पंजाब का नशा संकट: जनस्वास्थ्य, कानून प्रवर्तन और पुनर्वास की चुनौतियाँ
पंजाब का नशा संकट रोकथाम, प्रभावी कानून प्रवर्तन, सुलभ उपचार, पुनर्वास और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित समन्वित प्रयासों की माँग करता।
पंजाब में नशीले पदार्थों का संकट
चर्चा में क्यों?
- अक्टूबर 2026 में मानसा में एक नशा-विरोधी कार्यकर्ता की हत्या तथा संदिग्ध ओवरडोज से मृत्यु की घटना ने पंजाब के नशा संकट को फिर चर्चा में ला दिया।
- द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सितम्बर 2026 में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के वर्ष 2024 के आँकड़ों में पंजाब में मादक पदार्थों की तस्करी के 6,060 मामले और ओवरडोज से 106 मौतें दर्ज थीं। हालाँकि FIR की संख्या को सीधे नशे की लत की व्यापकता नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह पुलिस की सक्रियता और रिपोर्टिंग पर भी निर्भर करती है।
समस्या का स्वरूप
- नशीले पदार्थों का दुरुपयोग मन:प्रभावी पदार्थों के हानिकारक अथवा गैर-चिकित्सकीय सेवन को दर्शाता है। नशे की निर्भरता एक स्वास्थ्य सम्बन्धी स्थिति भी है, जिसमें सेवन पर नियन्त्रण कठिन हो जाता है।
- पंजाब में ‘चिट्टा’ शब्द प्रायः हेरोइन के लिए प्रयुक्त होता है, जो ओपिऑइड वर्ग का पदार्थ है। संकट में तस्करी, दवाओं का दुरुपयोग, असुरक्षित इंजेक्शन तथा स्थानीय अवैध बाजार सम्मिलित हैं। नशे पर निर्भर व्यक्ति और संगठित तस्कर के बीच अन्तर करना आवश्यक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं सीमावर्ती भूगोल
- स्वतंत्रता से पहले पंजाब के कुछ क्षेत्रों में अफीम एवं पोस्त के सेवन की परम्परा थी, लेकिन उसे वर्तमान हेरोइन और दवाओं की अवैध आपूर्ति के समान नहीं माना जा सकता। पंजाब की पाकिस्तान के साथ लगभग 553 किमी लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा है।
- अफगानिस्तान, ईरान एवं पाकिस्तान से सम्बन्धित ‘गोल्डन क्रिसेंट’ क्षेत्र की निकटता तस्करी का जोखिम बढ़ाती है। ड्रोन, कुरियर तथा बदलते मार्ग सीमा प्रबन्धन को कठिन बनाते हैं। किन्तु समस्या केवल सीमा-पार आपूर्ति की नहीं है; अन्य राज्यों से आने वाली खेप एवं औषधियों का गैर-कानूनी वितरण भी स्थानीय बाजार को बनाए रखते हैं।
| मानचित्र तथ्य—गोल्डन क्रिसेंट : अफगानिस्तान–ईरान–पाकिस्तान; गोल्डन ट्रायंगल : म्याँमार–थाईलैण्ड–लाओस। दोनों अलग भौगोलिक क्षेत्र हैं। |
आर्थिक कारण एवं युवा वर्ग
- हरित क्रान्ति ने पंजाब को समृद्ध बनाया, किन्तु कृषि से परे रोजगार सृजन तथा युवाओं की आकांक्षाओं के बीच अन्तर बना रहा। अल्परोजगार, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था में सीमित विविधीकरण, विदेश प्रवास की आकांक्षा और तस्करी से शीघ्र कमाई का लालच संवेदनशीलता बढ़ा सकते हैं। फिर भी बेरोजगारी को नशे का स्वतः या एकमात्र कारण नहीं मानना चाहिए।
- स्थानीय विक्रेता निर्भरता और माँग का लाभ उठाते हैं। महिलाओं तथा परिवार के सदस्यों के अवैध कारोबार में फँसने के उदाहरण सामाजिक-आर्थिक संकट की गहराई दर्शाते हैं।
स्वास्थ्य, समाज एवं आन्तरिक सुरक्षा पर प्रभाव
- ओपिऑइड निर्भरता से स्वास्थ्य, पारिवारिक आय एवं कार्यक्षमता प्रभावित होती है। साझा सुई के उपयोग से HIV तथा हेपेटाइटिस-C का जोखिम बढ़ता है। सामाजिक कलंक उपचार से दूरी पैदा कर सकता है; उपयुक्त पुनर्वास के बिना कारावास भी पुनः नशे की सम्भावना बढ़ा सकता है।
- ऋणग्रस्तता, बच्चों की शिक्षा में बाधा और पारिवारिक हिंसा इसके अन्य प्रभाव हैं। तस्करी से जुड़े अवैध वित्तीय नेटवर्क तथा सम्भावित भ्रष्ट गठजोड़ सीमा और आन्तरिक सुरक्षा के लिए चुनौती हैं; हालाँकि प्रत्येक मामले में ऐसे सम्बन्धों का प्रमाण आवश्यक है।
सरकारी पहल एवं नीतिगत सीमाएँ
- स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act), 1985 प्रमुख कानूनी आधार है। नारकोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो, सीमा सुरक्षा बल, राज्य पुलिस तथा अन्य एजेंसियाँ अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाती हैं। पंजाब ने प्रवर्तन–नशामुक्ति–रोकथाम (EDP) दृष्टिकोण अपनाया।
- मार्च 2025 में ‘युद्ध नशेयां विरुद्ध’ अभियान आरम्भ हुआ और ‘पिण्ड दे पहरेदार’ के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने का प्रयास हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर नशा मुक्त भारत अभियान तथा उपचार कार्यक्रम प्रासंगिक हैं। केवल गिरफ्तारी एवं जब्ती की बढ़ती संख्या से नशे की उपलब्धता या निर्भरता में कमी सिद्ध नहीं होती।
| NDPS अधिनियम, 1985; अनुच्छेद 47—जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन को रोकने से सम्बन्धित नीति-निर्देशक सिद्धान्त; संघीय समन्वय; विधिसम्मत प्रक्रिया तथा मानवाधिकार। |
आगे की राह
- जिलेवार रणनीति में बड़े तस्करों एवं अवैध वित्त पर खुफिया-आधारित कार्रवाई के साथ गोपनीय जाँच, चिकित्सकीय परामर्श, जहाँ आवश्यक हो वहाँ ओपिऑइड-अगोनिस्ट उपचार और दीर्घकालीन पुनर्वास शामिल हों। विद्यालयों, पंचायतों, महिला समूहों और उपचार प्राप्त कर चुके लोगों को रोकथाम में भागीदार बनाया जाए, किन्तु भीड़-आधारित दण्डात्मक कार्रवाई से बचा जाए।
- स्थानीय रोजगार, कौशल, खेल सुविधाएँ तथा औषधि विक्रय की निगरानी समान रूप से जरूरी हैं। सफलता को ओवरडोज मौतों, उपचार की निरन्तरता, पुनः सेवन, नशीले पदार्थों की उपलब्धता और शिक्षा-संबन्धी संकेतकों से आँका जाना चाहिए। स्वास्थ्य, आजीविका एवं जवाबदेह पुलिस व्यवस्था का समन्वय ही स्थायी समाधान देगा।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. पंजाब में नशीले पदार्थों के संकट के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
I. गोल्डन क्रिसेंट में अफगानिस्तान, ईरान एवं पाकिस्तान सम्मिलित हैं।
II. पंजाब में ‘चिट्टा’ शब्द सामान्यतः हेरोइन के लिए प्रयुक्त होता है, जो ओपिऑइड वर्ग में आती है।
III. NDPS अधिनियम, 1985 केवल सीमा-पार तस्करी पर लागू होता है; घरेलू अपराध इसके अन्तर्गत नहीं आते।
IV. NDPS के अन्तर्गत दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि अपने-आप नशे की निर्भरता की व्यापकता बढ़ने का निर्णायक प्रमाण है।
कौनसे कथन सही हैं?
(A) केवल I और II
(B) केवल I, II और III
(C) केवल II, III और IV
(D) केवल I और IV
उत्तर—(A)
व्याख्या—कथन I एवं II सही हैं। NDPS अधिनियम घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों प्रकार के सम्बन्धित अपराधों को समेटता है, इसलिए कथन III गलत है। दर्ज मामलों की संख्या प्रवर्तन एवं रिपोर्टिंग से भी प्रभावित होती है; अतः कथन IV भी गलत है।