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Current Affairs - Daily 29 अक्टूबर 2026

एआई सामाजिक विरोधाभास: क्या बेहतर संवाद के बीच कमजोर पड़ रहा है मानवीय जुड़ाव?

जनरेटिव एआई माफी, शोक-संदेश, पेशेवर ईमेल और व्यक्तिगत बातचीत के लिए उपयुक्त शब्द चुनने में मदद करता है। हालांकि, विचारशील दिखने वाला संदेश वास्तविक सहानुभूति, समझ या भरोसे की गारंटी नहीं देता।

AI का सामाजिक विरोधाभास

  • दैनिक जीवन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग ने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है—क्या मनुष्य संवाद करने में अधिक कुशल बन रहा है, लेकिन दूसरों के साथ वास्तविक सम्बन्ध बनाने की क्षमता खोने का जोखिम भी बढ़ रहा है? 
  • जनरेटिव AI आज क्षमायाचना, शोक-सन्देश, कार्यालयी पत्राचार और निजी बातचीत तक के लिए उपयुक्त शब्द सुझाती है। किन्तु प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग अपने-आप में वास्तविक सहानुभूति, भावनात्मक समझ अथवा पारस्परिक विश्वास की गारंटी नहीं है। 
  • इसी विरोधाभास को ‘AI का सामाजिक विरोधाभास’ कहा जा सकता है। यह विषय नीतिशास्त्र, शिक्षा, सामाजिक कल्याण तथा उत्तरदायी तकनीकी विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

यह क्या है?

  • AI का सामाजिक विरोधाभास उस स्थिति को दर्शाता है, जिसमें तकनीक संवाद की गति, स्पष्टता और सुलभता बढ़ा देती है, परन्तु उससे सम्बन्धित मानवीय रिश्ते आवश्यक रूप से उतने मजबूत नहीं होते। 
  • AI द्वारा तैयार सहानुभूतिपूर्ण भाषा को वास्तविक मानवीय अनुभव के समान नहीं माना जा सकता। किसी मित्र को सान्त्वना देने वाला व्यक्ति साझा स्मृतियों को याद करता है, आवश्यकता पड़ने पर अपनी गलती स्वीकार करता है और संकट में समय तथा सहयोग देता है।
  • AI मुख्यतः डेटा में मौजूद भाषायी पैटर्न के आधार पर उत्तर तैयार करती है। प्रश्न यह नहीं कि उसके सुझाए शब्द उपयोगी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उन शब्दों के पीछे व्यक्ति की वास्तविक सहभागिता कितनी है।

वैचारिक पृष्ठभूमि

  • भावनात्मक बुद्धिमत्ता का अर्थ अपनी भावनाओं को पहचानना, प्रतिक्रियाओं पर नियन्त्रण रखना, दूसरों की अनुभूतियों को समझना और स्वस्थ पारस्परिक सम्बन्ध विकसित करना है। सहानुभूति, सक्रिय श्रवण, धैर्य तथा मतभेद सुलझाने जैसे कौशल वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में विकसित होते हैं। 
  • कोई प्रणाली ‘मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ’ जैसा वाक्य विश्वसनीय ढंग से लिख सकती है, लेकिन उसके पीछे मानवीय अनुभूति नहीं होती। प्रामाणिक संवाद केवल सही शब्द चुनने का नाम नहीं है; उसमें ईमानदार उद्देश्य, परिस्थिति की समझ तथा आवश्यकता पड़ने पर सहायता के लिए आगे आना भी शामिल है।

कारण एवं उभरती समस्याएँ

  • तेज जीवनशैली, तत्काल उत्तर देने का सामाजिक दबाव, भाषा सम्बन्धी असुरक्षा और मतभेदों का सामना करने में असुविधा लोगों को तैयार सन्देशों की ओर आकर्षित करती है।
  • समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सहायता धीरे-धीरे वास्तविक संवाद का स्थान लेने लगती है। जो व्यक्ति लगातार कठिन बातचीत AI के हवाले करता है, उसे क्षमा माँगने, सम्बन्धों की सीमाएँ निर्धारित करने और असहमति को धैर्य से सुनने का अभ्यास कम मिल सकता है। फिर भी सीमित AI-सहायता को स्वतः हानिकारक निर्भरता नहीं माना जा सकता।

अनुसन्धान से क्या संकेत मिलते हैं?

  • MIT से सम्बन्धित 2025 के एक नियन्त्रित अध्ययन में चार सप्ताह तक 981 प्रतिभागियों का परीक्षण किया गया। इसमें प्रयोग के तहत निर्धारित चैटबॉट संवाद-स्थितियों का स्पष्ट सांख्यिकीय प्रभाव नहीं मिला, किन्तु स्वेच्छा से अधिक उपयोग करने वालों में अपेक्षाकृत प्रतिकूल मनोसामाजिक परिणामों का सम्बन्ध देखा गया। 
  • वर्ष 2026 में Nature Human Behaviour में प्रकाशित 1,131 वयस्क AI-साथी उपयोगकर्ताओं के अध्ययन में भी पाया गया कि कल्याण से जुड़े परिणाम व्यक्ति के वास्तविक सामाजिक सम्पर्कों और चैटबॉट के साथ बातचीत के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग थे। इन निष्कर्षों से यह सिद्ध नहीं होता कि AI का उपयोग अनिवार्य रूप से अकेलापन पैदा करता है। कुछ अध्ययनों में सीमित भावनात्मक राहत और सामाजिक परिस्थितियों का अभ्यास करने जैसे सम्भावित लाभ भी सामने आए हैं।

बहुआयामी विश्लेषण

  • व्यक्तिगत स्तर पर AI उलझे विचारों को क्रमबद्ध करने, भाषायी बाधाएँ दूर करने और अभिव्यक्ति में कठिनाई अनुभव करने वाले लोगों को सहयोग देने में उपयोगी है। परिवार तथा समुदाय के स्तर पर अत्यधिक निर्भरता उन प्रत्यक्ष मुलाकातों को कम कर सकती है, जिनसे विश्वास और आपसी समझ विकसित होते हैं। 
  • बच्चों और किशोरों के लिए स्वचालित आश्वासन पर अधिक निर्भरता भावनात्मक परिपक्वता, असहमति स्वीकार करने तथा आयु-अनुकूल उपयोग से सम्बन्धित प्रश्न उत्पन्न करती है। शिक्षा में AI विद्यार्थियों का लेखन सुधार सकती है, परन्तु शिक्षकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सुन्दर भाषा में तैयार उत्तर स्वतन्त्र चिन्तन और मौलिक अभिव्यक्ति का विकल्प न बन जाएँ।

प्रशासन एवं लोकसेवा का पक्ष

  • सरकारी संस्थाएँ AI की सहायता से सूचनाओं का अनुवाद, जनशिकायतों के सरल उत्तर और भिन्न भाषायी या शैक्षिक पृष्ठभूमि के नागरिकों तक सेवाओं की पहुँच बेहतर बना सकती हैं। किन्तु विनम्र शब्दों में लिखा स्वचालित उत्तर न्यायपूर्ण प्रशासनिक निर्णय के समान नहीं है। 
  • उदाहरण के लिए, बाढ़ से विस्थापित परिवार की शिकायत पर उत्तर तैयार करने वाला जिलाधिकारी AI का उपयोग कर सकता है, लेकिन तथ्यों की पुष्टि, परिवार की वास्तविक परिस्थितियों की समझ और निर्णय की जवाबदेही उसी की होगी। तकनीक का उपयोग मानवीय उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने के लिए हो, लोगों से दूरी बनाने के लिए नहीं।

उदाहरण एवं नैतिक चुनौतियाँ

  • इस विरोधाभास से उत्पन्न जोखिम केवल संवाद कौशल तक सीमित नहीं हैं। लोग अत्यन्त निजी जानकारी साझा कर सकते हैं, जबकि उन्हें उसके संग्रहण और उपयोग की पर्याप्त जानकारी न हो। स्नेहपूर्ण व्यवहार करने वाली प्रणालियों से भावनात्मक निर्भरता विकसित होने अथवा उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक जोड़े रखने के लिए उनका उपयोग किए जाने की आशंका रहती है।
  • एल्गोरिद्मिक पूर्वाग्रह सांस्कृतिक रूप से अनुपयुक्त उत्तर उत्पन्न कर सकता है और गलत सलाह संवेदनशील परिस्थितियों में नुकसान पहुँचा सकती है। उदाहरणस्वरूप, शोक-सन्देश लिखने में AI संकोची व्यक्ति की सहायता कर सकती है, लेकिन वास्तविक करुणा फोन करने, मिलने अथवा व्यावहारिक मदद देने से भी प्रकट होती है। मूल नैतिक चुनौती तकनीकी सुविधा के साथ स्वायत्तता और जिम्मेदारी बनाए रखना है।

सरकारी पहल एवं आगे की राह

  • भारत सरकार ने मार्च 2024 में IndiaAI Mission को स्वीकृति दी थी, जिसका उद्देश्य देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का व्यापक पारिस्थितिकी तन्त्र विकसित करना है। इसका ‘Safe and Trusted AI’ घटक उत्तरदायी AI के विकास को प्रोत्साहित करता है। यद्यपि यह अभियान AI-सहचर्य से जुड़ी सभी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का प्रत्यक्ष समाधान नहीं है, फिर भी सुरक्षित तकनीकी विकास के लिए नीतिगत आधार प्रदान करता है। 
  • यूनेस्को के 2023 के जनरेटिव AI सम्बन्धी दिशानिर्देश मानव-केंद्रित उपयोग, डेटा की निजता और मानवीय स्वायत्तता पर बल देते हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में डिजिटल साक्षरता के साथ भावनात्मक शिक्षा, समूह चर्चा और AI द्वारा तैयार पाठ की आलोचनात्मक जाँच विकसित करनी चाहिए। तकनीकी प्लेटफॉर्मों को नाबालिगों के लिए उपयुक्त सुरक्षा, पारदर्शिता, निजता संरक्षण तथा हानिकारक व्यवहार की शिकायत के प्रभावी उपाय उपलब्ध कराने चाहिए।

निष्कर्ष

  • मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि संवाद में AI का उपयोग होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि किन मानवीय गुणों का संरक्षण हर परिस्थिति में आवश्यक है। इसके विपरीत, यदि वह संवेदनशीलता और जवाबदेही का विकल्प बन जाए, तो व्यक्ति आकर्षक सन्देशों से घिरा होने पर भी वास्तविक सम्बन्धों से दूर हो सकता है। 
  • मानवीय डिजिटल भविष्य वही होगा, जिसमें तकनीक हमारी एक-दूसरे को समझने की क्षमता बढ़ाए, लेकिन सम्बन्धों के लिए आवश्यक प्रयास, आत्मीयता और व्यक्तिगत उपस्थिति बनी रहे।

 

MCQs

प्रश्न 1. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सम्बन्ध में यूनेस्को की पहलों के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए - 

  1. यूनेस्को ने नवम्बर 2021 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता सम्बन्धी अनुशंसा (Recommendation on the Ethics of Artificial Intelligence) को अपनाया।
  2. यूनेस्को ने सितम्बर 2023 में शिक्षा एवं अनुसन्धान में जनरेटिव AI सम्बन्धी मार्गदर्शिका प्रकाशित की।
  3. वर्ष 2021 की अनुशंसा कानूनी रूप से बाध्यकारी अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय है।

उपर्युक्त में से कौनसे कथन सही हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर—(A)

व्याख्या: यूनेस्को ने 23 नवम्बर, 2021 को AI की नैतिकता सम्बन्धी अनुशंसा अपनाई थी, जबकि जनरेटिव AI सम्बन्धी मार्गदर्शिका 7 सितम्बर, 2023 को प्रकाशित हुई। वर्ष 2021 की अनुशंसा कानूनी रूप से बाध्यकारी अभिसमय नहीं है।