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Current Affairs - Daily 25 सितमबर 2026

उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की मांग: संविधान, प्रशासन और क्षेत्रीय राजनीति

उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की मांग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में है। उत्तर प्रदेश के मंत्री और SBSP प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि राज्य को जल्द चार हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। उन्होंने पूर्वांचल को प्रस्तावित राज्यों में शामिल करते हुए वहां राजभर समुदाय से मुख्यमंत्री बनने की बात भी कही। यह मांग नई नहीं है। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित किया था। हालांकि, यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। वर्तमान बहस में अनुच्छेद 3, प्रशासनिक दक्षता, क्षेत्रीय आकांक्षाओं, आर्थिक व्यवहार्यता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।

उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बाँटने की मांग: प्रशासन, संघवाद और क्षेत्रीय राजनीति का सवाल

उत्तर प्रदेश के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने हाल में दावा किया कि उत्तर प्रदेश को जल्द ही चार हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है और पूर्वांचल को “राजभर मुख्यमंत्री” मिल सकता है। उन्होंने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत और जाति जनगणना के बाद संभावित पुनर्गठन का उल्लेख किया है। हालांकि, यह राजभर का राजनीतिक दावा है; उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों में उत्तर प्रदेश के विभाजन का कोई विधायी निर्णय नहीं हुआ है। 

चार राज्यों का प्रस्ताव क्या है?

  • उत्तर प्रदेश के विभाजन की वर्तमान बहस मुख्यतः चार व्यापक क्षेत्रों—पश्चिमी उत्तर प्रदेश/पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल—के इर्द-गिर्द है। ये प्रस्तावित क्षेत्र हैं, आधिकारिक रूप से निर्धारित नई राज्यों की सीमाएँ नहीं। 
  • इस विचार को सबसे स्पष्ट राजनीतिक रूप 2011 में मिला, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने विधानसभा में उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया। तर्क था कि विशाल भौगोलिक क्षेत्र और क्षेत्रीय विकास असमानताओं के कारण छोटे राज्यों में प्रशासन और विकास अधिक प्रभावी हो सकता है। प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन बाद में आगे नहीं बढ़ा। 

संविधान में राज्यों के पुनर्गठन का प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्य बनाने तथा मौजूदा राज्यों के क्षेत्रफल, सीमाओं और नामों में परिवर्तन करने की शक्ति देता है। संसद किसी राज्य से क्षेत्र अलग करके नया राज्य बना सकती है, राज्यों को मिला सकती है अथवा किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा या घटा सकती है। 
  • प्रक्रिया में राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक है। यदि प्रस्ताव किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार के लिए भेजते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य विधानमंडल की राय बाध्यकारी नहीं है; अंतिम निर्णय संसद का होता है।
  • अनुच्छेद 4 के तहत ऐसे पुनर्गठन कानून में आवश्यक पूरक, आकस्मिक और परिणामी प्रावधान किए जा सकते हैं और इसे अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन नहीं माना जाता। इसलिए भारतीय व्यवस्था में राज्य पुनर्गठन के लिए अपेक्षाकृत लचीली संवैधानिक प्रक्रिया मौजूद है।

अनुच्छेद 3 भारतीय संघवाद को कैसे दर्शाता है?

  • अनुच्छेद 3 भारतीय संघवाद की केंद्रीय प्रवृत्ति को दर्शाता है। राज्यों की सीमाएँ बदलने की निर्णायक शक्ति संसद के पास है और राज्य की सहमति अनिवार्य नहीं है। साथ ही, राज्य विधानमंडल को अपनी राय रखने का अवसर देकर संघीय परामर्श का तत्व भी रखा गया है। इस प्रकार भारत का संघवाद स्थिर सीमाओं पर आधारित संघवाद के बजाय लचीले और पुनर्गठन-सक्षम संघवाद का उदाहरण है। 

नए राज्यों के निर्माण के प्रमुख आधार

  • भारत में राज्यों का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक आधार पर नहीं हुआ। भाषा, क्षेत्रीय पहचान, सांस्कृतिक विशिष्टता, आर्थिक असमानता, प्रशासनिक सुविधा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रमुख कारक रहे हैं। 1956 का States Reorganisation Act मुख्यतः भाषाई आधार पर राज्यों के व्यापक पुनर्गठन का महत्वपूर्ण चरण था। बाद में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का गठन क्षेत्रीय विकास एवं प्रशासनिक मांगों से जुड़ा रहा। गृह मंत्रालय आज भी नए राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की मांगों को राज्य पुनर्गठन के विषय के रूप में देखता है। 

छोटे राज्य: अवसर और चुनौतियाँ

  • छोटे राज्यों से प्रशासनिक पहुंच, स्थानीय प्रतिनिधित्व, नीति-निर्माण में क्षेत्रीय प्राथमिकताओं और विकास योजनाओं के बेहतर लक्ष्यीकरण में सहायता मिल सकती है। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ का अनुभव इस बहस के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण उपलब्ध कराता है।
  • लेकिन छोटा आकार अपने आप सुशासन की गारंटी नहीं देता। राज्य विभाजन के बाद नई राजधानी, विधानसभा, सचिवालय, उच्च न्यायालयीय व्यवस्था, पुलिस-प्रशासनिक ढाँचा, सरकारी संस्थानों और कर्मचारियों का पुनर्विन्यास करना पड़ता है। इसके अलावा संपत्ति, ऋण, जल, बिजली, परिवहन, प्राकृतिक संसाधन और राजस्व के बँटवारे से जुड़े प्रश्न उत्पन्न होते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में इनकी जटिलता और अधिक होगी।

क्षेत्रीय आकांक्षा बनाम राष्ट्रीय एकीकरण

  • भारत का अनुभव बताता है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संवैधानिक तरीके से स्वीकार करना हमेशा राष्ट्रीय एकता के विपरीत नहीं होता। राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी भाषाई और क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय एकीकरण के साथ संतुलित करने पर विचार किया था। 
  • इसलिए राज्य की सीमा निर्धारित करने के लिए किसी एक कसौटी—प्रशासनिक दक्षता, क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक व्यवहार्यता या राजनीतिक प्रतिनिधित्व—को सार्वभौमिक मानक नहीं माना जा सकता। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में किसी भी भविष्य के पुनर्गठन पर निर्णय लेते समय इन सभी कारकों के साथ राजस्व क्षमता, संसाधन-वितरण, संस्थागत व्यवहार्यता और नागरिकों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक होगा।

MCQ HINDI

प्रश्न. उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित करने के प्रस्ताव के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्यों के गठन तथा मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं या नाम में परिवर्तन करने की शक्ति देता है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किए गए विचार संसद के लिए बाध्यकारी होते हैं।
3. वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश विधानसभा ने राज्य को चार क्षेत्रों में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया था।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(A) केवल 1 और 3
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 2
(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (A) केवल 1 और 3

व्याख्या:

  • अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्यों के गठन तथा मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं या नाम में परिवर्तन की शक्ति देता है। 
  • संबंधित राज्य विधानमंडल को अपनी राय व्यक्त करने का अवसर दिया जाता है, लेकिन उसकी राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती। 
  • नवंबर 2011 में मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित किया था। 
  • यह प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन इसके आधार पर नए राज्यों का गठन नहीं हो सका।