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Current Affairs - Daily 23 सितमबर 2026

उच्च शिक्षा में दिव्यांग विद्यार्थी: प्रवेश से आगे डिजिटल पहुंच और शैक्षणिक सहायता की चुनौती

भारत में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा की चुनौती केवल प्रवेश, आरक्षण या भवनों तक भौतिक पहुँच तक सीमित नहीं है। डिजिटल मंचों की सुगमता, सुलभ अध्ययन सामग्री, उचित समायोजन, सहायक प्रौद्योगिकी, उपचारात्मक शैक्षणिक सहायता और वास्तविक अधिगम परिणामों की निगरानी भी समान भागीदारी के लिए आवश्यक हैं।

उच्च शिक्षा में दिव्यांग विद्यार्थी: प्रवेश से आगे डिजिटल पहुँच और शैक्षणिक सहायता की चुनौती

पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शिक्षा, सामाजिक न्याय, कमजोर वर्ग, सरकारी नीतियाँ और संस्थागत तंत्र; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — डिजिटल समावेशन और प्रौद्योगिकी।

स्रोत एवं तिथि: 22 सितंबर 2026 की समकालीन रिपोर्टिंग; विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उच्च शिक्षण संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों के लिए पहुँच-सुगमता संबंधी दिशा-निर्देश; दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016; तथा अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2023–24।

मूल समस्या क्या है?

भारत में दिव्यांग विद्यार्थियों के संदर्भ में नीतिगत व्यवस्था प्रवेश, आरक्षण और भौतिक पहुँच पर लगातार अधिक ध्यान दे रही है।

लेकिन किसी विद्यार्थी का विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में प्रवेश हो जाना अपने-आप पूर्ण समावेशन सुनिश्चित नहीं करता।

प्रवेश के बाद भी दो बड़ी बाधाएँ बनी रह सकती हैं:

डिजिटल पहुँच-अंतर + उपचारात्मक/शैक्षणिक सहायता-अंतर

यदि विश्वविद्यालय का डिजिटल पोर्टल, अध्ययन-सामग्री, रिकॉर्डेड व्याख्यान, परीक्षा प्रणाली या शैक्षणिक सहायता व्यवस्था सुलभ नहीं है, तो विद्यार्थी औपचारिक रूप से नामांकित होने के बावजूद वास्तविक शिक्षा में समान रूप से भाग नहीं ले सकता।

इसलिए:

नामांकन ≠ प्रभावी भागीदारी

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 16 समावेशी शिक्षा को केवल प्रवेश या भवन तक पहुँच तक सीमित नहीं रखती।

इसके तहत संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे:

  • भेदभाव रहित प्रवेश सुनिश्चित करें,
  • भवन, परिसर और सुविधाओं को सुलभ बनाएँ,
  • व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार उचित समायोजन उपलब्ध कराएँ,
  • आवश्यक व्यक्तिगत या अन्य सहायता दें,
  • उपयुक्त भाषा और संचार माध्यम उपलब्ध कराएँ,
  • विशिष्ट अधिगम अक्षमताओं के लिए शैक्षणिक उपाय अपनाएँ,
  • तथा विद्यार्थियों की भागीदारी, शैक्षणिक प्रगति और शिक्षा की पूर्णता की निगरानी करें।

इससे एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है:

औपचारिक पहुँच ≠ वास्तविक समावेशन

उचित समायोजन क्या है?

उचित समायोजन का अर्थ है व्यक्ति की विशेष आवश्यकता के अनुसार ऐसी आवश्यक और उपयुक्त व्यवस्था करना जिससे वह अन्य लोगों के समान अपने अधिकारों का उपयोग कर सके, बशर्ते उससे अनुपातहीन या अनुचित बोझ न पड़े।

उच्च शिक्षा में इसका अर्थ परिस्थितियों के अनुसार हो सकता है:

  • सुलभ अध्ययन सामग्री
  • सहायक प्रौद्योगिकी
  • परीक्षा में आवश्यक व्यवस्था
  • नोट लेने में सहायता
  • उपयुक्त संचार माध्यम
  • समय-संबंधी लचीलापन
  • शैक्षणिक मार्गदर्शन

इसलिए समावेश का अर्थ प्रत्येक विद्यार्थी को बिल्कुल एक जैसी व्यवस्था देना नहीं है।

बल्कि:

समान अवसर के लिए आवश्यकतानुसार भिन्न सहायता

यूजीसी का दृष्टिकोण क्या है?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने “उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के लिए पहुँच-सुगमता दिशा-निर्देश एवं मानक” जारी किए हैं।

यूजीसी के अनुसार प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को दिव्यांग व्यक्तियों के लिए ऐसी प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जो छात्र की पूरी शैक्षणिक यात्रा को समाहित करे:

प्रवेश → अध्ययन → मूल्यांकन → पाठ्यक्रम पूर्णता

यूजीसी का उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों की उच्च शिक्षण संस्थानों में बाधारहित भागीदारी और समावेशन सुनिश्चित करना है।

इसका अर्थ है कि केवल रैंप या सुलभ शौचालय बना देना पर्याप्त संस्थागत अनुपालन नहीं माना जा सकता।

उपचारात्मक शैक्षणिक सहायता क्यों आवश्यक है?

दिव्यांग विद्यार्थी एक समान समूह नहीं हैं।

अलग-अलग विद्यार्थियों की शैक्षणिक आवश्यकताएँ अलग हो सकती हैं।

उदाहरण के लिए किसी विद्यार्थी को आवश्यकता हो सकती है:

  • अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता,
  • नोट लेने में सहयोग,
  • सुलभ अध्ययन सामग्री,
  • सहायक तकनीक,
  • मार्गदर्शन,
  • समय-संबंधी लचीलापन,
  • या लक्षित उपचारात्मक शिक्षण की।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की निर्दिष्ट दिव्यांगताओं को मान्यता दी गई है। दृष्टिबाधिता, श्रवण बाधिता, विशिष्ट अधिगम अक्षमता, ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी या मनोसामाजिक दिव्यांगता वाले विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ एक जैसी नहीं हो सकतीं।

इसलिए:

समान पाठ्यक्रम + आवश्यकता के अनुसार विभेदित सहायता = अधिक वास्तविक समावेश

डिजिटल पहुँच-अंतर क्यों बढ़ रहा है?

आधुनिक उच्च शिक्षा लगातार डिजिटल प्रणालियों पर निर्भर होती जा रही है:

अधिगम प्रबंधन प्रणाली + विश्वविद्यालय पोर्टल + ई-पुस्तकें + डिजिटल पुस्तकालय + रिकॉर्डेड व्याख्यान + ऑनलाइन असाइनमेंट + परीक्षा पोर्टल

यदि ये प्रणालियाँ पहुँच-सुगम नहीं हैं, तो डिजिटल तकनीक स्वयं एक नई बाधा बन सकती है।

दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए उपयोगी डिजिटल सुविधाओं में शामिल हैं:

  • स्क्रीन रीडर के अनुकूल सामग्री
  • कीबोर्ड से संचालित की जा सकने वाली वेबसाइट
  • वीडियो में उपशीर्षक
  • पाठ-प्रतिलिपि
  • चित्रों के लिए वैकल्पिक पाठ
  • पहुँच-सुगम पीडीएफ
  • आवश्यकतानुसार भारतीय सांकेतिक भाषा सहायता

इसलिए:

भौतिक रूप से सुलभ परिसर ≠ डिजिटल रूप से सुलभ विश्वविद्यालय

सहायक प्रौद्योगिकी की भूमिका

सहायक प्रौद्योगिकी शिक्षा में पहुँच का महत्त्वपूर्ण साधन बन सकती है।

उदाहरण:

  • स्क्रीन रीडर
  • स्क्रीन आवर्धक
  • ब्रेल उपकरण
  • वाक्-से-पाठ तकनीक
  • पाठ-से-वाक् प्रणाली
  • कैप्शनिंग
  • सांकेतिक भाषा आधारित सामग्री

लेकिन केवल उपकरण उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है।

यदि विश्वविद्यालय की वेबसाइट, पीडीएफ या अधिगम प्रबंधन प्रणाली स्वयं पहुँच-सुगम ढंग से तैयार नहीं है, तो सहायक तकनीक की उपयोगिता भी सीमित हो सकती है।

इसलिए बेहतर सिद्धांत है:

बाद में पहुँच जोड़ना नहीं → आरंभ से ही पहुँच-सुगम रूपांकन

आँकड़े क्या बताते हैं?

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2023–24 के अनुसार उच्च शिक्षा में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले 54,080 विद्यार्थी नामांकित थे।

इनमें:

  • 34,080 पुरुष
  • 20,000 महिलाएँ

शामिल थीं। आधिकारिक आँकड़े उच्च शिक्षा में दिव्यांग विद्यार्थियों की भागीदारी के साथ-साथ उल्लेखनीय लैंगिक अंतर भी दिखाते हैं।

समकालीन विश्लेषण के अनुसार यह संख्या कुल उच्च शिक्षा नामांकन का लगभग 0.12 प्रतिशत है।

लेकिन समस्या केवल संख्या कम होने की नहीं है।

नामांकन आँकड़े पर्याप्त क्यों नहीं हैं?

नामांकन आँकड़ा हमें यह बताता है:

कितने विद्यार्थी संस्थान में पहुँचे?

लेकिन यह आवश्यक रूप से नहीं बताता:

  • कितनों को सुलभ डिजिटल सामग्री मिली?
  • कितने विद्यार्थी स्क्रीन रीडर के साथ विश्वविद्यालय पोर्टल चला पाए?
  • कितने रिकॉर्डेड व्याख्यानों में उपशीर्षक थे?
  • कितनों को सांकेतिक भाषा सहायता मिली?
  • कितनों को उपचारात्मक शैक्षणिक सहायता मिली?
  • कितने विद्यार्थी सफलतापूर्वक पाठ्यक्रम पूरा कर पाए?

इसलिए:

प्रवेश का आँकड़ा ≠ अनुभव की गुणवत्ता का आँकड़ा

आँकड़ा और जवाबदेही की कमी

समावेशन की प्रभावशीलता मापने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि किसी संस्थान में कितने दिव्यांग विद्यार्थी पंजीकृत हैं।

बेहतर संकेतक यह माप सकते हैं कि कितने विद्यार्थियों को वास्तव में मिला:

सुलभ अधिगम प्रबंधन मंच + स्क्रीन रीडर अनुकूल सामग्री + उपशीर्षक + सांकेतिक भाषा सहायता + सुलभ ई-पुस्तकें + सहायक प्रौद्योगिकी + शैक्षणिक सहायता

यदि संस्थागत मूल्यांकन केवल रैंप, आरक्षण या नामांकन तक सीमित रहे, तो वास्तविक सीखने की बाधाएँ अदृश्य बनी रह सकती हैं।

भागीदारी, प्रगति और पूर्णता क्यों मापनी चाहिए?

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 16 में भागीदारी, उपलब्धि स्तर के संदर्भ में प्रगति और शिक्षा पूर्ण करने की निगरानी का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

यह नीति को केवल इनपुट से परिणाम की ओर ले जाता है:

इनपुट दृष्टिकोण: रैंप बना? प्रवेश मिला? उपकरण खरीदा?

से

परिणाम दृष्टिकोण: विद्यार्थी भाग ले पाया? सीख पाया? प्रगति हुई? पाठ्यक्रम पूरा किया?

यही अधिकार-आधारित समावेशन की अधिक मजबूत कसौटी है।

संस्थागत व्यवस्था कैसी होनी चाहिए?

एक प्रभावी उच्च शिक्षा संस्थान में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सहायता किसी एक कार्यालय तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

आवश्यक व्यवस्था में शामिल हो सकते हैं:

  • सक्रिय दिव्यांग सहायता प्रकोष्ठ
  • प्रशिक्षित शिक्षक और कर्मचारी
  • सुलभ डिजिटल मंच
  • सहायक प्रौद्योगिकी
  • परीक्षा संबंधी उचित समायोजन
  • मार्गदर्शन और परामर्श
  • उपचारात्मक शैक्षणिक सहायता
  • शिकायत निवारण
  • नियमित परिणाम-निगरानी

यूजीसी के पहुँच-सुगमता ढाँचे का व्यापक दृष्टिकोण भी छात्र की यात्रा को प्रवेश से पाठ्यक्रम पूर्ण होने तक देखने पर बल देता है।

केवल एक जैसी व्यवस्था देना समानता क्यों नहीं है?

दिव्यांगता के संदर्भ में समान व्यवहार और समान अवसर हमेशा एक ही बात नहीं होते।

यदि सभी विद्यार्थियों को बिल्कुल समान प्रारूप में अध्ययन सामग्री दी जाए, लेकिन दृष्टिबाधित विद्यार्थी उस सामग्री को स्क्रीन रीडर से पढ़ ही न सके, तो औपचारिक समानता वास्तविक समानता नहीं बनती।

इसी प्रकार यदि वीडियो सभी को दिया जाए लेकिन उसमें उपशीर्षक न हों, तो श्रवण बाधित विद्यार्थी समान रूप से भाग नहीं ले सकता।

इसलिए:

समानता ≠ सबको बिल्कुल एक जैसा देना

बल्कि:

समान अवसर = बाधा के अनुसार आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना

अधिकार-आधारित मॉडल कैसा होना चाहिए?

उच्च शिक्षा में दिव्यांग समावेशन को केवल भौतिक अवसंरचना अनुपालन से आगे बढ़ाकर अधिगम पहुँच पर केंद्रित करने की आवश्यकता है।

एक प्रभावी मॉडल हो सकता है:

आरंभ से पहुँच-सुगम डिजिटल मंच + प्रशिक्षित शिक्षक + दिव्यांग सहायता प्रकोष्ठ + सहायक प्रौद्योगिकी + मार्गदर्शन + उपचारात्मक सहायता + परिणाम-निगरानी

अंतिम प्रश्न होना चाहिए:

क्या विद्यार्थी समान शर्तों पर सामग्री तक पहुँच सका, भाग ले सका, सीख सका और पाठ्यक्रम पूरा कर सका?


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“समावेशी उच्च शिक्षा का आकलन केवल प्रवेश और आरक्षण से नहीं, बल्कि भागीदारी, अधिगम और पाठ्यक्रम पूर्णता से किया जाना चाहिए।” भारत में दिव्यांग विद्यार्थियों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. शैक्षणिक संस्थानों से व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार उचित समायोजन उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जाती है।
  2. अधिनियम के अंतर्गत समावेशी शिक्षा केवल भवनों की भौतिक पहुँच तक सीमित है।
  3. विद्यार्थियों की भागीदारी, शैक्षणिक प्रगति और शिक्षा पूर्ण करने की निगरानी का प्रावधान है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 1 और 3

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: धारा 16 केवल भौतिक पहुँच तक सीमित नहीं है। इसमें उचित समायोजन, व्यक्तिगत सहायता, उपयुक्त संचार माध्यम तथा प्रत्येक दिव्यांग विद्यार्थी की भागीदारी, शैक्षणिक प्रगति और शिक्षा की पूर्णता की निगरानी जैसे प्रावधान भी शामिल हैं।

प्रश्न 2

दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए डिजिटल पहुँच-सुगमता में निम्नलिखित में से कौन-से उपाय सहायक हो सकते हैं?

  1. स्क्रीन रीडर के अनुकूल दस्तावेज़
  2. उपशीर्षक और पाठ-प्रतिलिपि
  3. कीबोर्ड से संचालित की जा सकने वाली वेबसाइट
  4. चित्रों के लिए वैकल्पिक पाठ

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

A. केवल 1 और 2

B. केवल 2, 3 और 4

C. केवल 1, 3 और 4

D. 1, 2, 3 और 4

सही उत्तर: D

व्याख्या: दिव्यांग विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए डिजिटल पहुँच के लिए स्क्रीन रीडर अनुकूलता, उपशीर्षक, पाठ-प्रतिलिपि, कीबोर्ड नेविगेशन और वैकल्पिक पाठ जैसे कई उपायों का संयोजन आवश्यक हो सकता है।