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Current Affairs - Daily 25 सितमबर 2026

विशेष गहन पुनरीक्षण: मतदाता सूची की शुद्धता बनाम गलत वंचना का जोखिम

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध बनाना है, लेकिन बड़े पैमाने पर तकनीकी विसंगतियों, नोटिस और अपीलों ने यह प्रश्न उठाया है कि सूची की शुद्धता सुनिश्चित करते समय किसी पात्र नागरिक को गलत तरीके से वंचित होने से कैसे बचाया जाए।

विशेष गहन पुनरीक्षण: मतदाता सूची की शुद्धता बनाम गलत वंचना का जोखिम

पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — निर्वाचन आयोग, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, चुनाव सुधार, संवैधानिक संस्थाएँ और लोकतांत्रिक अधिकार।

स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस में शशि थरूर का विचार लेख, 24 सितंबर 2026; साथ में निर्वाचन आयोग, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 तथा एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग में सुप्रीम कोर्ट का 27 मई 2026 का निर्णय।

चर्चा में क्यों?

विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, स्थानांतरित, दोहराए गए या अन्यथा अपात्र नामों की पहचान करना है।

लेकिन बड़े पैमाने पर मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहराए गए नामों की श्रेणियों में चिह्नित किए जाने तथा तकनीकी और तार्किक विसंगतियों के आधार पर नोटिस भेजे जाने से विवाद बढ़ा है।

दिल्ली में लगभग 47.5 लाख मतदाताओं को नाम हटाने से जुड़ी श्रेणियों में चिह्नित किए जाने की खबरें आईं, जबकि लगभग 33 लाख मतदाताओं को तकनीकी या अभिलेखीय विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए गए।

नोटिस जारी होना अपने-आप अंतिम रूप से नाम हटना नहीं है।

इस पूरी प्रक्रिया का केंद्रीय प्रश्न है:

मतदाता सूची को शुद्ध कैसे रखा जाए, बिना किसी पात्र नागरिक को गलत तरीके से बाहर किए?

विशेष गहन पुनरीक्षण का कानूनी आधार क्या है?

संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण से जुड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी देता है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) निर्वाचन आयोग को कारण दर्ज करके किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके भाग की मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराने की शक्ति देती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि यह प्रक्रिया अनुच्छेद 324 के साथ धारा 21(3) से कानूनी आधार प्राप्त करती है।

न्यायालय ने यह भी माना कि निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक प्रक्रिया संबंधी अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन इनका प्रयोग वैधानिक और संवैधानिक सुरक्षा के अनुरूप होना चाहिए।

अनुच्छेद 326 और मताधिकार

संविधान का अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार पर आधारित करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के निर्णय में मताधिकार को संवैधानिक अधिकार माना, लेकिन यह अधिकार पात्रता और विधिसम्मत सत्यापन से पूरी तरह मुक्त नहीं है।

मतदाता की पहचान, सामान्य निवास और अन्य पात्रता शर्तों का सत्यापन मतदाता सूची के रखरखाव का वैध हिस्सा हो सकता है।

इसलिए:

मताधिकार + शुद्ध मतदाता सूची = परस्पर पूरक संवैधानिक उद्देश्य

पात्र मतदाता को गलत तरीके से हटाने से कौन-सी सुरक्षा है?

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 मतदाता सूची की किसी प्रविष्टि में सुधार, स्थानांतरण या विलोपन की अनुमति देती है, लेकिन इसके लिए तथ्यों का उचित सत्यापन आवश्यक है।

यदि किसी मतदाता का नाम इस आधार पर हटाने का प्रस्ताव है कि वह अब सामान्य निवासी नहीं है या पंजीकरण का अधिकारी नहीं है, तो प्रक्रिया में सुनवाई का उचित अवसर महत्त्वपूर्ण सुरक्षा है।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR के संदर्भ में कहा कि संदिग्ध प्रविष्टियों के मामले में नोटिस, उत्तर देने का अवसर, जाँच और कारणयुक्त निर्णय जैसी प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं।

अधिनियम की धारा 24 अपील की वैधानिक व्यवस्था भी प्रदान करती है।

इसलिए:

सॉफ्टवेयर संकेत ≠ अंतिम विलोपन

नोटिस ≠ मताधिकार समाप्त

तकनीकी विसंगतियाँ विवाद का कारण क्यों बनीं?

डिजिटल डेटाबेस में पुराने और नए अभिलेखों का मिलान करते समय नाम की वर्तनी, आयु, माता-पिता के नाम, पारिवारिक संबंध और पुराने मतदाता अभिलेखों से मानचित्रण जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

दिल्ली में बड़ी संख्या में मतदाताओं को “स्वयं के नाम में असंगति”, पुराने SIR से मानचित्रण न होने और अन्य तार्किक विसंगतियों के आधार पर नोटिस मिले।

तकनीकी प्रणाली किसी प्रविष्टि को जाँच के लिए चिह्नित कर सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय व्यक्तिगत सत्यापन और मानव समीक्षा के बाद होना चाहिए।

यही प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

स्वचालित संकेतों की सीमा क्या है?

मतदाता सूची के बड़े डिजिटल डेटाबेस में स्वचालित विश्लेषण प्रशासनिक दक्षता बढ़ा सकता है।

लेकिन गलत सकारात्मक संकेतों की संख्या अधिक होने पर वास्तविक और पात्र मतदाताओं पर दस्तावेजी तथा प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक विसंगतियों वाले मतदाताओं के लिए नामों को सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित करने और दस्तावेज या आपत्तियाँ प्रतिनिधियों के माध्यम से जमा करने जैसी सहूलियतें देने के निर्देश भी दिए थे।

इससे एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है:

तकनीक जाँच शुरू कर सकती है, लेकिन व्यक्तिगत अधिकार का अंतिम निर्णय केवल एल्गोरिद्मिक संकेत पर आधारित नहीं होना चाहिए।

पश्चिम बंगाल का अनुभव क्या बताता है?

पश्चिम बंगाल में SIR के बाद लगभग 27.16 लाख नाम हटाए गए, और बाद में 22 लाख से अधिक प्रभावित मतदाताओं ने पुनः नाम जोड़ने के लिए अपील की।

एक पूर्व चरण में सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार निपटाई गई 82,782 अपीलों में से 75,443 मामलों, अर्थात लगभग 91 प्रतिशत, में नाम वापस जोड़े गए थे।

लेकिन यह आँकड़ा केवल उस समय तक निपटाई गई अपीलों के समूह से संबंधित था।

इसे यह प्रमाण नहीं माना जा सकता कि पूरे देश में SIR के दौरान हटाए गए 91 प्रतिशत नाम गलत थे।

यह उदाहरण केवल यह दर्शाता है कि बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण में प्रभावी अपील तंत्र और समय पर सुधार अत्यंत आवश्यक हैं।

मतदाता सूची में नाम हटना इतना गंभीर क्यों है?

मतदाता सूची में नाम का होना मतदान करने की व्यावहारिक पूर्वशर्त है।

यदि पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाता है, तो उसका संवैधानिक मताधिकार व्यवहार में निष्प्रभावी हो सकता है।

विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों, गरीब नागरिकों, किरायेदारों, बुजुर्गों और दस्तावेजी कठिनाइयों का सामना करने वाले लोगों पर प्रशासनिक बोझ अधिक पड़ सकता है।

इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं है।

इसका अर्थ पात्र नागरिकों का नाम सुरक्षित रखना भी है।

निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया क्यों चर्चा में आई?

द इंडियन एक्सप्रेस की एक जाँच रिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग दस महीनों में कम-से-कम 14 अवसरों पर कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियाँ दर्ज कीं।

रिपोर्ट के अनुसार इन आपत्तियों में फॉर्म 6 में परिवर्तन, मतदाता डेटाबेस तक पहुँच, नाम जोड़ने और हटाने से जुड़े कुछ निर्णय तथा प्रक्रिया के केंद्रीकरण से संबंधित मुद्दे शामिल थे।

ये तथ्य इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग पर आधारित हैं और इन्हें निर्वाचन आयोग के अंतिम न्यायिक रूप से स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

रिपोर्ट के प्रकाशन तक निर्वाचन आयोग ने अखबार द्वारा भेजे गए विस्तृत प्रश्नों का सार्वजनिक उत्तर नहीं दिया था।

निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय का महत्त्व

निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है।

ऐसी संस्था की विश्वसनीयता केवल अंतिम निर्णय पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह भी महत्त्वपूर्ण है कि निर्णय किस प्रक्रिया से लिया गया और असहमति को किस प्रकार दर्ज तथा निपटाया गया।

आंतरिक असहमति अपने-आप संस्थागत कमजोरी का प्रमाण नहीं है।

पारदर्शी ढंग से दर्ज और विधिसम्मत तरीके से निपटाई गई असहमति संस्थागत उत्तरदायित्व को मजबूत भी कर सकती है।

इसलिए:

संस्थागत स्वतंत्रता + सामूहिक निर्णय + दर्ज असहमति + पारदर्शी प्रक्रिया = संवैधानिक विश्वसनीयता

शुद्ध मतदाता सूची क्यों आवश्यक है?

मतदाता सूची में मृत, दोहराए गए, स्थायी रूप से स्थानांतरित या अन्यथा अपात्र नाम बने रहने से चुनावी अभिलेखों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी 2026 में माना कि गैर-सूचित मृत्यु, बड़े पैमाने पर प्रवासन और दोहराव जैसी समस्याएँ व्यापक पुनरीक्षण के वैध कारण हो सकती हैं।

इसलिए मतदाता सूची का समय-समय पर पुनरीक्षण आवश्यक प्रशासनिक कार्य है।

लेकिन शुद्धता का लक्ष्य स्वयं में पर्याप्त नहीं है।

उस लक्ष्य तक पहुँचने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष और समावेशी होनी चाहिए।

प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत

यदि किसी नागरिक के नाम को मतदाता सूची से हटाने का निर्णय उसके अधिकार को प्रभावित करता है, तो प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के तत्व महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

मुख्य तत्व हैं:

सूचना + स्पष्ट कारण + उत्तर देने का अवसर + निष्पक्ष सुनवाई + कारणयुक्त निर्णय + अपील

यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं है।

यह गलत प्रशासनिक निर्णय से नागरिक को बचाने वाली सुरक्षा है।

नोटिस स्पष्ट और सुलभ क्यों होने चाहिए?

यदि नोटिस तकनीकी भाषा में हो, कारण अस्पष्ट हो या नागरिक को यह न पता हो कि कौन-सा दस्तावेज जमा करना है, तो सुनवाई का अधिकार व्यवहार में कमजोर हो सकता है।

इसलिए नोटिस में स्पष्ट होना चाहिए कि:

  • विसंगति क्या है।
  • किस आधार पर प्रविष्टि जाँच के दायरे में आई।
  • कौन-से दस्तावेज स्वीकार्य हैं।
  • उत्तर देने की अंतिम तिथि क्या है।
  • सुनवाई कहाँ होगी।
  • प्रतिकूल निर्णय के विरुद्ध अपील कहाँ की जा सकती है।

नोटिस देना पर्याप्त नहीं है; नोटिस समझने योग्य और कार्रवाई योग्य भी होना चाहिए।

फॉर्म 6 क्या है?

फॉर्म 6 सामान्यतः नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए उपयोग किया जाता है।

निर्वाचन आयोग के मतदाता सेवा पोर्टल पर 18 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले पात्र नागरिकों को नए मतदाता पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 उपलब्ध कराया जाता है।

2026 में फॉर्म 6 में SIR से जुड़े कुछ अतिरिक्त प्रश्न जोड़ने को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर आपत्ति दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई।

इसलिए फॉर्म 6 को नाम हटाने का सामान्य फॉर्म समझना गलत होगा।

फॉर्म 7 क्या है?

निर्वाचन आयोग के मतदाता सेवा पोर्टल के अनुसार फॉर्म 7 मौजूदा मतदाता सूची से नाम हटाने के अनुरोध से जुड़ा है।

यूपीएससी के लिए यह अंतर उपयोगी है:

फॉर्म 6 → नए मतदाता के पंजीकरण से जुड़ा

फॉर्म 7 → नाम हटाने या विलोपन अनुरोध से जुड़ा

SIR में अपील व्यवस्था क्यों आवश्यक है?

बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण में त्रुटि की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती।

इसलिए अपील व्यवस्था किसी वैकल्पिक सुविधा की तरह नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण सुधारात्मक सुरक्षा की तरह काम करती है।

प्रभावी अपील प्रणाली में:

  • पर्याप्त अपीलीय अधिकारी होने चाहिए।
  • प्रक्रिया आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए।
  • अत्यधिक दस्तावेजी बोझ नहीं होना चाहिए।
  • मामलों का समयबद्ध निपटारा होना चाहिए।
  • अंतिम निर्णय का स्पष्ट कारण दर्ज होना चाहिए।

यदि लाखों अपील लंबित रहें, तो वैधानिक उपचार व्यवहार में कमजोर हो सकता है।

सॉफ्टवेयर शासन में पारदर्शिता

मतदाता सूची के डिजिटलीकरण से खोज, मिलान, दोहराव की पहचान और अभिलेख प्रबंधन आसान हो सकता है।

लेकिन चुनाव जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सॉफ्टवेयर के निर्णय नियमों की पारदर्शिता भी महत्त्वपूर्ण है।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं:

  • कौन-से मापदंड किसी व्यक्ति को विसंगति के रूप में चिह्नित करते हैं?
  • त्रुटिपूर्ण संकेतों की दर कितनी है?
  • कौन अधिकारी स्वचालित परिणाम को बदल सकता है?
  • परिवर्तन का डिजिटल अभिलेख रखा जाता है या नहीं?
  • नागरिक को उसके विरुद्ध प्रयुक्त कारण पता चलता है या नहीं?
  • मानवीय समीक्षा किस स्तर पर होती है?

इसलिए:

डिजिटल दक्षता ≠ अपारदर्शी स्वचालन

निर्वाचन आयोग की जवाबदेही और स्वतंत्रता

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए आवश्यक है।

लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएँ पारदर्शिता, कारणयुक्त निर्णय और वैधानिक समीक्षा से बाहर हो जाएँ।

संवैधानिक संस्था के लिए स्वतंत्रता और जवाबदेही परस्पर विरोधी नहीं हैं।

वास्तव में दोनों एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं।

इसलिए:

स्वतंत्रता + पारदर्शिता + प्रक्रियात्मक निष्पक्षता = संस्थागत विश्वास

मुख्य शासन चुनौती

SIR का वैध उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना है।

लेकिन बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण व्यवस्था को गलत सकारात्मक संकेतों को न्यूनतम करना होगा।

विशेष रूप से दस्तावेजी कठिनाइयों, प्रवासन, भाषायी अंतर और डिजिटल पहुँच की कमी से जूझने वाले नागरिकों को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

एक मजबूत पुनरीक्षण प्रक्रिया में निम्न तत्व आवश्यक हैं:

व्यक्तिगत सत्यापन + स्पष्ट कारण + सुलभ नोटिस + पर्याप्त उत्तर समय + मानवीय समीक्षा + प्रभावी अपील + पारदर्शी सॉफ्टवेयर शासन

लोकतांत्रिक सफलता का माप केवल यह नहीं है कि कितने अपात्र नाम हटाए गए।

वास्तविक मानक है:

शुद्ध मतदाता सूची + पात्र नागरिकों की न्यूनतम गलत वंचना


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“मतदाता सूची की शुचिता उतनी ही पात्र मतदाताओं को गलत वंचना से बचाने पर निर्भर करती है, जितनी अपात्र प्रविष्टियों को हटाने पर।” विशेष गहन पुनरीक्षण और निर्वाचन आयोग के संवैधानिक दायित्व के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची की तैयारी और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित संवैधानिक शक्तियाँ प्रदान करता है।
  2. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराने की अनुमति देती है।
  3. विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सॉफ्टवेयर द्वारा चिह्नित प्रत्येक मतदाता का नाम स्वतः मतदाता सूची से समाप्त हो जाता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 1 और 2

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: अनुच्छेद 324 और धारा 21(3) मतदाता सूची पुनरीक्षण का संवैधानिक और वैधानिक आधार प्रदान करते हैं, लेकिन तकनीकी संकेत या नोटिस अपने-आप अंतिम विधिसम्मत विलोपन नहीं होता।

प्रश्न 2

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 के SIR निर्णय में मताधिकार को संवैधानिक अधिकार माना, जो वैध पात्रता और सत्यापन आवश्यकताओं के अधीन हो सकता है।
  3. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 किसी डेटाबेस विसंगति के आधार पर बिना सत्यापन और सुनवाई के पात्र मतदाता का नाम हटाने की अनुमति देती है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 1 और 2

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार का संवैधानिक आधार है और सुप्रीम कोर्ट ने सत्यापन को इस अधिकार के साथ संगत माना है, जबकि धारा 22 उचित तथ्य-सत्यापन और लागू परिस्थितियों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा की अपेक्षा करती है।