्छेद 299 सरकारी अनुबन्धों से सम्बन्धित है। कम्पनी अधिनियम, 2013, प्रतिभूति विनियमन एवं उद्यम-विशेष कानून भी लागू हो सकते हैं। BALCO Employees’ Union v. Union of India (2002) में सर्वोच्च न्यायालय ने आर्थिक नीतिगत निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ रेखांकित कीं।
संवैधानिक नैतिकता
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आँकड़े एवं नीतिगत पृष्ठभूमि
- DIPAM के अनुसार विनिवेश प्राप्तियाँ 2022–23 में ₹35,294 करोड़, 2023–24 में ₹16,507·29 करोड़, 2024–25 में ₹10,163·02 करोड़ तथा 2025–26 में ₹16,885·56 करोड़ थीं।
- यह उतार-चढ़ाव बताता है कि विनिवेश को नियमित राजस्व-स्रोत नहीं मानना चाहिए। 4 फरवरी, 2021 की नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति चार रणनीतिक क्षेत्र-समूहों में सरकार की न्यूनतम आवश्यक उपस्थिति तथा गैर-रणनीतिक उद्यमों के सम्भावित निजीकरण या समापन की परिकल्पना करती है। कुछ सामाजिक तथा विकासात्मक उद्यम इसके दायरे से बाहर हैं।
नैतिक महत्व एवं बहुआयामी विश्लेषण
- उपयोगितावादी दृष्टिकोण से विनिवेश उत्पादकता, निवेश, प्रतिस्पर्द्धा और सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर जनकल्याण कर सकता है। घाटे वाले उद्यमों पर व्यय कम होने से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आधारभूत संरचना के लिए संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। किन्तु सार्वजनिक उद्यमों का मूल्य केवल वित्तीय लाभ नहीं है; सस्ती सेवाएँ, रोजगार, क्षेत्रीय विकास और रणनीतिक आत्मनिर्भरता भी महत्वपूर्ण हैं।
- अवमूल्यन, सीमित बोली, हितों का टकराव और सूचना की असमानता सामूहिक सम्पदा से अनुचित निजी लाभ उत्पन्न कर सकते हैं। दूसरी ओर, बिना सुधार अक्षम उद्यम बनाए रखना भी करदाताओं के प्रति अन्यायपूर्ण है।
उदाहरण एवं सरकारी पहल
- जनवरी 2022 में एयर इंडिया का टाटा समूह को हस्तान्तरण नियन्त्रण परिवर्तन सहित रणनीतिक विनिवेश का उदाहरण है। मई 2022 में LIC की सूचीबद्धता अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री का उदाहरण है, जिसमें सरकारी नियन्त्रण समाप्त नहीं हुआ।
- DIPAM विनिवेश एवं सरकारी इक्विटी प्रबन्धन में मूल्यांकन, स्वीकृति और प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली जैसी प्रक्रियाओं का समन्वय करता है। राष्ट्रीय निवेश कोष की व्यवस्था के अन्तर्गत प्राप्तियों का उपयोग संसदीय विनियोजन के अनुसार सार्वजनिक उद्देश्यों में होता है।
नैतिक सिद्धान्त
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चुनौतियाँ और अन्तरपीढ़ी न्याय
- एकमुश्त बिक्री-मूल्य की तुलना भविष्य के लाभांश, रणनीतिक नियन्त्रण और सामाजिक सेवाओं के मूल्य से करनी चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों, महत्वपूर्ण अवसंरचना और एकाधिकार-सदृश क्षेत्रों में निजी आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण चिंता का विषय हो सकता है।
- सार्वजनिक एकाधिकार का निजी एकाधिकार में बदलना स्वतः उपभोक्ता-कल्याण नहीं बढ़ाता। कर्मचारियों और स्थानीय समुदायों पर असमान संक्रमण-लागत पड़ सकती है। सार्वजनिक परिसम्पत्तियाँ पिछली पीढ़ियों के कर, श्रम और निवेश से निर्मित पूँजी भी हैं; उनका उपयोग भावी पीढ़ियों के अधिकारों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
आगे की राह
- प्रत्येक प्रमुख विनिवेश से पहले स्वतंत्र मूल्यांकन, वास्तविक प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली, जनहित प्रभाव आकलन तथा सूचनाओं का पर्याप्त प्रकटीकरण आवश्यक है। प्राप्तियों को प्राथमिकता से टिकाऊ उत्पादक सम्पत्तियों के निर्माण अथवा भावी करदाताओं का बोझ घटाने में लगाया जाना चाहिए।
- कर्मचारियों के पुनःकौशल विकास, सामाजिक सुरक्षा, प्रतिस्पर्द्धा विनियमन, संसदीय निगरानी और विनिवेश-पश्चात् प्रदर्शन समीक्षा से निर्णय अधिक उत्तरदायी होंगे। अधिकतम प्रारम्भिक बिक्री-मूल्य के स्थान पर दीर्घकालीन सार्वजनिक मूल्य मानदण्ड होना चाहिए।
प्रश्न. भारत में विनिवेश के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
1. अल्पांश हिस्सेदारी के विनिवेश में सरकार से क्रेता को प्रबन्धकीय नियन्त्रण का हस्तान्तरण अनिवार्य होता है।
2. नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति, 2021 में निर्धारित रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की न्यूनतम आवश्यक उपस्थिति बनाए रखने की परिकल्पना है।
3. संविधान का अनुच्छेद 299 संघ अथवा राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में किए जाने वाले सरकारी अनुबन्धों की आवश्यकताओं से सम्बन्धित है।
4. सार्वजनिक परिसम्पत्ति मुद्रीकरण में अवसंरचना का स्वामित्व निजी संस्थाओं को स्थायी रूप से हस्तान्तरित करना अनिवार्य है।
कूट
(A) केवल 1 और 4
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1, 2 और 3
(D) केवल 2, 3 और 4
उत्तर—(B)
व्याख्या— कथन 2 और 3 सही हैं। अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री में सामान्यतः नियन्त्रण नहीं बदलता, इसलिए कथन 1 गलत है। निश्चित अवधि की लीज या रियायत द्वारा स्वामित्व के स्थायी हस्तान्तरण के बिना मुद्रीकरण सम्भव है, इसलिए कथन 4 भी गलत है।
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