बच्चों का इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट तक पहुंच और उपयोग को मौलिक अधिकारों से जोड़ा है, साथ ही यह स्पष्ट किया है कि डिजिटल स्वतंत्रता और ऑनलाइन सुरक्षा को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बच्चों का इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार
- पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — मौलिक अधिकार, बाल अधिकार, न्यायपालिका और शासन; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — डिजिटल प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता।
- स्रोत एवं तिथि: द हिंदू, 30 अक्टूबर 2026।
हालिया संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बच्चों को इंटरनेट तक पहुंच और उसके उपयोग का मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद 19(1)(क) के साथ पढ़ने पर प्राप्त होता है।
निर्णय ने यह विचार भी अस्वीकार किया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए व्यापक डिजिटल प्रतिबंध आवश्यक हैं। इसके बजाय न्यायालय ने ऐसे आनुपातिक और समझदारीपूर्ण सुरक्षा उपायों का समर्थन किया, जो बच्चों की सुरक्षा के साथ उनकी सीखने, संवाद करने और ऑनलाइन भागीदारी की क्षमता को भी बनाए रखें।
पहुंच केवल कनेक्टिविटी नहीं है
स्मार्टफोन या इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध करा देना अपने आप सार्थक डिजिटल भागीदारी सुनिश्चित नहीं करता।
बच्चों को सूचना की सत्यता जांचने, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करने, हेरफेर को पहचानने, साइबरबुलिंग का सामना करने और यह समझने की क्षमता भी चाहिए कि अनुशंसा प्रणालियाँ उनके सामने दिखाई देने वाली सामग्री को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
इस व्यापक क्षमता को डिजिटल एजेंसी (Digital Agency) कहा जा सकता है—अर्थात डिजिटल प्रणालियों का स्वतंत्र, आलोचनात्मक और सुरक्षित उपयोग करने की क्षमता।
पूर्ण प्रतिबंध क्यों विफल हो सकते हैं?
पूर्ण प्रतिबंध देखने में सुरक्षात्मक लग सकते हैं, लेकिन इनके अनपेक्षित परिणाम भी हो सकते हैं।
बच्चे कम दिखाई देने वाले या कम विनियमित प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं, जिससे निगरानी और कठिन हो सकती है। दंड के भय के कारण वे ऑनलाइन दुर्व्यवहार, उत्पीड़न या शोषण की शिकायत करने से भी बच सकते हैं।
इसलिए बेहतर दृष्टिकोण पूर्ण बहिष्कार नहीं, बल्कि आयु-अनुकूल पहुंच के साथ सुरक्षा उपाय और सहायता के लिए भरोसेमंद माध्यम उपलब्ध कराना है।

AI साक्षरता क्यों आवश्यक होती जा रही है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने डिजिटल साक्षरता में एक नया आयाम जोड़ दिया है।
बच्चों को यह समझने की आवश्यकता है कि AI प्रणालियाँ गलत जानकारी उत्पन्न कर सकती हैं, पक्षपात को प्रतिबिंबित कर सकती हैं और विश्वसनीय दिखाई देने वाली लेकिन झूठी सामग्री भी बना सकती हैं।
उन्हें यह भी समझना होगा कि AI कब सीखने में सहायक उपकरण होना चाहिए और कब वह स्वतंत्र चिंतन की जगह लेने लगता है।
इसलिए विद्यालयों को पारंपरिक डिजिटल साक्षरता के साथ AI साक्षरता भी सिखानी चाहिए, जिसमें गोपनीयता सुरक्षा, सूचना सत्यापन और जिम्मेदार उपयोग शामिल हों।
चाइल्ड मोड और टीन मोड
आयु-अनुकूल डिज़ाइन, बिना नियंत्रण की पहुंच और पूर्ण प्रतिबंध के बीच एक मध्य मार्ग उपलब्ध करा सकता है।
चाइल्ड मोड (Child Mode) में अधिक कड़े गोपनीयता डिफॉल्ट, फ़िल्टर की गई सामग्री, विज्ञापन पर प्रतिबंध और अधिक नियंत्रित संवाद सेटिंग शामिल हो सकती हैं।
टीन मोड (Teen Mode) में अधिक स्वायत्तता दी जा सकती है, लेकिन फिर भी वयस्कों की तुलना में अलग सुरक्षा उपाय बनाए रखे जा सकते हैं।
मुख्य सिद्धांत क्रमिक स्वायत्तता (Progressive Autonomy) है—जैसे-जैसे बच्चों की परिपक्वता और डिजिटल क्षमता बढ़े, सुरक्षा नियंत्रण धीरे-धीरे कम किए जाएँ।

सेफ्टी-बाय-डिज़ाइन
जिम्मेदारी केवल अभिभावकों पर नहीं छोड़ी जा सकती।
प्रौद्योगिकी कंपनियाँ उपकरणों, ऑपरेटिंग सिस्टम, दूरसंचार सेवाओं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और AI उपकरणों में सुरक्षा को मूल डिज़ाइन का हिस्सा बना सकती हैं।
संभावित उपायों में गोपनीयता-सुरक्षित डिफॉल्ट, आयु-संवेदनशील अनुशंसा प्रणालियाँ, लक्षित विज्ञापन पर प्रतिबंध, सुरक्षित संवाद सेटिंग और सरल शिकायत तंत्र शामिल हो सकते हैं।
इस दृष्टिकोण को सेफ्टी-बाय-डिज़ाइन (Safety-by-Design) कहा जाता है, जिसमें हानि होने के बाद सुरक्षा जोड़ने के बजाय उत्पाद के निर्माण में ही सुरक्षा शामिल की जाती है।
विद्यालयों और सरकार की भूमिका
विद्यालयों को मुख्यधारा की शिक्षा के हिस्से के रूप में डिजिटल और AI क्षमता विकसित करनी चाहिए।
सरकारों को ऐसे आनुपातिक नियामक मानक बनाने चाहिए, जो संवैधानिक स्वतंत्रताओं को कमजोर करने वाले अत्यधिक प्रतिबंधों से बचें।
अभिभावकों को उपयोगी उपकरण और जागरूकता की आवश्यकता है, जबकि बच्चों द्वारा उपयोग किए जाने वाले डिजिटल वातावरण के डिज़ाइन के लिए प्लेटफॉर्म की स्पष्ट जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
मूल नीतिगत सीख
बच्चों के डिजिटल अधिकारों को पहुंच बनाम सुरक्षा के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अधिक टिकाऊ दृष्टिकोण संवैधानिक स्वतंत्रता को डिजिटल साक्षरता, क्रमिक स्वायत्तता और सेफ्टी-बाय-डिज़ाइन के साथ जोड़ता है।
उद्देश्य बच्चों के लिए स्थायी रूप से प्रतिबंधित इंटरनेट बनाना नहीं, बल्कि उनमें वह क्षमता विकसित करना है जिससे वे व्यापक डिजिटल दुनिया का सुरक्षित और स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकें।
संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न
“ऑनलाइन बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल स्वतंत्रता और डिजिटल सुरक्षा में से किसी एक को चुनना आवश्यक नहीं है।” संवैधानिक अधिकारों, डिजिटल साक्षरता और आयु-अनुकूल प्रौद्योगिकी डिज़ाइन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
प्रश्न 1
बच्चों के डिजिटल अधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता डिजिटल पहुंच से संबंधित हो सकती है।
- अनुच्छेद 21 केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित न रहकर सार्थक जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों तक विस्तृत हो सकता है।
- ऑनलाइन बच्चों की सुरक्षा के लिए इंटरनेट पहुंच पर पूर्ण प्रतिबंध अनिवार्य है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: B
व्याख्या: अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 21 डिजिटल पहुंच और भागीदारी को समर्थन दे सकते हैं। बाल सुरक्षा के लिए पूर्ण प्रतिबंध आवश्यक नहीं है और इसके स्थान पर अनुपातिक सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं।
प्रश्न 2
आयु-अनुकूल डिजिटल डिज़ाइन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कम आयु के उपयोगकर्ताओं के लिए गोपनीयता सेटिंग को डिफॉल्ट रूप से अधिक कड़ा बनाया जा सकता है।
- किशोरों के लिए स्वायत्तता और सुरक्षा का संतुलन बहुत छोटे बच्चों की तुलना में अलग हो सकता है।
- सेफ्टी-बाय-डिज़ाइन की अवधारणा सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल अभिभावकों पर डालती है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: B
व्याख्या: आयु-अनुकूल डिज़ाइन परिपक्वता और स्वायत्तता के अलग-अलग स्तरों को पहचानता है। सेफ्टी-बाय-डिज़ाइन में प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और संस्थानों की भी जिम्मेदारी होती है, केवल अभिभावकों की नहीं।

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