जलकुंभी का तेजी से फैलाव: जलीय जैव विविधता और आजीविका के लिए खतरा
मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में तेजी से फैलने के कारण जलकुंभी चर्चा में है।
जलकुम्भी (Water Hyacinth)
जलकुम्भी मीठे पानी के जल निकायों में तेजी से फैलने तथा जलीय जैव विविधता, जल गुणवत्ता एवं स्थानीय आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के कारण चर्चा में है।
प्रमुख विशेषताएँ
वैज्ञानिक नाम: Pontederia crassipes (पूर्व नाम—Eichhornia crassipes)।
कुल: पॉन्टेडेरिएसी (Pontederiaceae)।
मूल क्षेत्र: उष्णकटिबन्धीय दक्षिण अमेरिका, विशेषकर अमेजन बेसिन।
आवास: झीलों, तालाबों, नदियों एवं आर्द्रभूमियों में पाई जाने वाली मुक्त रूप से तैरने वाली बहुवर्षीय जलीय वनस्पति।
पहचान: चमकदार पत्तियाँ, वायु से भरे फूले हुए पर्णवृन्त, रेशेदार जड़ें तथा बैंगनी-नीले पुष्प।
प्रजनन: बीजों तथा वानस्पतिक प्रजनन (स्टोलॉन) द्वारा फैलती है। अनुकूल परिस्थितियों में इसकी संख्या लगभग दो सप्ताह में दोगुनी हो सकती है।
पारिस्थितिक एवं आर्थिक प्रभाव
जलकुम्भी विश्व की सर्वाधिक आक्रामक जलीय वनस्पतियों में शामिल है। इसकी घनी तैरती परत सूर्यप्रकाश को अवरुद्ध करती है, जल में घुलित ऑक्सीजन घटाती है तथा स्थानीय जलीय वनस्पतियों की वृद्धि रोकती है। इसके अपघटन से ऑक्सीजन की और कमी होती है, जिससे मछलियों की मृत्यु हो सकती है।
यह सिंचाई नहरों, मत्स्य पालन, नौपरिवहन एवं जल परिवहन में बाधा उत्पन्न करती है। साथ ही बाढ़ का जोखिम तथा मच्छरों के प्रजनन के अनुकूल परिस्थितियाँ बढ़ाती है।
विशेषकर नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस से होने वाला पोषक तत्त्व प्रदूषण इसके प्रसार को तीव्र करता है।
नियन्त्रण एवं भारत के लिए महत्व
इसके नियन्त्रण हेतु समेकित प्रबन्धन आवश्यक है, जिसमें यान्त्रिक निष्कासन, Neochetina घुनों द्वारा जैविक नियन्त्रण, अपशिष्ट जल उपचार तथा पोषक प्रदूषण में कमी शामिल हैं।
नियन्त्रित परिस्थितियों में जलकुम्भी का कम्पोस्ट, बायोगैस एवं हस्तशिल्प निर्माण में उपयोग चक्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित कर सकता है।
भारत में इसका अनियन्त्रित प्रसार आर्द्रभूमियों, मत्स्य संसाधनों तथा जल सुरक्षा के लिए चुनौती है। इसलिए शीघ्र पहचान, सामुदायिक भागीदारी एवं सतत् निगरानी महत्वपूर्ण हैं।
MCQ
प्रश्न. जलकुम्भी (Water Hyacinth) के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
यह दक्षिण अमेरिका की मूल निवासी मुक्त रूप से तैरने वाली जलीय वनस्पति है।
इसका स्वीकृत वैज्ञानिक नाम Pontederia crassipes है, जबकि Eichhornia crassipes इसका पर्याय वैज्ञानिक नाम है।
इसका सघन प्रसार जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है।
इसके जैविक नियन्त्रण हेतु Neochetina वंश के घुनों का उपयोग किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौनसे सही हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1, 2 और 4
(D) 1, 2, 3 और 4
उत्तर—(C)
व्याख्या: जलकुम्भी दक्षिण अमेरिका की मूल निवासी आक्रामक जलीय वनस्पति है। इसका अत्यधिक प्रसार सूर्यप्रकाश को अवरुद्ध करता है तथा घुलित ऑक्सीजन में कमी लाकर जलीय जीवों को प्रभावित करता है। Neochetina घुनों का उपयोग इसके जैविक नियन्त्रण में किया जाता है।
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2026 का बैलन डी’ओर पुरस्कार (खेल एवं पुरस्कार) | इंग्लैंड के हैरी केन ने पुरुष वर्ग और स्पेन की एलेक्सिया पुटेलास ने महिला वर्ग का बैलन डी’ओर पुरस्कार जीता — फुटबॉल के प्रतिष्ठित बैलन डी’ओर (Ballon d’Or) पुरस्कार 2026 के विजेताओं की घोषणा 26 अक्टूबर, 2026 को लन्दन के लन्दन पैलेडियम थिएटर में आयोजित समारोह में की गई। यह पुरस्कार समारोह का 70वाँ संस्करण था। पुरुष वर्ग में इंग्लैंड के कप्तान एवं बायर्न म्यूनिख क्लब के स्ट्राइकर हैरी केन विजेता बने। 33 वर्षीय केन वर्ष 2001 में माइकल ओवेन के बाद यह पुरस्कार जीतने वाले पहले इंग्लिश फुटबॉलर हैं। उन्होंने 2025-26 के सत्र में क्लब और राष्ट्रीय टीम की ओर से कुल 73 गोल किए। पुरुष वर्ग में फ्रांस के किलियन एम्बाप्पे दूसरे तथा स्पेन के लामिन यमाल तीसरे स्थान पर रहे। महिला वर्ग का पुरस्कार स्पेन की एलेक्सिया पुटेलास ने तीसरी बार जीता। इससे पूर्व वह 2021 और 2022 में भी यह सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं। महिला वर्ग में पोलैण्ड की ईवा पायोर उपविजेता रहीं। अन्य प्रमुख पुरस्कारों में पुरुष युवा प्रतिभा का सम्मान लामिन यमाल तथा महिला युवा प्रतिभा का सम्मान विकी लोपेज को मिला। सर्वश्रेष्ठ पुरुष गोलकीपर उनाई सिमोन और महिला गोलकीपर काटा कोल चुनी गईं। पुरुष और महिला वर्ग के सर्वश्रेष्ठ क्लब क्रमशः पेरिस सेंट-जर्मेन तथा बार्सिलोना रहे। बैलन डी’ओर पुरस्कार की शुरुआत 1956 में फ्रांस की पत्रिका 'फ्रांस फुटबॉल' ने की थी। इसके प्रथम विजेता इंग्लैंड के स्टेनली मैथ्यूज थे। वर्ष 2024 से इसका संयुक्त आयोजन फ्रांस फुटबॉल और यूईएफए (UEFA) करते हैं। वर्ष 2026 में पहली बार यह समारोह लन्दन में आयोजित हुआ। |
ऑपरेशन ट्राइडेंट (आन्तरिक सुरक्षा) | पूर्वोत्तर भारत में अन्तर्राष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी और हवाला नेटवर्क के विरुद्ध ऑपरेशन ट्राइडेंट — नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने 23 अक्टूबर, 2026 को असम, मिजोरम और मणिपुर में अन्तर्राष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी एवं अवैध वित्तीय लेन-देन से जुड़े नेटवर्क के विरुद्ध ऑपरेशन ट्राइडेंट चलाया। इस अभियान में मिजोरम पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय (ED) तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने सहयोग किया। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की 25 अक्टूबर की विज्ञप्ति के अनुसार, 38 संयुक्त टीमों ने तीनों राज्यों के 38 ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई की। अभियान में लगभग ₹100 करोड़ के हवाला लेन-देन का पता चला। इसके अतिरिक्त 1,424 बैंक खाते फ्रीज, ₹17·82 करोड़ की सम्पत्तियाँ कुर्क तथा ₹12 लाख नकद एवं 500 डेटोनेटर जब्त किए गए। कुल 18 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। जाँच में सामने आया कि तस्करी नेटवर्क म्याँमार से मेथाम्फेटामाइन और हेरोइन को मिजोरम, मणिपुर, असम और त्रिपुरा के रास्ते भारत के अन्य हिस्सों तथा बांग्लादेश तक पहुँचाता था। कार्रवाई के प्रमुख क्षेत्रों में आइजोल, चम्फाई, जोखावथार, चुराचाँदपुर और कछार शामिल थे। अभियान का उद्देश्य केवल मादक पदार्थ जब्त करना नहीं, बल्कि तस्करों की आपूर्ति शृंखला, वित्तीय तन्त्र और सम्पत्तियों को निशाना बनाना भी था। यह मादक पदार्थ नियन्त्रण सम्बन्धी विजन दस्तावेज (2026-2029) के अनुरूप है, जिसके तहत् 31 दिसम्बर, 2029 तक मादक पदार्थों के नेटवर्क समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। उल्लेखनीय है कि यह अभियान भारतीय नौसेना के वर्ष 1971 के ऑपरेशन ट्राइडेंट से अलग है। |
27 अक्टूबर : भारतीय सेना का इन्फैंट्री दिवस (महत्त्वपूर्ण दिवस) | भारतीय सेना ने 27 अक्टूबर को इन्फैंट्री दिवस मनाया; 1947 के ऐतिहासिक श्रीनगर सैन्य अभियान की स्मृति — भारतीय सेना प्रतिवर्ष 27 अक्टूबर को इन्फैंट्री दिवस (Infantry Day) मनाती है। यह दिवस भारतीय पैदल सेना के साहस, कर्तव्यनिष्ठा, बलिदान और राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। इसका ऐतिहासिक सम्बन्ध 27 अक्टूबर, 1947 से है, जब भारतीय सेना की प्रथम बटालियन, सिख रेजिमेंट (1 SIKH) के सैनिक श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरे थे। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के बाद स्थिति गम्भीर हो गई थी। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए। इसके अगले दिन भारतीय सैनिकों को तत्काल श्रीनगर भेजा गया। सैनिकों को डकोटा डीसी-3 (Dakota DC-3) परिवहन विमानों से पहुँचाया गया। इस अभियान ने श्रीनगर हवाई अड्डे की सुरक्षा और अतिरिक्त सैनिकों तथा सैन्य सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारम्भिक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रणजीत राय ने किया था, जो बाद में युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। पैदल सेना थल सेना का प्रमुख युद्धक अंग है, जो सीमाओं की रक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियानों, पर्वतीय युद्ध एवं प्रत्यक्ष जमीनी अभियानों में भूमिका निभाता है। वर्ष 2026 में भारतीय सेना ने 80वाँ इन्फैंट्री दिवस मनाया। उल्लेखनीय है कि भारतीय सेना दिवस 15 जनवरी को मनाया जाता है, जिसका सम्बन्ध वर्ष 1949 में जनरल के. एम. करियप्पा के भारतीय सेना के प्रथम भारतीय कमांडर-इन-चीफ बनने से है। |
कर्नाटक की प्रथम राज्योत्सव पक्षी गणना (पर्यावरण एवं जैव विविधता) | कर्नाटक में 30 अक्टूबर से 2 नवम्बर तक पहली राज्योत्सव पक्षी गणना का आयोजन — कर्नाटक में जैव विविधता के संरक्षण और पक्षियों की प्रजातियों का व्यवस्थित अभिलेखन करने के उद्देश्य से प्रथम कर्नाटक राज्योत्सव पक्षी गणना (Karnataka Rajyotsava Bird Count–KRBC) का आयोजन 30 अक्टूबर से 2 नवम्बर, 2026 तक किया जाएगा। यह पहल बर्ड काउंट इंडिया (Bird Count India) और कर्नाटक बर्ड मॉनिटरिंग नेटवर्क (KBMN) से जुड़े पक्षी प्रेमियों तथा नागरिक वैज्ञानिकों की भागीदारी पर आधारित है। यह आयोजन 1 नवम्बर को मनाए जाने वाले कर्नाटक राज्योत्सव के अवसर पर किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि 1 नवम्बर, 1956 को कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के पुनर्गठन से मैसूर राज्य का गठन हुआ था, जिसका नाम 1973 में कर्नाटक रखा गया। इस पक्षी गणना का उद्देश्य पश्चिमी घाट के वनों, दक्कन के झाड़ीदार क्षेत्रों, तटीय आर्द्रभूमियों, कृषि क्षेत्रों तथा शहरी झीलों सहित राज्य के विभिन्न आवासों में पक्षियों का अभिलेखन करना है। इसमें पक्षी प्रेमी, विद्यार्थी और अन्य नागरिक भाग ले सकते हैं। प्रतिभागियों को कम-से-कम 15 मिनट पक्षी अवलोकन करना होगा तथा देखी गई प्रजातियों और उनकी संख्या का विवरण ईबर्ड (eBird) मोबाइल एप पर दर्ज करना होगा। सूची जमा करने की अन्तिम तिथि 10 नवम्बर, 2026 है। आयोजकों ने तीन विशेष चुनौतियाँ निर्धारित की हैं, जिनमें अधिकाधिक जिलों, कम आँकड़ों वाले क्षेत्रों और पहले से अभिलेखित न किए गए पाँच किलोमीटर ग्रिड क्षेत्रों को सम्मिलित करना है। यह नागरिक विज्ञान (Citizen Science) का उदाहरण है, जिसमें सामान्य नागरिक वैज्ञानिक आँकड़े एकत्र करने में योगदान देते हैं। यह सरकारी वन्यजीव जनगणना के बजाय समुदाय-आधारित पक्षी निगरानी पहल है। |
कुफरी जामुनिया : भारत का जैव-संवर्द्धित बैंगनी आलू (कृषि एवं विज्ञान) | ICAR द्वारा विकसित कुफरी जामुनिया आलू की किस्म पोषण सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण — भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् (ICAR) के अन्तर्गत केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान (CPRI), शिमला द्वारा विकसित पोषक तत्त्वों से समृद्ध बैंगनी आलू की किस्म कुफरी जामुनिया (Kufri Jamunia) हाल ही में चर्चा में रही। पत्र सूचना कार्यालय (PIB) ने 18 अक्टूबर, 2026 को इसकी पोषण सम्बन्धी विशेषताओं पर जानकारी प्रकाशित की। वर्ष 2024 में जारी की गई यह जैव-संवर्द्धित किस्म छिपी हुई भूख (Hidden Hunger) अर्थात् पर्याप्त भोजन मिलने के बावजूद आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी की समस्या से निपटने में उपयोगी हो सकती है। इसके कन्द की त्वचा तथा गूदा गहरे बैंगनी रंग के होते हैं। इस किस्म में एन्थोसाइनिन, विटामिन-C, लौह तथा जिंक जैसे महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। PIB के अनुसार, इसके 100 ग्राम गूदे में लगभग 42·05 मिलीग्राम एन्थोसाइनिन तथा 42·75 मिलीग्राम विटामिन-C पाया जाता है, जबकि 100 ग्राम छिलके में लगभग 80·66 मिलीग्राम एन्थोसाइनिन होता है। यह लगभग 90 दिनों में तैयार होने वाली मध्यम अवधि की किस्म है, जिसकी औसत उपज अनुशंसित परिस्थितियों में 32-35 टन प्रति हेक्टेयर है। एक पौधे से सामान्यतः 10-12 कन्द प्राप्त होते हैं। इस किस्म की सुप्तावस्था लगभग 6-8 सप्ताह होती है, जिससे भण्डारण में सुविधा मिलती है। इसे उत्तरी, मध्य और पूर्वी मैदानी क्षेत्रों के लिए अनुशंसित किया गया है। ICAR की अन्य रंगीन आलू किस्मों में कुफरी नीलकण्ठ (2018) तथा कुफरी माणिक (2021) शामिल हैं। जैव-संवर्द्धन में फसलों के पोषण स्तर को प्रजनन अथवा जैविक विधियों से बढ़ाया जाता है, जबकि सामान्य खाद्य फोर्टिफिकेशन में प्रसंस्करण के दौरान पोषक तत्त्व मिलाए जाते हैं। |
अरुणाचल प्रदेश में ओफियोराइजा की दो नई प्रजातियाँ (पर्यावरण / चर्चा में प्रजातियाँ) | अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में ओफियोराइजा वंश की दो नई वनस्पति प्रजातियों की खोज — शोधकर्ताओं ने अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले से पुष्पीय पौधों की दो नई प्रजातियों Ophiorrhiza shidiensis तथा Ophiorrhiza pemae की पहचान की है। इनकी खोज से सम्बन्धित शोधपत्र 23 अक्टूबर, 2026 को वनस्पति विज्ञान की शोध-पत्रिका Taiwania के खण्ड 71, अंक 4 में प्रकाशित हुआ। शोधकर्ताओं कृष्णा चौलू, रेंथलेई लालनुनफेली और विनय कुमार साहनी ने इन प्रजातियों का वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत किया। दोनों प्रजातियाँ रूबिएसी (Rubiaceae) कुल तथा Ophiorrhiza वंश से सम्बन्धित हैं। कॉफी के पौधे भी रूबिएसी कुल में शामिल हैं। |
