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Current Affairs - Daily 31 अक्टूबर 2026

सियांग ऊपरी बहुउद्देशीय परियोजना: विकास, विस्थापन और पर्यावरणीय नैतिकता के प्रश्न

सियांग परियोजना विकास, विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभावों, आदिवासी अधिकारों और निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर प्रश्न उठाती है।

सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना : विकास, विस्थापन एवं पर्यावरणीय नैतिकता

चर्चा में क्यों?

  • अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (SUMP) के विरुद्ध अक्टूबर 2026 में विरोध तेज हुआ। 23 अक्टूबर को पासीघाट में हुई झड़पों और इसके बाद सुरक्षा बलों की तैनाती ने आदि जनजातीय समुदाय की पैतृक भूमि, विस्थापन तथा पर्यावरणीय क्षति सम्बन्धी आशंकाओं को सामने रखा।
  • परियोजना अभी पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट (PFR) के लिए सर्वेक्षण के चरण में है; इसे निर्माण की अन्तिम स्वीकृति नहीं मिली है। विवाद का मूल प्रश्न है कि राष्ट्रीय महत्त्व की किसी परियोजना में उससे सर्वाधिक प्रभावित लोगों की निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी कैसे सुनिश्चित की जाए।

परियोजना क्या है?

  • NHPC द्वारा अध्ययन की जा रही यह सियांग नदी पर प्रस्तावित विशाल जलविद्युत एवं बाढ़-नियन्त्रण परियोजना है। इसकी 11,200 मेगावाट क्षमता प्रस्तावित है, स्थापित क्षमता नहीं। सियांग तिब्बत से अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहाँ ऊपर की ओर इसे यारलुंग त्सांगपो कहते हैं। 
  • आगे यह दिबांग और लोहित नदी-तन्त्र से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनाती है। परियोजना का अन्तिम स्थल और स्वरूप अभी तकनीकी अध्ययन के अधीन हैं। चीन की ऊपरी धारा की जलविद्युत योजनाओं ने भारत की जल-सुरक्षा एवं भण्डारण क्षमता सम्बन्धी चिन्ताएँ बढ़ाई हैं।
यारलुंग त्सांगपो (तिब्बत) → सियांग/दिहांग (अरुणाचल प्रदेश) → ब्रह्मपुत्र (असम)। पूर्वी हिमालय भूकम्पीय दृष्टि से सक्रिय है; अवसाद प्रवाह, जलविज्ञान एवं भूकम्पीय जोखिम बाँध मूल्यांकन के प्रमुख आधार हैं।

पृष्ठभूमि एवं विरोध के कारण

  • सियांग की जलविद्युत क्षमता के उपयोग की योजना कई वर्षों से विचाराधीन रही है। चीन द्वारा ऊपरी धारा में बाँध विकास की योजनाओं से इसकी सामरिक उपयोगिता फिर चर्चा में आई है। दूसरी ओर, स्थानीय आदि समुदाय के लिए नदी, वन, सामुदायिक भूमि, कृषि क्षेत्र, पूर्वजों के निवास स्थल और सांस्कृतिक परम्पराएँ परस्पर जुड़े हुए हैं। 
  • सम्भावित जलमग्नता, कृषि एवं मत्स्य-आजीविका पर प्रभाव, वन संसाधनों की हानि तथा सामुदायिक पहचान का क्षरण विरोध के प्रमुख आधार हैं। अनेक निवासी प्रारम्भिक सर्वेक्षण का भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि तकनीकी अध्ययन के बाद निर्माण का निर्णय लगभग अपरिवर्तनीय हो जाएगा।

महत्त्व एवं बहुआयामी विश्लेषण

  • आर्थिक दृष्टि से भण्डारण आधारित जलविद्युत ऊर्जा आपूर्ति को सन्तुलित करने, सौर एवं पवन ऊर्जा के एकीकरण और सम्भावित बाढ़ नियन्त्रण में सहायक हो सकती है। 
  • सामरिक दृष्टि से सीमा-पार नदी पर ऊपरी धारा की गतिविधियों को देखते हुए जल-प्रवाह की निगरानी एवं पूर्वानुमान क्षमता बढ़ाना महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि, कोई घरेलू बाँध चीन के ऊपरी बाँध से उत्पन्न प्रत्येक जोखिम को स्वतः समाप्त नहीं कर सकता; प्रभावशीलता जलाशय के स्थान, संचालन, अवसाद संचयन और विश्वसनीय जलवैज्ञानिक मॉडल पर निर्भर होगी।
  • सामाजिक दृष्टि से विस्थापन केवल मकान या खेत की क्षति नहीं है। प्रथागत सामुदायिक भूमि-अधिकार, साझा संसाधन, आजीविका और धार्मिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध का मूल्य नकद मुआवजे से पूर्णतः नहीं चुकाया जा सकता। 
  • महिलाएँ, छोटे किसान तथा भावी पीढ़ियाँ असमान रूप से प्रभावित हो सकती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से वनक्षेत्र की जलमग्नता, जैवविविधता, नदी की अविरलता, अवसाद प्रवाह, भू-स्खलन और अनेक परियोजनाओं के संचयी प्रभावों का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है।
संवैधानिक व नैतिक सम्बन्ध : अनुच्छेद 21—जीवन एवं गरिमा; अनुच्छेद 48A—पर्यावरण संरक्षण; अनुच्छेद 51A(g)—नागरिकों का पर्यावरणीय कर्तव्य; अनुच्छेद 371H—अरुणाचल प्रदेश के लिए विशेष उपबन्ध। छठी अनुसूची अरुणाचल प्रदेश पर स्वतः लागू नहीं होती। प्रथागत भूमि-अधिकार एवं कानूनी सहमति की प्रक्रिया का स्थल-विशेष अध्ययन अनिवार्य है।

विकास बनाम विस्थापन एवं अन्तरपीढ़ीगत न्याय

  • परियोजना का लाभ राष्ट्रीय बिजली व्यवस्था तथा बाढ़ प्रबन्धन को मिल सकता है, जबकि भूमि, संस्कृति और पारिस्थितिकी सम्बन्धी नुकसान स्थानीय लोगों को उठाना पड़ सकता है। यही लाभ एवं लागत के असमान वितरण का प्रश्न है। 
  • अन्तरपीढ़ीगत न्याय की माँग है कि वर्तमान पीढ़ी ऊर्जा एवं सुरक्षा के लक्ष्यों के लिए भविष्य की पीढ़ियों के वन, नदी, भूमि और सांस्कृतिक विकल्पों को अनावश्यक रूप से सीमित न करे। 
  • पर्यावरणीय नैतिकता के अनुसार राष्ट्रीय हित और स्थानीय समुदाय के अधिकार परस्पर विरोधी लक्ष्य मानकर नहीं चलने चाहिए। सहमति को मात्र औपचारिक सुनवाई या जनसम्पर्क अभियान तक सीमित करना सामाजिक विश्वास को कमजोर करता है।

सरकारी पहल एवं चुनौतियाँ

  • केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय ने अगस्त 2024 में संसद को बताया था कि निर्माण से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति तथा वनस्पति, जीव-जन्तुओं और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक होगा। 
  • सितम्बर 2026 में अरुणाचल प्रदेश सरकार ने प्रारम्भिक सर्वेक्षण गतिविधियों के समन्वय हेतु उच्चस्तरीय व्यवस्था को स्वीकृति दी। मुख्यमंत्री पेमा खाण्डू ने कहा कि व्यवहार्यता अध्ययन से आगे बढ़ने में जल्दबाजी नहीं की जाएगी और प्रस्ताव आगे बढ़ने पर प्रभावित समुदायों से व्यापक परामर्श किया जाएगा। इसके बावजूद विश्वास की कमी, विरोध-प्रदर्शनों पर कार्रवाई और भूमि-अधिकारों की अस्पष्टता प्रमुख प्रशासनिक चुनौतियाँ हैं।

आगे की राह

  • सबसे पहले PFR, सम्भावित जलमग्न क्षेत्र एवं जोखिम आकलन को स्थानीय भाषाओं में सार्वजनिक किया जाना चाहिए। स्वतंत्र भूकम्पीय, पर्यावरणीय और संचयी प्रभाव अध्ययन तथा स्थानीय लोगों के साथ प्रारम्भिक और निरन्तर संवाद आवश्यक हैं। 
  • छोटी एवं विकेन्द्रीकृत ऊर्जा परियोजनाओं, ऊर्जा-दक्षता तथा बिना परियोजना वाले विकल्प का भी तुलनात्मक परीक्षण किया जाए। जहाँ कानूनी रूप से आवश्यक हो, सहमति की प्रक्रिया सुस्पष्ट एवं प्रमाणित हो; पुनर्वास नीति में प्रथागत भूमि, आजीविका पुनर्स्थापन और सांस्कृतिक सम्बन्धों को स्थान मिले। 
  • भारत–चीन जलवैज्ञानिक सूचना सहयोग, बाढ़ पूर्व चेतावनी तथा समुदाय-आधारित निगरानी भी सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं।
  • अन्ततः सियांग परियोजना की सफलता का पैमाना केवल सम्भावित विद्युत उत्पादन नहीं, बल्कि यह होगा कि सामरिक आवश्यकता, पारिस्थितिक स्थिरता और नदी-आश्रित समुदायों की गरिमा का कितना न्यायपूर्ण समन्वय किया जा सका।

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना तथा पूर्वी हिमालयी नदी-तन्त्र के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—

1. यह परियोजना उस नदी पर प्रस्तावित है, जिसे तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो कहते हैं।
2. परियोजना को अन्तिम पर्यावरणीय स्वीकृति मिल चुकी है तथा निर्माण शुरू हो गया है।
3. अवसाद परिवहन और भूकम्पीय जोखिम परियोजना की दीर्घकालीन व्यवहार्यता जाँचने के लिए प्रासंगिक हैं।
4. कोई भी बहुउद्देशीय भण्डारण बाँध ऊपरी धारा के बाँध से उत्पन्न सभी प्रकार के जोखिम अनिवार्य रूप से समाप्त कर देता है।

उपर्युक्त में से कौनसे कथन सही हैं?
(A) केवल 1 और 3
(B) केवल 1, 2 और 3
(C) केवल 2 और 4
(D) केवल 1, 3 और 4

उत्तर—(A)

व्याख्या - कथन 1 और 3 सही हैं। कथन 2 गलत है, क्योंकि परियोजना अभी पूर्व-व्यवहार्यता सर्वेक्षण के चरण में है। कथन 4 गलत है; किसी बाँध से ऊपरी धारा के सभी जलवैज्ञानिक एवं संचालन सम्बन्धी जोखिम समाप्त होने की गारण्टी नहीं होती।

 

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मेघराज—भारत सरकार की जीआई क्लाउड पहल
  • भारत सरकार की जीआई क्लाउड (Government of India Cloud) पहल 'मेघराज' देश में ई-गवर्नेंस सेवाओं के विस्तार और सरकारी डिजिटल अवसंरचना के आधुनिकीकरण से सम्बन्धित है। यह पहल इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अन्तर्गत संचालित है। 
  • इसका प्रमुख उद्देश्य सरकारी इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) पर होने वाले व्यय को अनुकूलित करना तथा उपलब्ध कम्प्यूटिंग संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करना है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (NIC) द्वारा विकसित प्रथम राष्ट्रीय क्लाउड का शुभारम्भ 4 फरवरी, 2014 को किया गया था। मेघराज के अन्तर्गत सरकारी विभागों को अलग-अलग भौतिक सर्वर स्थापित किए बिना डिजिटल अनुप्रयोगों, डेटाबेस और भण्डारण सेवाओं के उपयोग की सुविधा मिलती है। 
  • इसके प्रमुख सेवा मॉडल हैं—इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐज अ सर्विस (IaaS), प्लेटफॉर्म ऐज अ सर्विस (PaaS), सॉफ्टवेयर ऐज अ सर्विस (SaaS) और स्टोरेज ऐज अ सर्विस (STaaS)। इसकी प्रमुख विशेषताओं में बहुस्थानीय क्लाउड अवसंरचना, स्व-सेवा पोर्टल, सुरक्षित नेटवर्क पहुँच, संसाधनों का साझा उपयोग और केन्द्रीकृत प्रबन्धन शामिल हैं। NIC के राष्ट्रीय डेटा केन्द्रों के माध्यम से विभिन्न सरकारी संस्थाओं को क्लाउड सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। 
  • इस पहल के कार्यान्वयन के लिए GI Cloud Strategic Direction Paper तथा GI Cloud Adoption and Implementation Roadmap जैसे नीतिगत दस्तावेज तैयार किए गए हैं। मेघराज डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के उद्देश्यों के अनुरूप सरकारी सेवाओं के तीव्र, सुरक्षित और किफायती वितरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
फिलीपींस में 13वीं ADMM-Plus बैठक आयोजित
  • 13वीं आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (ADMM-Plus) का आयोजन 29 अक्टूबर, 2026 को फिलीपींस के सेबू शहर में किया गया। वर्ष 2026 में इस मंच की अध्यक्षता फिलीपींस ने की। बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। उन्होंने क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों, आतंकवाद से निपटने में सहयोग तथा मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र की आवश्यकता पर बल दिया। 
  • ADMM-Plus का पूरा नाम ASEAN Defence Ministers’ Meeting-Plus है। इस मंच में आसियान के 11 सदस्य देशों तथा आठ संवाद भागीदारों—भारत, अमेरिका, चीन, रूस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड—की भागीदारी है। इसकी पहली बैठक 12 अक्टूबर, 2010 को वियतनाम की राजधानी हनोई में आयोजित हुई थी। इसका उद्देश्य रक्षा एवं सुरक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाना है।  
  • वर्ष 2026 की बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया तथा युवा, शान्ति एवं सुरक्षा विषय पर संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया। भारत और मलेशिया वर्ष 2024–2027 के लिए आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञ कार्य समूह की सह-अध्यक्षता कर रहे हैं। बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने अमेरिका, जापान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया सहित विभिन्न देशों के रक्षा प्रतिनिधियों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएँ भी कीं। 
  • उल्लेखनीय है कि आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक (ADMM) की शुरुआत वर्ष 2006 में कुआलालम्पुर से हुई थी। 28 अक्टूबर, 2026 को सेबू में इसकी 20वीं बैठक आयोजित हुई। वर्ष 2027 के लिए आसियान रक्षा क्षेत्र की अध्यक्षता सिंगापुर को सौंपी गई।
अमेरिका और जापान में AMRAAM मिसाइल असेंबली सुविधा स्थापित करने पर सहमति
  • अमेरिका और जापान ने 28 अक्टूबर, 2026 को जापान में उन्नत मध्यम दूरी की हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल (AMRAAM) के अन्तिम संयोजन एवं निरीक्षण के लिए एक सुविधा स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की। इसकी घोषणा जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने फिलीपींस के सेबू में अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ वार्ता के बाद की। यह समझौता दोनों देशों के रक्षा औद्योगिक सहयोग कार्यक्रम 'ऑपरेशन सुपरचार्ज' (Operation Supercharge) का हिस्सा है। 
  • AMRAAM का पूरा नाम Advanced Medium-Range Air-to-Air Missile है। AIM-120 नाम से पहचानी जाने वाली यह रडार-निर्देशित मिसाइल दृश्य सीमा से परे स्थित हवाई लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए विकसित की गई है। इसका निर्माण अमेरिकी कम्पनी RTX की सहायक कम्पनी रेथियॉन (Raytheon) करती है। 
  • इस मिसाइल का उपयोग F-35 सहित विभिन्न लड़ाकू विमानों में किया जाता है। प्रस्तावित सुविधा से जापान के रक्षा औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करने तथा दोनों देशों के लिए मिसाइलों की आपूर्ति व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाने में सहायता मिलने की अपेक्षा है। वार्ता में दोनों देशों ने SM-3 Block IIA बैलिस्टिक मिसाइल अवरोधक के उत्पादन में वृद्धि के लिए तकनीकी जानकारी साझा करने पर भी सहमति व्यक्त की। 
  • इससे पहले अप्रैल 2026 में AMRAAM के संयुक्त उत्पादन के अन्तर्गत सर्किट-कार्ड असेंबली पर सहमति बनी थी। अक्टूबर का समझौता उसी प्रक्रिया में अगला महत्त्वपूर्ण कदम है। हालाँकि प्रस्तावित सुविधा का सटीक स्थान, स्थापना की समय-सीमा, उत्पादन क्षमता और परियोजना लागत अभी घोषित नहीं की गई है। यह घटनाक्रम हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र में अमेरिका-जापान रक्षा सहयोग के विस्तार को दर्शाता है।
इंडिया बिएनले 2026 के आयोजन स्थलों में दिल्ली का जन्तर-मन्तर शामिल
  • नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक खगोलीय वेधशाला जन्तर-मन्तर को 'इंडिया बिएनले 2026' के आयोजन स्थलों में शामिल किए जाने की जानकारी 29 अक्टूबर, 2026 को सामने आई। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित यह अन्तर्राष्ट्रीय कला, वास्तुकला एवं डिजाइन महोत्सव 4 दिसम्बर, 2026 से 21 मार्च, 2027 तक दिल्ली के विभिन्न ऐतिहासिक स्मारकों, संग्रहालयों, कला दीर्घाओं और सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किया जाएगा। 
  • यह महोत्सव का दूसरा संस्करण है। इसका मुख्य विषय 'तत् त्वम् असि' (Tat Tvam Asi—You Are That) है, जो उपनिषदों के दार्शनिक विचार से प्रेरित है। प्रथम इंडिया आर्ट, आर्किटेक्चर एंड डिजाइन बिएनले का आयोजन वर्ष 2023 में लाल किले में किया गया था। वर्ष 2026 के संस्करण में भारत सहित 20 से अधिक देशों की सांस्कृतिक भागीदारी प्रस्तावित है। 
  • पुराना किला इसका प्रमुख आयोजन केन्द्र होगा। अन्य स्थलों में लाल किला, कुतुब मीनार, हुमायूँ का मकबरा, अग्रसेन की बावली और सफदरजंग का मकबरा शामिल हैं। दिल्ली के जन्तर-मन्तर का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18वीं शताब्दी में कराया था। 
  • यहाँ स्थापित विशाल खगोलीय यन्त्रों का उपयोग समय निर्धारण तथा आकाशीय पिण्डों की स्थिति के अध्ययन के लिए किया जाता था। यह स्मारक भारत की ऐतिहासिक वैज्ञानिक एवं स्थापत्य परम्परा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
  • उल्लेखनीय है कि यूनेस्को ने वर्ष 2010 में जयपुर स्थित जन्तर-मन्तर को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया था, दिल्ली के जन्तर-मन्तर को नहीं। दिल्ली की वेधशाला को बिएनले से जोड़ने का उद्देश्य ऐतिहासिक विरासत और समकालीन कला के बीच सम्बन्ध स्थापित करना है।
सियांग बाँध परियोजना—अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित बहुउद्देशीय जलविद्युत परियोजना
  • अरुणाचल प्रदेश की प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (Siang Upper Multipurpose Project—SUMP) अक्टूबर 2026 में भारत की जल सुरक्षा और चीन की ऊपरी धारा में जलविद्युत परियोजनाओं के कारण चर्चा में रही। इस परियोजना का उद्देश्य सियांग नदी पर जलविद्युत उत्पादन, जल भण्डारण और नदी के प्रवाह का विनियमन करना है। 
  • केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय के पूर्व विवरण के अनुसार अपर सियांग बहुउद्देशीय परियोजना की प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 11,200 मेगावाट है। हालाँकि परियोजना अभी प्रारम्भिक व्यवहार्यता अध्ययन के चरण में है और इसके निर्माण को अन्तिम स्वीकृति नहीं मिली है। 
  • अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खाण्डू ने अक्टूबर 2026 में स्पष्ट किया कि निर्माण सम्बन्धी निर्णय तकनीकी अध्ययन, वैधानिक प्रक्रियाओं तथा प्रभावित समुदायों के साथ परामर्श के बाद ही लिया जाएगा। सियांग नदी का उद्गम तिब्बत क्षेत्र में होता है, जहाँ इसे यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है। भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवाहित होने के बाद यह नदी असम में ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र का हिस्सा बनती है। 
  • चीन द्वारा ऊपरी धारा में विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित किए जाने के कारण सीमापार जल प्रवाह, बाढ़ नियन्त्रण और जल संसाधन प्रबन्धन सम्बन्धी चिन्ताएँ बढ़ी हैं। प्रस्तावित भारतीय परियोजना के समर्थक इसे ऊर्जा उत्पादन, जल भण्डारण और बाढ़ के प्रभाव को कम करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानते हैं। दूसरी ओर, स्थानीय समुदायों ने विस्थापन, भूमि के जलमग्न होने, पर्यावरणीय प्रभाव तथा आजीविका से सम्बन्धित चिन्ताएँ व्यक्त की हैं। परियोजना के वास्तविक लाभ और प्रभाव अन्तिम तकनीकी डिजाइन, पर्यावरणीय आकलन एवं संचालन व्यवस्था पर निर्भर करेंगे।