बौद्ध कूटनीति: राजनीतिक वार्ता रुकने पर भी संवाद की राह
बौद्ध कूटनीति साझा धार्मिक विरासत, पवित्र स्थलों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने का साधन है।
बौद्ध कूटनीति—राजनीतिक वार्ताओं में गतिरोध के बीच संवाद बनाए रखने का माध्यम
बौद्ध कूटनीति का आशय साझा बौद्ध विरासत, दर्शन, पवित्र स्थलों तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को सुदृढ़ करना है। यह सॉफ्ट पावर (Soft Power) का एक महत्वपूर्ण साधन है, जिसमें बल प्रयोग के बजाय सांस्कृतिक आकर्षण एवं विश्वास के माध्यम से प्रभाव स्थापित किया जाता है।
बौद्ध धर्म के करुणा, अहिंसा, मध्यम मार्ग एवं शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय संवाद और संघर्ष समाधान को नैतिक आधार प्रदान करते हैं।
बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से तीन—बोधगया (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (प्रथम उपदेश) तथा कुशीनगर (महापरिनिर्वाण)—भारत में, जबकि लुम्बिनी (जन्मस्थल) नेपाल में स्थित है।
ऐतिहासिक विकास
सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में धर्मदूतों, स्तूपों तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण उपयोग किया। नालन्दा एवं विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय एशियाई देशों के साथ बौद्धिक सम्बन्धों के प्रमुख केन्द्र बने।
स्वतन्त्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू ने बौद्ध विरासत का उपयोग एशियाई एकजुटता बढ़ाने के लिए किया। वर्ष 1956 में बुद्ध जयन्ती समारोहों में व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय भागीदारी रही। वर्ष 1959 में दलाई लामा को भारत में शरण दिए जाने से तिब्बती बौद्ध समुदायों के साथ भारत के सम्बन्ध सुदृढ़ हुए।
भारत की बौद्ध कूटनीति के प्रमुख साधन
सांस्कृतिक कूटनीति: अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों, पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनियों, बोधिवृक्ष के पौधों के आदान-प्रदान तथा मठों के माध्यम से सद्भावना का विस्तार।
धार्मिक पर्यटन: बौद्ध परिपथ, महापरिनिर्वाण एक्सप्रेस तथा तीर्थस्थलों के विकास से पर्यटन और जन-सम्पर्क को बढ़ावा।
शैक्षणिक सहयोग: नालन्दा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010 के तहत् स्थापित आधुनिक नालन्दा विश्वविद्यालय द्वारा शोध एवं अन्तर्राष्ट्रीय शैक्षणिक साझेदारी को प्रोत्साहन।
बहुपक्षीय सहयोग: अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के सहयोग से आयोजित वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन (2023 एवं 2026) के माध्यम से समकालीन वैश्विक समस्याओं पर संवाद।
क्षेत्रीय सम्पर्क: साझा बौद्ध विरासत भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ तथा श्रीलंका, नेपाल, भूटान, थाईलैण्ड, म्याँमार, जापान एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ सम्बन्धों को सुदृढ़ करती है।
भू-राजनीतिक आयाम एवं चुनौतियाँ
तिब्बत, लद्दाख, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश सहित हिमालयी क्षेत्रों में बौद्ध धर्म का रणनीतिक महत्व बढ़ा है। भारत और चीन के बीच तिब्बती बौद्ध संस्थानों तथा दलाई लामा के उत्तराधिकार के प्रश्न पर प्रभाव स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा विद्यमान है।
अन्य चुनौतियों में तीर्थस्थलों पर अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा, सांस्कृतिक पहलों में समन्वय की कमी, विरासत संरक्षण सम्बन्धी समस्याएँ तथा धार्मिक परम्पराओं के राजनीतिकरण का जोखिम शामिल हैं।
आगे की राह
भारत को बौद्ध विरासत संरक्षण, तीर्थयात्रा सुविधाओं, छात्रवृत्तियों, बौद्ध ग्रन्थों के अनुवाद तथा थेरवाद, महायान और वज्रयान परम्पराओं के बीच सहयोग बढ़ाना चाहिए। भिक्षुओं, विद्वानों तथा नागरिक संगठनों के माध्यम से ट्रैक-II कूटनीति को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
MCQ
प्रश्न. बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों के सम्बन्ध में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए -
बौद्ध तीर्थस्थल | सम्बन्धित घटना |
1. लुम्बिनी | गौतम बुद्ध का जन्म |
2. बोधगया | ज्ञान प्राप्ति |
3. सारनाथ | प्रथम उपदेश |
4. कुशीनगर | महापरिनिर्वाण |
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
(A) केवल एक
(B) केवल दो
(C) केवल तीन
(D) सभी चार
उत्तर—(D) सभी चार
व्याख्या: नेपाल स्थित लुम्बिनी गौतम बुद्ध का जन्मस्थल है। बिहार का बोधगया उनका ज्ञान प्राप्ति स्थल, उत्तर प्रदेश का सारनाथ प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) का स्थल तथा कुशीनगर महापरिनिर्वाण स्थल है। इस प्रकार बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से तीन भारत में स्थित हैं।