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Current Affairs - Daily 14 अक्टूबर 2026

विरोध का अधिकार और निवारक पुलिसिंग : संवैधानिक संतुलन

शांतिपूर्ण विरोध संविधान-संरक्षित अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इसका पर्यवेक्षण किया जा सकता है। संवैधानिक प्रश्न यह है कि निवारक पुलिसिंग कब आवश्यक विनियमन से असंगत निषेध में बदल जाती है।

विरोध का अधिकार और निवारक पुलिसिंग

  • पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — मौलिक अधिकार, संवैधानिक शासन, पुलिस शक्तियाँ, सार्वजनिक व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा।

  • स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस, 12 अक्टूबर 2026।

हालिया संदर्भ

मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की माँग को लेकर दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के आसपास लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों — जिनमें निषेधाज्ञा, निवारक हिरासत, बैरिकेडिंग, मेट्रो प्रतिबंध और ट्रेनों का रद्द होना शामिल है — ने शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संवैधानिक तनाव को फिर से सामने ला दिया है।

9 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने व्यापक परिवहन प्रतिबंधों पर सवाल उठाया और आनुपातिकता के सिद्धांत पर बल देते हुए ऐसे अत्यधिक व्यापक उपायों के प्रति चेताया जो विरोध प्रदर्शन से असंबंधित लोगों को भी प्रभावित करते हैं।

संवैधानिक क्रम इस प्रकार है:

विरोध का अधिकार → स्वीकार्य विनियमन → निवारक कार्रवाई → आनुपातिकता → न्यायिक समीक्षा

अनुच्छेद 19

संविधान स्पष्ट रूप से “विरोध के अधिकार” शब्द का प्रयोग नहीं करता, लेकिन यह अधिकार मुख्य रूप से निम्नसे प्राप्त होता है:

  • अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता;

  • अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार।

हालाँकि ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं।

अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ आधारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंधों की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद 19(3) भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा सार्वजनिक व्यवस्था के हित में शांतिपूर्ण सभा पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।

इस प्रकार:

  • शांतिपूर्ण विरोध = मौलिक अधिकार

  • हर स्थान और हर तरीके से अप्रतिबंधित विरोध ≠ मौलिक अधिकार

विरोध का विनियमन

सार्वजनिक सड़कों, परिवहन प्रणालियों और संवेदनशील सरकारी क्षेत्रों के अनेक प्रतिस्पर्धी उपयोग होते हैं।

हिमत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि राज्य सार्वजनिक सड़कों पर सभाओं को विनियमित कर सकता है, लेकिन विनियमन की शक्ति सभा के अधिकार को समाप्त करने वाली मनमानी शक्ति में परिवर्तित नहीं हो सकती।

सिद्धांत है:

  • समय, स्थान और तरीके का विनियमन → स्वीकार्य

  • मनमाना या व्यापक दमन → संवैधानिक रूप से संदिग्ध

मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों से संबंधित मामले में न्यायालय ने इसी प्रकार व्यापक प्रतिबंध को अस्वीकार किया और प्रदर्शनकारियों, निवासियों तथा यात्रियों के हितों में संतुलन स्थापित करने वाला ढाँचा बनाने की आवश्यकता बताई।

निवारक पुलिसिंग

पुलिस की शक्तियाँ केवल अपराध हो जाने के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं हैं।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 168 पुलिस अधिकारियों को अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार संज्ञेय अपराधों को रोकने का दायित्व देती है।

इसलिए अधिकारी निम्न कारकों पर विचार कर सकते हैं:

पूर्व आचरण + वर्तमान खुफिया सूचना + भीड़ का आकार + स्थान + विशिष्ट सुरक्षा खतरे

किसी पूर्व विरोध प्रदर्शन में हुई हिंसा भविष्य के जोखिम के आकलन में वैध रूप से प्रासंगिक हो सकती है।

हालाँकि:

पूर्व अव्यवस्था ≠ प्रत्येक भविष्य के विरोध पर स्वतः प्रतिबंध का आधार

निवारक शक्ति का संबंध विश्वसनीय संभावित खतरे से बना रहना चाहिए।

BNSS धारा 163

BNSS की धारा 163, जो व्यापक रूप से पूर्व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 की व्यवस्था का स्थान लेती है, उन निर्दिष्ट परिस्थितियों में तत्काल निवारक आदेश जारी करने की अनुमति देती है जहाँ तुरंत रोकथाम या त्वरित उपचार आवश्यक हो।

ऐसे आदेश सभा, आवाजाही या विशेष गतिविधियों को प्रतिबंधित कर सकते हैं।

लेकिन असाधारण निवारक शक्तियों के लिए पर्याप्त गंभीर तथ्यात्मक आधार आवश्यक है।

मधु लिमये बनाम सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (1970) में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व धारा 144 की शक्ति के असाधारण और आपातकालीन स्वरूप पर बल दिया।

नियामक सिद्धांत है:

वास्तविक और आसन्न खतरा → लक्षित निवारक प्रतिबंध

इसके बजाय:

संभावित असुविधा → नियमित व्यापक निषेध

आनुपातिकता सिद्धांत

केंद्रीय संवैधानिक सुरक्षा आनुपातिकता है।

किसी प्रतिबंध का वैध उद्देश्य होना चाहिए, उसका उस उद्देश्य से तार्किक संबंध होना चाहिए, वह आवश्यक होना चाहिए और उससे प्राप्त सार्वजनिक लाभ की तुलना में अत्यधिक बोझ नहीं डालना चाहिए।

अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि अधिकारियों को कार्रवाई के लिए वास्तविक हिंसा होने तक प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है, लेकिन निवारक प्रतिबंधों को संवैधानिक जाँच पर खरा उतरना चाहिए और उनका उपयोग वैध लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के दमन के लिए नहीं किया जा सकता।

विरोध प्रदर्शनों पर लागू करने पर: सीमित स्थानों पर विशिष्ट खतरा → लक्षित प्रतिबंध

को उचित ठहराना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, इसकी तुलना में: असंबंधित नागरिकों को प्रभावित करने वाला पूरे शहर का परिवहन व्यवधान

तृतीय-पक्ष अधिकार

मेट्रो स्टेशन बंद करना या ट्रेनें रद्द करना केवल प्रदर्शनकारियों को प्रभावित नहीं करता।

इसका बोझ पड़ सकता है:

श्रमिक + विद्यार्थी + मरीज + यात्री + व्यवसाय + सामान्य आवागमन करने वाले नागरिक

इसलिए सार्वजनिक-व्यवस्था संबंधी उपायों में तीसरे पक्ष के अधिकारों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय के 9 अक्टूबर के हस्तक्षेप में यही तर्क दिखाई दिया: अधिकारियों को पूर्ण परिवहन बंदी लगाने के बजाय व्यापक प्रतिबंधों पर पुनर्विचार करने और व्यवधान को न्यूनतम करने के लिए कहा गया।

संवेदनशील क्षेत्र

दिल्ली में संसद, राष्ट्रपति भवन, सर्वोच्च न्यायालय और अन्य संवेदनशील संस्थान अपेक्षाकृत छोटे भौगोलिक क्षेत्र में स्थित हैं।

इसलिए सुरक्षा, भीड़ क्षमता और पहुँच मार्ग अधिक कठोर विनियमन को उचित ठहरा सकते हैं।

किसी एक स्थल पर विरोध की अनुमति मिलने से प्रतिबंधित प्रतिष्ठान की ओर मार्च करने का स्वतः अधिकार नहीं बनता।

हालाँकि विरोध राजनीतिक संचार का भी माध्यम है। प्रदर्शनकारियों को ऐसे दूरस्थ स्थान पर भेजना जहाँ उनका संदेश लगभग अदृश्य हो जाए, अधिकार के व्यावहारिक मूल्य को कमजोर कर सकता है।

संतुलन है: सार्थक दृश्यता ↔ संवेदनशील संस्थानों की सुरक्षा

वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल

जहाँ प्रस्तावित स्थल क्षमता या सुरक्षा कारणों से अनुपयुक्त हो, वहाँ युक्तियुक्त वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराना प्रतिस्पर्धी हितों में संतुलन स्थापित करने में सहायक हो सकता है।

इससे राज्य की कार्रवाई बदलती है: निषेध से विनियमित सुविधा में।

इसलिए अनुमति प्रणाली अपने-आप असंवैधानिक नहीं है। उसकी वैधता स्पष्ट मानकों, गैर-मनमाने प्रयोग और व्यावहारिक विकल्पों पर निर्भर करती है।

शाहीन बाग मामला

शाहीन बाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सार्वजनिक मार्गों पर अनिश्चितकाल तक इस प्रकार कब्जा नहीं किया जा सकता कि अन्य नागरिक उनका उपयोग न कर सकें।

यह व्यापक सिद्धांत को मजबूत करता है:

असहमति का अधिकार + अन्य लोगों की गतिशीलता और पहुँच का अधिकार → सह-अस्तित्व

न तो विरोध का अधिकार और न ही प्रशासनिक सुविधा स्वतः दूसरे अधिकार को समाप्त कर सकती है।

न्यायिक समीक्षा

पुलिस और कार्यपालिका प्रारंभिक आकलन करती हैं क्योंकि निवारक निर्णय अक्सर घटनाओं के घटित होने से पहले लेने पड़ते हैं।

लेकिन उनके निष्कर्ष अंतिम नहीं होते।

संवैधानिक न्यायालय जाँच कर सकते हैं कि प्रतिबंध ( वैध + प्रासंगिक सामग्री पर आधारित + आवश्यक + गैर-मनमाना + आनुपातिक) था या नहीं।

दिल्ली के प्रतिबंधों पर सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान जाँच दर्शाती है कि निवारक पुलिसिंग न्यायिक निगरानी के अधीन रहती है। हालिया कार्यवाहियों में आनुपातिक पुलिसिंग की अनुमति देते हुए स्वतंत्र आवाजाही और शांतिपूर्ण गतिविधियों की सुरक्षा पर भी बल दिया गया है।

मूल नीतिगत सीख

भारतीय संवैधानिक कानून दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करता है:

राज्य को कार्रवाई से पहले हिंसा होने की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है।

लेकिन समान रूप से:

अव्यवस्था की संभावना शांतिपूर्ण सभा के दमन का स्थायी आधार नहीं बन सकती।

उचित संवैधानिक क्रम है:

खतरे का आकलन → संकीर्ण विनियमन → शांतिपूर्ण असहमति की सुविधा → तृतीय-पक्ष अधिकारों की रक्षा → अनुपातहीन कार्रवाई की समीक्षा

इसलिए केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस विरोध प्रदर्शन को विनियमित कर सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि अपनाए गए साधन वास्तविक सार्वजनिक-व्यवस्था खतरे के अनुपात में हैं या नहीं।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“निवारक पुलिसिंग संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है, लेकिन इसे शांतिपूर्ण असहमति समाप्त करने का नियमित साधन नहीं बनाया जा सकता।” अनुच्छेद 19 और आनुपातिकता के सिद्धांत के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

भारत में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अनुच्छेद 19(1)(क) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

  2. अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने के अधिकार की रक्षा करता है।

  3. सार्वजनिक व्यवस्था इन दोनों स्वतंत्रताओं पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का संवैधानिक रूप से मान्य आधार है।

  4. संविधान प्रदर्शनकारियों को अपनी पसंद के किसी भी स्थान पर अप्रतिबंधित विरोध का अधिकार प्रदान करता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1 और 2
B. केवल 1, 2 और 3
C. केवल 2, 3 और 4
D. 1, 2, 3 और 4

सही उत्तर: B

व्याख्या: अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) क्रमशः अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की रक्षा करते हैं, जबकि अनुच्छेद 19(2) और 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था सहित विभिन्न आधारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देते हैं। ये स्वतंत्रताएँ किसी भी स्थान और किसी भी परिस्थिति में सभा करने का पूर्ण अधिकार प्रदान नहीं करतीं।

प्रश्न 2

निवारक शक्तियों और संवैधानिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. कुछ परिस्थितियों में वास्तविक हिंसा होने से पहले भी निवारक कार्रवाई की जा सकती है।

  2. आनुपातिकता के सिद्धांत के तहत यह जाँचना आवश्यक है कि कोई प्रतिबंध वैध उद्देश्य प्राप्त करने के लिए आवश्यक सीमा से आगे तो नहीं जाता।

  3. सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर निषेधाज्ञा जारी हो जाने के बाद संवैधानिक न्यायालय उसकी आवश्यकता या आनुपातिकता की जाँच नहीं कर सकते।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: पर्याप्त विश्वसनीय संभावित खतरे के विरुद्ध निवारक शक्तियाँ राज्य को पहले से कार्रवाई की अनुमति दे सकती हैं, लेकिन ऐसे उपाय न्यायिक समीक्षा के अधीन रहते हैं। आनुपातिकता के माध्यम से न्यायालय यह जाँचते हैं कि प्रतिबंध वैध उद्देश्य के संदर्भ में उपयुक्त, आवश्यक और अत्यधिक तो नहीं है।