खराई ऊँट: नमक के अवैध पैन और तटीय अतिक्रमण से संकट में गुजरात की अनोखी नस्ल
खराई ऊँट गुजरात की एक विशिष्ट देशी नस्ल है, जो समुद्र में तैरकर मैंग्रोव क्षेत्रों तक पहुँचती है। नमक के पैनों का विस्तार और तटीय अतिक्रमण इसके चरागाहों तथा पशुपालकों की आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं।
- रिपोर्टों में गुजरात के कच्छ क्षेत्र में खराई ऊँटों के लिए नमक उत्पादन के अवैध पैनों और ज्वारीय खाड़ियों पर अतिक्रमण से उत्पन्न लगातार खतरों को उजागर किया गया है।
- मैंग्रोव संरक्षण और बहाली से संबंधित राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के निर्देशों के बावजूद चराई वाले आवासों को होने वाला नुकसान चिंता का विषय बना हुआ है।
नस्ल का परिचय
- खराई ऊँट एक दुर्लभ देशी पालतू ऊँट नस्ल है, जो गुजरात के तटीय और लवणीय क्षेत्रों से जुड़ी है।
- इसका नाम “खारा” शब्द से निकला है, जिसका अर्थ लवणीय होता है। यह नाम रेगिस्तानी और तटीय वातावरण के प्रति इसके अनुकूलन को दर्शाता है।
- राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने इसे एक अलग देशी ऊँट नस्ल के रूप में मान्यता दी है।
इसे तैराक ऊँट क्यों कहा जाता है?
- खराई ऊँट समुद्री पानी में तैरकर तटीय द्वीपों और मैंग्रोव वाले चराई क्षेत्रों तक पहुँच सकते हैं। ये लगभग तीन किलोमीटर तक की दूरी तैरने के लिए जाने जाते हैं।
- मैंग्रोव वनस्पति इनके आहार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। भूमि और ज्वारीय जल क्षेत्रों के बीच आवागमन की इनकी क्षमता इन्हें सामान्यतः शुष्क आंतरिक क्षेत्रों से जुड़ी ऊँट नस्लों से विशिष्ट बनाती है।
वितरण और पारंपरिक संरक्षक
- यह नस्ल मुख्यतः कच्छ तथा गुजरात के अन्य तटीय क्षेत्रों से जुड़ी है। रबारी और फकीरानी जाट पशुपालक समुदाय परंपरागत रूप से इन ऊँटों का पालन करते रहे हैं।
- ज्वार-भाटे, चराई मार्गों और मौसमी परिस्थितियों का उनका ज्ञान ऊँट पालन में सहायक है। यह नस्ल दूध उत्पादन और अन्य पशुपालन गतिविधियों के माध्यम से परिवारों की आजीविका में भी योगदान देती है।
प्रमुख खतरे
- नमक के पैनों का विस्तार: तटीय क्षेत्रों को नमक उत्पादन के पैनों में बदलने से पारंपरिक चरागाहों तक पहुँच कम होती है।
- ज्वारीय खाड़ियों पर अतिक्रमण: तटबंध और अवरुद्ध ज्वारीय जलमार्ग पानी के प्रवाह तथा मैंग्रोव क्षेत्रों तक पहुँच को प्रभावित कर सकते हैं।
- मैंग्रोव का क्षरण: मैंग्रोव वनस्पति के नुकसान से चारे की उपलब्धता घटती है।
- औद्योगिक विकास: तटीय अवसंरचना और औद्योगिक विस्तार चराई क्षेत्रों को खंडित कर सकते हैं तथा पारंपरिक आवागमन मार्गों में बाधा डाल सकते हैं।
संरक्षण का महत्त्व
- खराई ऊँटों की सुरक्षा के लिए इस नस्ल और इसके तटीय चराई पारिस्थितिकी तंत्र, दोनों का संरक्षण आवश्यक है।
- ज्वारीय प्रवाह की बहाली, अवैध अतिक्रमण की रोकथाम, मैंग्रोव की सुरक्षा और आवास प्रबंधन में पशुपालक समुदायों की भागीदारी प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं।
- इस नस्ल का संरक्षण पशुधन की आनुवंशिक विविधता और पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को भी सुरक्षित रखता है।
MCQ - HINDI:
प्रश्न: खराई ऊँट के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह गुजरात से जुड़ी एक देशी ऊँट नस्ल है।
- यह समुद्री पानी में तैरकर मैंग्रोव वाले चराई क्षेत्रों तक पहुँच सकता है।
- यह प्राकृतिक रूप से केवल हिमालय के शीत मरुस्थलों तक सीमित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
व्याख्या
- खराई ऊँट गुजरात के तटीय क्षेत्रों से जुड़े हैं और तैरकर मैंग्रोव चरागाहों तक पहुँचते हैं। ये हिमालय के शीत मरुस्थलों तक सीमित नहीं हैं।
SHORT NEWS
Hindi
अशोक सेन को ऑस्कर क्लाइन मेडल 2026
|
|
लियोनेल मेसी को प्रिंसेस ऑफ अस्तूरियस खेल पुरस्कार |
|
उषा मंगेशकर को प्रथम भूपेन हजारिका राष्ट्रीय पुरस्कार
|
|
| पद्मश्री सम्मानित शेफ दामू का निधन |
|
| जापानी लेखक रयू मुराकामी का निधन |
|
एशियाई पैरा खेल 2026 में भारत के रिकॉर्ड 114 पदक
|
|
पंकज आडवाणी का 29वाँ विश्व खिताब
|
|
पाकिस्तान में ‘Form 47 Government’ का अर्थ
|
|
| स्ट्रिंग थ्योरी और ब्लैक होल एंट्रॉपी |
|
| इरविन एलन सीली को लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान |
|