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Current Affairs - Daily 19 अक्टूबर 2026

सार्वजनिक मृत्युदंड और राज्य शक्ति

सार्वजनिक मृत्युदंड लंबे समय तक राज्य की शक्ति और निवारण का साधन था। आधुनिक व्यवस्था में दंड सार्वजनिक प्रदर्शन से हटकर कानूनी प्रक्रिया, संस्थागत नियंत्रण और मानव गरिमा से जुड़ गया है।

सार्वजनिक मृत्युदंड और राज्य शक्ति

  • पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — विश्व इतिहास और प्रबोधन; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV — राज्य शक्ति, दंड और मानव गरिमा।
  • स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस, 16 अक्टूबर 2026।

हालिया संदर्भ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सेना के पूर्व मेजर निडाल हसन को दिए जाने वाले निर्धारित मृत्युदंड के सीधे प्रसारण की मंजूरी वापस ले ली है। हसन को 2009 में फोर्ट हुड में 13 लोगों की हत्या का दोषी ठहराया गया था। उन्हें 3 दिसंबर को फायरिंग स्क्वॉड द्वारा मृत्युदंड दिया जाना निर्धारित है, लेकिन अब इस प्रक्रिया का सार्वजनिक सीधा प्रसारण नहीं किया जाएगा।

इस विवाद ने उस पुरानी बहस को फिर जीवित कर दिया है कि क्या दंड को राज्य की शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन होना चाहिए या उसे नियंत्रित कानूनी प्रक्रिया तक सीमित रहना चाहिए।

राज्य शक्ति के रूप में दंड

प्राचीन और पूर्व-आधुनिक समाजों में गंभीर अपराधों को अक्सर शासक की सत्ता के लिए चुनौती के रूप में देखा जाता था। इसलिए सार्वजनिक मृत्युदंड का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति का प्रदर्शन करना भी था।

रोमन मृत्युदंड प्रायः जानबूझकर सार्वजनिक रूप से दिए जाते थे। सार्वजनिक समारोहों, घोषणाओं और बड़ी भीड़ की उपस्थिति ने दंड को राजनीतिक प्रदर्शन का रूप दे दिया था। अधिकारियों का यह भी मानना था कि प्रत्यक्ष पीड़ा को देखकर अन्य लोग समान अपराध करने से हतोत्साहित होंगे।

हालाँकि सार्वजनिक दंड में एक जोखिम भी था। यदि भीड़ दोषी व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखने लगे, तो यह प्रदर्शन राज्य की सत्ता को मजबूत करने के बजाय कमजोर भी कर सकता था।

दंड और औपनिवेशिक नियंत्रण

सार्वजनिक दंड का उपयोग विजित आबादी को नियंत्रित करने के लिए भी किया गया। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने भारतीय विद्रोहियों को सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड दिया।

ऐसे दंड का राजनीतिक संदेश व्यक्तिगत अपराध से कहीं व्यापक था। इसका उद्देश्य औपनिवेशिक प्रभुत्व का प्रदर्शन करना और आगे के प्रतिरोध को हतोत्साहित करना था।

इससे स्पष्ट होता है कि जब राज्य भय के माध्यम से आज्ञापालन सुनिश्चित करने का प्रयास करता है, तो दंड राजनीतिक नियंत्रण का साधन बन सकता है।

प्रबोधन का प्रभाव

अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान प्रबोधन विचारों ने तर्कशीलता, मानवतावाद और व्यक्तिगत अधिकारों को बढ़ावा दिया। सार्वजनिक मृत्युदंड को धीरे-धीरे क्रूर और अव्यवस्थित माना जाने लगा।

ब्रिटेन ने 1868 में सार्वजनिक मृत्युदंड औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया, जबकि अमेरिका में भी मृत्युदंड धीरे-धीरे कारागार की दीवारों के भीतर स्थानांतरित हो गया। 1936 में रेनी बेथिया को दिया गया मृत्युदंड सामान्यतः अमेरिका का अंतिम वैध सार्वजनिक मृत्युदंड माना जाता है।

इस प्रकार ध्यान धीरे-धीरे पीड़ा के सार्वजनिक प्रदर्शन से हटकर संस्थाओं के माध्यम से दंड लागू करने पर केंद्रित हो गया।

फूको और आधुनिक दंड

फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको ने अपनी कृति Discipline and Punish में तर्क दिया कि इस परिवर्तन का अर्थ राज्य शक्ति का समाप्त होना नहीं था।

पूर्ववर्ती शासक दोषी व्यक्ति के शरीर पर प्रत्यक्ष दंड देकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते थे। आधुनिक राज्य इसके बजाय कारागारों, निगरानी, पर्यवेक्षण और संस्थागत अनुशासन पर अधिक निर्भर होने लगे।

इसलिए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नियंत्रण की पद्धति में था। सार्वजनिक हिंसा का महत्त्व कम हुआ, जबकि निरंतर संस्थागत विनियमन अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया।

 

निवारण और मानव गरिमा

सार्वजनिक दंड के समर्थकों ने अक्सर यह तर्क दिया है कि उसकी दृश्यता निवारक प्रभाव को मजबूत करती है। हालाँकि सार्वजनिक मृत्युदंड से अतिरिक्त निवारक प्रभाव उत्पन्न होता है या नहीं, यह विवादित है।

आधुनिक संवैधानिक व्यवस्थाएँ दंड का मूल्यांकन अब अधिकाधिक विधि की उचित प्रक्रिया, आनुपातिकता और मानव गरिमा के आधार पर करती हैं, न कि पीड़ा की सार्वजनिक दृश्यता के आधार पर।

भारत में मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय इसे असाधारण दंड मानता है। बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में न्यायालय ने “दुर्लभतम से दुर्लभ” सिद्धांत विकसित किया। बाद के निर्णयों में भी यह दोहराया गया है कि आजीवन कारावास सामान्य नियम है और मृत्युदंड एक अपवाद है।

मूल नीतिगत सीख

सार्वजनिक मृत्युदंड का पतन राज्य शक्ति की प्रकृति में आए गहरे परिवर्तन को दर्शाता है। पहले की सरकारें दृश्य दंड के माध्यम से अपनी सत्ता प्रदर्शित करती थीं। आधुनिक संवैधानिक राज्य अब अधिकाधिक कानूनी प्रक्रिया, संस्थागत संयम और मानव गरिमा के सम्मान के माध्यम से अपनी वैधता स्थापित करते हैं।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“सार्वजनिक मृत्युदंड का पतन केवल दंड की पद्धति में परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य शक्ति की प्रकृति में बदलाव को दर्शाता है।” प्रबोधन विचारों और मिशेल फूको के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

दंड के सिद्धांतों और व्यवहार के विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. पूर्व-आधुनिक समाजों में सार्वजनिक मृत्युदंड निवारक और राजनीतिक, दोनों उद्देश्यों की पूर्ति कर सकता था।
  2. मिशेल फूको ने आधुनिक कारागारों के उदय को व्यक्तियों पर राज्य नियंत्रण के समाप्त होने से जोड़ा।
  3. प्रबोधन विचारों ने मुख्यतः सार्वजनिक प्रदर्शन पर आधारित दंड की आलोचना को बढ़ावा दिया।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1 और 2
B. केवल 1 और 3
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: सार्वजनिक दंड निवारक और राजनीतिक, दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करता था। फूको का तर्क था कि राज्य नियंत्रण समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसका स्वरूप बदलकर संस्थाओं और अनुशासन के माध्यम से संचालित होने लगा।

प्रश्न 2

भारत में मृत्युदंड के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. आजीवन कारावास को सामान्य नियम और मृत्युदंड को असाधारण दंड माना जाता है।
  2. “दुर्लभतम से दुर्लभ” सिद्धांत के तहत न्यायालय केवल अपराध की प्रकृति से संबंधित परिस्थितियों पर विचार करते हैं।
  3. न्यायालय द्वारा मृत्युदंड पर विचार करते समय भी मानव गरिमा की संवैधानिक अवधारणा प्रासंगिक बनी रहती है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1
B. केवल 2
C. केवल 1 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: C

व्याख्या: मृत्युदंड एक असाधारण दंड है। सजा निर्धारित करते समय अपराध की प्रकृति के साथ अपराधी की व्यक्तिगत परिस्थितियों और शमनकारी कारकों पर भी विचार किया जाता है। मृत्युदंड के संदर्भ में भी मानव गरिमा संवैधानिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनी रहती है।