वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर ग्रे-ज़ोन युद्ध
ग्रे-ज़ोन युद्ध में प्रतिद्वंद्वी देश खुला युद्ध शुरू किए बिना छोटे-छोटे सैन्य, राजनीतिक, सूचना और बुनियादी ढांचा संबंधी कदमों से धीरे-धीरे रणनीतिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर ग्रे-ज़ोन युद्ध
- पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — भारत और उसके पड़ोसी संबंध; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — सीमा प्रबंधन, आंतरिक सुरक्षा और रक्षा तैयारी।
- स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस, 27 अक्टूबर 2026।
हालिया संदर्भ
अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारतीय और चीनी कर्मियों के बीच हालिया आमने-सामने की घटनाओं ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control—LAC) पर चीन द्वारा अपनाई जा रही ग्रे-ज़ोन रणनीतियों की ओर फिर से ध्यान आकर्षित किया है। भारत का कहना है कि जब चीनी गश्ती दल स्थापित गश्ती पैटर्न से अलग होते हैं, तो टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जबकि चीन का कहना है कि वह मौजूदा समझौतों का पालन करते हुए सामान्य गश्त कर रहा है।
व्यापक रणनीतिक चिंता यह है कि विवादित और स्पष्ट रूप से सीमांकित न होने वाली LAC ऐसे क्रमिक कदमों के लिए स्थान उपलब्ध कराती है, जो पूर्ण युद्ध की सीमा से नीचे रहते हैं।
ग्रे-ज़ोन युद्ध क्या है?
ग्रे-ज़ोन युद्ध से आशय ऐसी दबावकारी गतिविधियों से है, जो सामान्य शांतिकालीन प्रतिस्पर्धा और पारंपरिक सशस्त्र संघर्ष के बीच स्थित होती हैं।
इसकी शक्ति अस्पष्टता और सीमित तनाव-वृद्धि में निहित होती है। प्रत्येक अलग कार्रवाई इतनी छोटी दिखाई दे सकती है कि उसके जवाब में बड़े सैन्य कदम को उचित ठहराना कठिन हो, लेकिन ऐसी कार्रवाइयाँ लगातार दोहराए जाने पर सामूहिक रूप से रणनीतिक स्थिति को बदल सकती हैं।
इन तरीकों में गश्ती दबाव, अवसंरचना निर्माण, साइबर अभियान, सूचना अभियान, आर्थिक दबाव और कानूनी या कूटनीतिक दावों का संयोजन शामिल हो सकता है।
“निबल एंड नेगोशिएट”
ग्रे-ज़ोन रणनीति का एक प्रमुख तरीका क्रमिक परिवर्तन है।
किसी बड़े क्षेत्रीय सैन्य अतिक्रमण के बजाय सेनाएँ गश्त बढ़ा सकती हैं, अस्थायी चौकियाँ स्थापित कर सकती हैं, सड़कें विकसित कर सकती हैं या विवादित क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को धीरे-धीरे सामान्य बना सकती हैं। इसके बाद बातचीत उस समय होती है, जब जमीनी स्थिति पहले ही बदल चुकी होती है।
इसे अक्सर “निबल एंड नेगोशिएट” कहा जाता है, जिसमें अनेक छोटे सामरिक कदम किसी खुले हमले से जुड़े जोखिम उठाए बिना धीरे-धीरे मौजूदा स्थिति को बदल देते हैं।

अवसंरचना भी रणनीति का हिस्सा है
सैन्य अवसंरचना स्वयं ग्रे-ज़ोन रणनीति के उपकरण के रूप में काम कर सकती है।
चीन ने हिमालयी सीमा के निकट राजमार्गों, रेल संपर्क, हवाई अड्डों और हेलीपोर्ट का विस्तार किया है, जिससे निगरानी, रसद और सैनिकों की तीव्र आवाजाही की उसकी क्षमता बढ़ी है। जिससे शियाओकांग सीमा गांवों (Xiaokang Border Villages) में से कुछ विवादित क्षेत्रों के निकट अग्रिम उपस्थिति और अवसंरचना को समर्थन दे सकते हैं।
इस प्रकार, किसी वास्तविक युद्ध के शुरू होने से पहले ही अवसंरचना स्थानीय सामरिक संतुलन को बदल सकती है।
“थ्री वारफेयर्स”
ग्रे-ज़ोन रणनीति केवल भौतिक सैन्य तैनाती तक सीमित नहीं है।
चीन की “थ्री वारफेयर्स” (Three Warfares) अवधारणा में जनमत युद्ध, मनोवैज्ञानिक युद्ध और कानूनी युद्ध शामिल हैं।
सूचना अभियान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय धारणाओं को प्रभावित कर सकते हैं। मनोवैज्ञानिक दबाव प्रतिद्वंद्वी के निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, जबकि कानूनी या मानचित्र संबंधी दावों का उपयोग क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश के स्थानों का बार-बार नाम बदलना गैर-सैन्य साधनों के माध्यम से क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने के इसी व्यापक प्रयास के अंतर्गत समझा जा सकता है।
ग्रे-ज़ोन रणनीतियों का मुकाबला कठिन क्यों है?
मुख्य चुनौती आनुपातिक प्रतिक्रिया की है।
यदि गश्त में प्रत्येक छोटे बदलाव पर बड़ी सैन्य प्रतिक्रिया दी जाए, तो तनाव बढ़ने का जोखिम रहता है। लेकिन यदि प्रत्येक घटना को इतना छोटा मान लिया जाए कि उस पर प्रतिक्रिया आवश्यक न लगे, तो समय के साथ संचयी परिवर्तन ऐसे स्तर तक पहुँच सकते हैं जिन्हें पलटना कठिन हो जाए।
इसलिए प्रभावी प्रतिरोध के लिए आवश्यक है कि बदलावों को प्रारंभिक स्तर पर ही पहचाना और चुनौती दी जाए, इससे पहले कि अस्थायी सामरिक कदम स्थायी रूप धारण कर लें।

भारत को क्या चाहिए?
भारत की प्रतिक्रिया केवल पारंपरिक सैन्य बलों पर निर्भर नहीं हो सकती।
भारत को बेहतर निगरानी, खुफिया क्षमता, सीमा अवसंरचना, रसद और त्वरित सैन्य सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता है। सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (Indo-Tibetan Border Police—ITBP) और अन्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ग्रे-ज़ोन स्थितियाँ पारंपरिक प्रशासनिक प्रक्रियाओं की तुलना में कहीं अधिक तेजी से विकसित हो सकती हैं।
अनपेक्षित तनाव-वृद्धि से बचने के लिए कूटनीतिक संवाद आवश्यक है, लेकिन इसे विश्वसनीय जमीनी क्षमता के साथ-साथ चलना होगा।
मूल नीतिगत सीख
ग्रे-ज़ोन युद्ध शांति और खुले युद्ध के बीच मौजूद क्षेत्र का लाभ उठाने का प्रयास करता है।
इसका उद्देश्य आवश्यक रूप से किसी निर्णायक लड़ाई में जीतना नहीं होता, बल्कि प्रतिद्वंद्वी की प्रतिक्रिया की लागत ऊँची रखते हुए धीरे-धीरे जमीनी वास्तविकताओं को बदलना होता है।
भारत के लिए रणनीतिक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि छोटे सामरिक लाभ स्थायी रणनीतिक वास्तविकताओं में न बदलें। इसके लिए निरंतर निगरानी, तेज निर्णय-प्रक्रिया, मजबूत सीमा अवसंरचना, अंतर-एजेंसी समन्वय और विश्वसनीय प्रतिरोध क्षमता आवश्यक है।
संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न
“ग्रे-ज़ोन युद्ध पारंपरिक युद्ध की सीमा से नीचे संचयी कार्रवाइयों के माध्यम से रणनीतिक यथास्थिति को बदलने का प्रयास करता है।” इस अवधारणा को स्पष्ट कीजिए और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ऐसी रणनीतियों का मुकाबला करने के लिए भारत को आवश्यक क्षमताओं की चर्चा कीजिए।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
ग्रे-ज़ोन युद्ध के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इसमें सामान्यतः पारंपरिक सशस्त्र संघर्ष की सीमा से नीचे दबावकारी गतिविधियाँ शामिल होती हैं।
- इसकी प्रभावशीलता अस्पष्टता और सामरिक लाभों के क्रमिक संचयन पर निर्भर हो सकती है।
- इसमें साइबर, सूचना और आर्थिक साधनों का उपयोग अनिवार्य रूप से शामिल नहीं किया जाता।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: B
व्याख्या: ग्रे-ज़ोन युद्ध में सैन्य और गैर-सैन्य दोनों प्रकार के साधनों का संयोजन किया जा सकता है, जिनमें साइबर, सूचना, आर्थिक और राजनीतिक उपाय भी शामिल हैं, जबकि गतिविधियाँ पूर्ण युद्ध की सीमा से नीचे बनी रहती हैं।