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Current Affairs - Daily 19 अक्टूबर 2026

भारत में स्टांपेड और भीड़ सुरक्षा

भारत में अधिकांश स्टांपेड धार्मिक और तीर्थ स्थलों पर होती हैं। इन घटनाओं के पीछे भीड़ का व्यवहार, कमजोर अवसंरचना, प्रशासनिक लापरवाही और दिशानिर्देशों के कमजोर क्रियान्वयन जैसे कारण काम करते हैं।

भारत में भगदड़

  • पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — आपदा प्रबंधन, जन सुरक्षा और शासन।
  • स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस, 18 अक्टूबर 2026।

हालिया संदर्भ

कोलकाता में 18 अक्टूबर की शाम दुर्गा पूजा पंडाल में हुई एक दुखद भीड़-उभार की घटना में कम-से-कम 19 लोगों की मृत्यु हो गई और लगभग 25 लोग घायल हो गए। इसने एक बार फिर बड़े आयोजनों में प्रभावी भीड़ प्रबंधन और जन-सुरक्षा उपायों की तत्काल आवश्यकता को उजागर किया है।

यह घटना भारत में हाल के कई घातक भीड़-दुर्घटनाओं के बाद सामने आई है, जिनमें जनवरी 2025 की प्रयागराज महाकुंभ त्रासदी, फरवरी 2025 का नई दिल्ली रेलवे स्टेशन भीड़-दबाव हादसा और जून 2025 में बेंगलुरु में आईपीएल विजय समारोह के दौरान हुई त्रासदी शामिल हैं। ऐसी बार-बार होने वाली घटनाओं ने बड़े सार्वजनिक आयोजनों में भीड़ नियंत्रण, आपात तैयारी, अवसंरचनात्मक योजना और सुरक्षा प्रोटोकॉल के पालन को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं।

भगदड़ क्या है?

भगदड़, या भीड़-दबाव दुर्घटना (Crowd Crush), तब होती है जब लोग किसी सीमित या अपनी क्षमता से अधिक भरे हुए स्थान में अचानक और अनियंत्रित ढंग से हिलने-डुलने लगते हैं। मृत्यु केवल पैरों तले रौंदे जाने से ही नहीं होती, बल्कि दाबजन्य श्वासावरोध (Compressive Asphyxia) के कारण भी होती है, जब शरीर इतने अधिक दब जाते हैं कि सांस लेना असंभव हो जाता है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) भगदड़ को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत मानवजनित आपदा मानता है। व्यापक रूप से, भीड़-दबाव की घटनाएँ एकदिशीय हो सकती हैं, जब एक दिशा में चल रही भीड़ का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, या अशांत हो सकती हैं, जब अनेक दिशाओं में अराजक गति शुरू हो जाती है।

समस्या का परिमाण

भारत ने कई बड़ी त्रासदियाँ देखी हैं, जिनमें 1954 की इलाहाबाद कुंभ भगदड़, 2005 की मांधारदेवी मंदिर दुर्घटना, और 2024 की हाथरस त्रासदी शामिल हैं, जिसमें 121 लोगों की मृत्यु हुई थी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार 2000 से 2022 के बीच 3,074 मौतें दर्ज की गईं, जबकि पिछले तीन दशकों में लगभग 4,000 घटनाएँ होने की सूचना है। ऐसी घटनाओं में भारी बहुमत धार्मिक आयोजनों से जुड़ा रहा है।

ये घटनाएँ बार-बार क्यों होती हैं?

तात्कालिक कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन संरचनात्मक विफलताएँ लगभग समान रहती हैं। अनेक आयोजनों में कमजोर स्थल-योजना, संकरे मार्ग, प्रवेश और निकास के संयुक्त रास्ते, अपर्याप्त बैरिकेडिंग और अत्यधिक भीड़ जैसी समस्याएँ होती हैं। कई मामलों में भीड़ क्षमता या सुरक्षा अनुपालन की उचित जाँच किए बिना अनुमति दे दी जाती है।

समन्वय की विफलता स्थिति को और गंभीर बना देती है। जिला प्रशासन, पुलिस और आयोजक अक्सर किसी एकीकृत कमान प्रणाली के बिना काम करते हैं। सीसीटीवी, ड्रोन और वास्तविक समय पर भीड़-घनत्व निगरानी जैसी तकनीकों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता। सामाजिक व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण है। बहुत से लोग तब तक भीड़भाड़ को गंभीर जोखिम नहीं मानते, जब तक परिस्थितियाँ अत्यंत संकटपूर्ण न हो जाएँ।

दिशानिर्देश विफल क्यों हो जाते हैं?

भारत के पास पहले से ही एनडीएमए के भीड़-प्रबंधन दिशानिर्देश हैं, फिर भी उनका क्रियान्वयन कमजोर बना हुआ है। स्थानीय प्राधिकारियों के पास प्रायः प्रशिक्षित जनशक्ति, प्रवर्तन क्षमता और सुरक्षा-प्रथम कार्य-संस्कृति का अभाव होता है। अवसंरचना भी अपर्याप्त है। गृह मंत्रालय की 2017 की एक रिपोर्ट में पाया गया था कि केवल 43% प्रमुख आयोजन स्थलों पर बुनियादी भीड़-सुरक्षा अवसंरचना उपलब्ध थी।

तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी एक अतिरिक्त चुनौती है, क्योंकि इससे सार्वजनिक स्थलों, परिवहन केंद्रों और तीर्थ मार्गों पर दबाव बढ़ता है।

 

आगे की राह

भारत को अनिवार्य लाइसेंसिंग, आयोजकों की स्पष्ट जवाबदेही, वास्तविक समय पर भीड़ निगरानी, चौड़े मार्ग, प्रवेश और निकास के अलग-अलग रास्ते तथा प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की व्यवस्था की आवश्यकता है। बड़े आयोजनों से पहले सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किए जाने चाहिए, और जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को सुव्यवस्थित आवागमन और भीड़ अनुशासन के पालन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

मूल नीतिगत सीख

भगदड़ को संकीर्ण अर्थ में प्रायः “दुर्घटना” कह दिया जाता है, जबकि अधिकांश मामलों में वे योजना, अवसंरचना, समन्वय और जोखिम-समझ की पूर्वानुमेय विफलताओं का परिणाम होती हैं। वास्तविक नीतिगत चुनौती नए दिशानिर्देश जारी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भीड़ सुरक्षा शासन का एक अनिवार्य और अपरिवर्तनीय हिस्सा बने।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

विस्तृत सुरक्षा दिशानिर्देशों और बार-बार की त्रासदियों के बावजूद भारत में भगदड़ की घटनाएँ क्यों दोहराई जाती हैं? भीड़ व्यवहार, शासनगत विफलताओं और अवसंरचना की भूमिका के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न

भीड़-दबाव दुर्घटनाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भगदड़ में मृत्यु बड़े पैमाने पर रौंदे जाने के बिना भी हो सकती है।
  2. भीड़-दबाव दुर्घटना तब उत्पन्न हो सकती है जब भीड़-घनत्व इतना अधिक हो जाए कि व्यक्तियों की स्वतंत्र गति पर उनका नियंत्रण समाप्त हो जाए।
  3. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत सभी भगदड़ घटनाओं को प्राकृतिक आपदा के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: A

व्याख्या: अनेक मौतें केवल रौंदे जाने से नहीं, बल्कि दाबजन्य श्वासावरोध के कारण भी होती हैं। भीड़-घनत्व अपने-आप में घातक दबाव उत्पन्न कर सकता है। एनडीएमए भगदड़ को प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवजनित आपदा मानता है।