जीवनरक्षक दवाओं की सुलभता: स्वास्थ्य के अधिकार और व्यावसायिक नैतिकता पर सवाल
सस्ती दवाओं से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति मूल्य (पीटीआर) के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठाए। पीठ ने प्रश्न किया कि क्या व्यावसायिक हितों को मरीजों के जीवन से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
करुणा, जनहित एवं व्यावसायिक नैतिकता
- न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) तथा खुदरा विक्रेताओं के क्रय मूल्य (PTR) के बीच भारी अन्तर पर प्रश्न उठाए.
- सस्ती दवाओं से सम्बन्धित याचिकाओं की सुनवाई में न्यायालय ने रोगियों के जीवन की तुलना में व्यावसायिक हितों को अधिक महत्त्व देने पर चिन्ता जताई. न्यायालय ने आदेश सुरक्षित रखा है; उसकी मौखिक टिप्पणियाँ अन्तिम निर्णय नहीं हैं.
यह मुद्दा क्या है?
- जीवनरक्षक दवाओं, विशेषकर कैंसर की औषधियों, की ऊँची कीमतें परिवारों पर असहनीय आर्थिक बोझ डाल सकती हैं. वितरण-शृंखला में अत्यधिक मार्जिन तथा अस्पतालों के बिल में दवाओं की बढ़ी हुई कीमत इस समस्या को गम्भीर बनाती है.
- प्रश्न कम्पनियों के उचित लाभ को समाप्त करने का नहीं, बल्कि दवा की गुणवत्ता, अनुसन्धान तथा निर्बाध आपूर्ति सुरक्षित रखते हुए अनुचित मूल्यवृद्धि रोकने का है. अनुसूचित औषधियों पर अधिकतम मूल्य-सीमा निर्धारित होती है; गैर-अनुसूचित औषधियाँ भी निगरानी के अन्तर्गत आती हैं, पर सामान्यतः उन पर वैसी पूर्वनिर्धारित मूल्य-सीमा लागू नहीं होती.
संवैधानिक एवं कानूनी पृष्ठभूमि
- संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा करता है तथा अनुच्छेद 47 राज्य को लोक स्वास्थ्य में सुधार का निर्देश देता है. 'पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि सरकारी अस्पताल में समय पर चिकित्सा उपलब्ध न कराना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकता है.
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत जारी औषधि (मूल्य नियन्त्रण) आदेश (DPCO), 2013 को औषधि विभाग के अधीन राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) लागू करता है. राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तैयार करता है; सम्बन्धित औषधियों को DPCO की अनुसूची-I में शामिल करके प्रत्यक्ष मूल्य नियन्त्रण के दायरे में लाया जाता है.
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आँकड़े एवं हाल की सरकारी कार्रवाई
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमान 2022-23 के अनुसार भारत के कुल स्वास्थ्य व्यय में परिवारों का प्रत्यक्ष जेब-से-व्यय 43·4 प्रतिशत था. NPPA ने 17 अक्टूबर, 2026 को 137 चिह्नित गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं के व्यापार मार्जिन को उनके अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 प्रतिशत तक सीमित करने की अधिसूचना जारी की. संशोधित मूल्य 9 नवम्बर, 2026 से प्रभावी होंगे.
- सरकार ने प्रभावित दवाओं की कीमतों में परिस्थितियों के अनुसार अधिकतम 70 प्रतिशत तक कमी तथा रोगियों को लगभग ₹2,500 करोड़ वार्षिक बचत का अनुमान व्यक्त किया है. ये सम्भावित लाभ हैं, अभी प्राप्त परिणाम नहीं.
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कारण, महत्त्व एवं चुनौतियाँ
- वितरकों को मिलने वाली अस्पष्ट छूट, अस्पतालों की क्रय और विक्रय कीमतों में अन्तर, पर्याप्त मूल्य-पारदर्शिता का अभाव, रोगियों की कमजोर सौदेबाजी क्षमता और लम्बी अवधि के उपचार का खर्च इस संकट को बढ़ाते हैं.
- कैंसर रोगी के लिए महँगी दवा के कारण उपचार टालना अपरिवर्तनीय स्वास्थ्य हानि पहुँचा सकता है. दूसरी ओर, बिना पर्याप्त आकलन के अत्यधिक मूल्य-कटौती दुर्लभ औषधियों की उपलब्धता तथा अनुसन्धान निवेश को प्रभावित कर सकती है. इसलिए वास्तविक निर्माण एवं सेवा-लागत और अनुचित मुनाफे में अन्तर करना तथा दवा की कमी उत्पन्न किए बिना नियम लागू करना आवश्यक है.
बहुआयामी एवं नैतिक विश्लेषण
- आर्थिक दृष्टि से औषधियाँ सामान्य उपभोक्ता वस्तुएँ नहीं हैं, क्योंकि बीमार व्यक्ति उपचार को इच्छानुसार टाल या मोलभाव नहीं कर सकता. सामाजिक दृष्टि से महँगा उपचार असमानता बढ़ाता है, जबकि संवैधानिक दृष्टि से यह स्वास्थ्य सेवाओं तक प्रभावी पहुँच का प्रश्न है.
- व्यावसायिक नैतिकता पारदर्शी मूल्य निर्धारण तथा जिम्मेदार लाभ पर बल देती है. अस्पताल वास्तविक सेवा-लागत अलग से स्पष्ट कर सकते हैं, उसे छिपे हुए औषधि मार्जिन में जोड़ना उचित नहीं है. NPPA के प्रति न्यायालय की आलोचना सुनवाई के दौरान की टिप्पणी थी, प्राधिकरण के निष्क्रिय होने सम्बन्धी अन्तिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं.
उदाहरण एवं सरकारी पहल
- सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में कुछ उत्पादों के क्रय मूल्य और अस्पताल द्वारा वसूली गई कीमत के बीच बड़े अन्तर के उदाहरण सामने आए. इससे जाँच योग्य और पारदर्शी मूल्य व्यवस्था की आवश्यकता स्पष्ट होती है. DPCO का पैरा 19 असाधारण परिस्थितियों में जनहित के लिए मूल्य-निर्धारण का अधिकार देता है, जबकि पैरा 20 गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर निगरानी तथा सामान्यतः पूर्ववर्ती 12 महीनों की MRP के मुकाबले 10 प्रतिशत से अधिक वार्षिक वृद्धि पर रोक का प्रावधान करता है.
- प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना किफायती जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराती है; आयुष्मान भारत PM-JAY पात्र परिवारों को निर्दिष्ट अस्पताल उपचार के लिए प्रतिवर्ष ₹5 लाख तक का स्वास्थ्य कवर प्रदान करता है.
आगे की राह एवं निष्कर्ष
- अस्पतालों के मदवार बिल, औषधियों की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मूल्य-सूचियाँ, NPPA की समयबद्ध निगरानी, जेनेरिक दवाओं के तर्कसंगत प्रिस्क्रिप्शन, प्रभावी शिकायत निवारण और आवश्यक औषधि सूची का समयानुकूल अद्यतन आवश्यक हैं.
- मूल्य विनियमन के साथ दवाओं की उपलब्धता की निरन्तर जाँच तथा वास्तविक नवाचार को प्रोत्साहन भी बना रहना चाहिए. स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता अन्ततः जनविश्वास और गरिमा का प्रश्न है—ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें उचित व्यावसायिक हित सुरक्षित रहें, किन्तु भुगतान की असमर्थता समय पर जीवनरक्षक उपचार में बाधा न बने.
MCQs
प्रश्न . भारत में औषधि मूल्य विनियमन के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
- राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तैयार करता है.
- DPCO, 2013 के अन्तर्गत गैर-अनुसूचित औषधियाँ पूरी तरह मूल्य-निगरानी से मुक्त हैं.
- DPCO, 2013 का पैरा 19 असाधारण परिस्थितियों में जनहित के लिए मूल्य-निर्धारण की अनुमति देता है.
उपर्युक्त में से कौनसे कथन सही हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 1 और 3
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
उत्तर - (B)
व्याख्या - कथन 2 गलत है. पैरा 20 गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों की निगरानी तथा वार्षिक MRP वृद्धि की सीमा का प्रावधान करता है.