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28 सितमबर 2026
पूम्पुहार में समुद्री खुदाई से चोलकालीन व्यापार के नए प्रमाण
तमिलनाडु के पूम्पुहार में हालिया समुद्री पुरातात्विक खुदाई से प्राचीन चोल बंदरगाह के समुद्री व्यापार और बस्ती के विस्तार के नए प्रमाण मिले हैं।
पूम्पुहार में समुद्री खुदाई से चोलकालीन व्यापार के नए प्रमाण
खबरों में क्यों?
- तमिलनाडु के प्राचीन चोल बंदरगाह पूम्पुहार में 18 दिनों तक की गई समुद्री पुरातात्विक खुदाई से इसके प्राचीन समुद्री संबंधों के नए प्रमाण मिले हैं।
- यह अभियान तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग और इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी ने संयुक्त रूप से किया।
प्रमुख खोजें
- खुदाई में प्राप्त हुए:
- पश्चिम एशियाई टॉरपीडो जार का एक टुकड़ा।
- चार टेराकोटा रिंग वेल।
- 250 से अधिक सिरेमिक अवशेष।
- टॉरपीडो जार का उपयोग प्राचीन समुद्री व्यापार में शराब और जैतून के तेल जैसे तरल पदार्थों के परिवहन के लिए किया जाता था। इससे पूम्पुहार के पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र से व्यापारिक संबंधों का संकेत मिलता है।
- समुद्र के नीचे मिले रिंग वेल इस संभावना की ओर संकेत करते हैं कि यहाँ कभी प्राचीन नदी-मार्ग रहा होगा, जो बाद में तटीय कटाव और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के कारण डूब गया।
पूम्पुहार का महत्व
- पूम्पुहार को कावेरीपूम्पट्टिनम के नाम से भी जाना जाता है। यह वर्तमान मयिलादुथुराई जिले में कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित है।
- इसका उल्लेख संगम और उत्तर-संगम साहित्य में मिलता है और इसे प्रारंभिक चोलों से जोड़ा जाता है।
- प्राचीन बस्ती के प्रमुख भाग मरुवूरपक्कम, पट्टिनपक्कम और नालंगाडी माने जाते हैं।
- ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापारी यहाँ आते थे।
- पहले की खुदाई में ईंटों की संरचनाएँ, भंडारण पात्र, टेराकोटा रिंग वेल और अन्य अवशेष मिले हैं। इससे संकेत मिलता है कि प्राचीन बस्ती वर्तमान तटरेखा से आगे तक फैली हुई थी।
पूम्पुहार का जलमग्न होना
- प्राचीन बस्ती का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे होने की संभावना है।
- इसके संभावित कारणों में तटीय कटाव, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, बाढ़ और सुनामी शामिल हैं।
- कुछ पुरातात्विक अध्ययनों में तीसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास सुनामी की संभावना व्यक्त की गई है। हालांकि, पूम्पुहार के जलमग्न होने के कारण और इसकी सीमा को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।
चोल वंश:
- चोल वंश का इतिहास एक हजार वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है।
- प्रारंभिक चोलों से विकसित होकर यह दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की एक प्रमुख शक्ति बना।
- प्रमुख चरण:
- प्रारंभिक चोल: लगभग 600 ईसा पूर्व–300 ईस्वी
- अंतराल काल: लगभग 300–848 ईस्वी
- साम्राज्यवादी चोल: लगभग 848–1070 ईस्वी
- उत्तरकालीन चोल: लगभग 1070–1279 ईस्वी
प्रारंभिक चोल
- इनके बारे में मुख्य जानकारी संगम साहित्य से मिलती है।
- प्रमुख शासक करिकाल और कोच्चेंगन्नान थे।
- प्रमुख केंद्र उरैयूर और कावेरीपट्टिनम थे।
- महावंश में एलारा/एलालन नामक चोल राजकुमार का श्रीलंका से संबंध बताया गया है।
- संगम साहित्य में राजाओं की वंशावली, कथाएँ और उनकी प्रशंसा से जुड़े विवरण मिलते हैं।
साम्राज्यवादी चोलों का उदय
- लगभग 848 ईस्वी में विजयालय चोल के समय चोल शक्ति का पुनरुत्थान हुआ।
- प्रमुख शासकों में आदित्य प्रथम, परांतक प्रथम, राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम शामिल थे।
- चोलों ने दक्षिण भारत, श्रीलंका, कलिंग और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपना प्रभाव बढ़ाया।
- प्रमुख राजधानियाँ तंजावुर और बाद में गंगैकोंडचोलपुरम थीं।
- इस काल में मंदिर निर्माण, नौसैनिक शक्ति और व्यापार का विस्तार हुआ।
प्रशासन
- चोल राज्य में राजा मुख्य सत्ता का केंद्र था और शासन वंशानुगत था।
- राजा को निर्णय लेने में मंत्रिपरिषद की सहायता मिलती थी।
- अधिकारियों को मोटे तौर पर उच्च और निम्न श्रेणियों में बाँटा गया था।
- प्रशासनिक विभाजन:
- मंडलम्: प्रांत
- वलनाडु: उप-क्षेत्र
- नाडु: स्थानीय क्षेत्र
- ग्राम: स्थानीय संस्थाओं द्वारा संचालित
- गाँवों के प्रशासन में सभाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- उत्तरमेरूर अभिलेख से कुडवोलै प्रणाली की जानकारी मिलती है, जिसमें योग्य सदस्यों का चयन चिट्ठी/लॉटरी के माध्यम से किया जाता था।
- नगरम् शहरी प्रशासन से संबंधित संस्था थी।
- तनीयूर बड़े गाँव के लिए प्रयुक्त एक प्रशासनिक इकाई थी।
अर्थव्यवस्था और कृषि
- कावेरी डेल्टा चोल अर्थव्यवस्था का प्रमुख कृषि क्षेत्र था।
- सिंचाई के लिए तालाब, नहर और जल-मार्ग बनाए गए।
- धान प्रमुख फसल थी।
- कर अनाज और अन्य उपज के रूप में तथा कभी-कभी नकद में भी दिए जाते थे।
- प्रमुख राजस्व संबंधी शब्दों में इरै, कनिकडन, कुडिमै और ओपटि शामिल थे।
- कावेरीपूम्पट्टिनम और नागपट्टिनम महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाह थे।
- व्यापार के माध्यम से चोलों के संबंध दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और रोम से जुड़े थे।
सेना और नौसेना
- चोल सेना में पैदल सैनिक, घुड़सवार और हाथी शामिल थे।
- वेलैक्कारर राजा के विशेष अंगरक्षक थे।
- पडिमगलिर को राजा की महिला अंगरक्षक के रूप में वर्णित किया गया है।
- चोलों ने एक मजबूत नौसेना विकसित की।
- नौसेना ने व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और विदेशी अभियानों में सहायता की।
- राजेंद्र चोल प्रथम ने 1025 ईस्वी में श्रीविजय के विरुद्ध प्रसिद्ध नौसैनिक अभियान चलाया।
- चोल अभियान श्रीलंका, मालदीव, कदाह, पालेंबांग और ताम्ब्रलिंग जैसे क्षेत्रों तक पहुँचे।
कला, स्थापत्य और साहित्य
- चोल काल तमिल कला और संस्कृति के विकास का महत्वपूर्ण दौर था।
- तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोल स्थापत्य का प्रमुख उदाहरण है।
- पत्थर और कांस्य की मूर्तिकला में उल्लेखनीय विकास हुआ।
- तमिल साहित्य और व्याकरण का विकास हुआ।
- पेरियापुराणम् और नन्नूल इस काल से जुड़े महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
- जैन और बौद्ध साहित्य की रचनाएँ भी हुईं।
- चोल सांस्कृतिक प्रभाव मलेशिया और इंडोनेशिया तक पहुँचा।
धर्म
- चोल शासकों ने विशेष रूप से शैव धर्म को संरक्षण दिया।
- मंदिर धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र भी थे।
- नंबि आंडार नंबि ने शैव ग्रंथों को ग्यारह पुस्तकों में व्यवस्थित किया।
- इस काल में वैष्णव परंपरा भी मौजूद रही।
- मंदिरों के त्योहार, अनुष्ठान और भूमि-अनुदान धार्मिक संस्थाओं को मजबूत करते थे।
चोलों का पतन
- कुलोत्तुंग प्रथम के बाद चोल शक्ति धीरे-धीरे कमजोर हुई।
- उत्तराधिकार संबंधी विवादों और आंतरिक संघर्षों से केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई।
- पांड्य और होयसल शक्तियाँ अधिक प्रभावशाली होती गईं।
- लगातार युद्धों से राज्य के संसाधनों पर दबाव पड़ा।
- 13वीं शताब्दी के प्रारंभ तक चोल क्षेत्र काफी छोटा हो गया।
- अंततः 1279 ईस्वी में चोल सत्ता पांड्यों में विलीन हो गई।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. पूम्पुहार और चोल वंश के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- पूम्पुहार में पश्चिम एशियाई टॉरपीडो जार का टुकड़ा मिलना पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के साथ उसके समुद्री संबंधों का प्रमाण देता है।
- उत्तरमेरूर अभिलेखों में उल्लिखित कुडवोलै प्रणाली स्थानीय समितियों के लिए योग्य सदस्यों के चयन से संबंधित थी।
- वेलैक्कारर चोल सेना में सामान्य पैदल सैनिकों की नियमित टुकड़ी थे, जबकि पदिमगलिर केवल मंदिरों से संबंधित महिला समूह थे।
- चोल प्रशासनिक व्यवस्था में मंडलम्, वलनाडु और नाडु क्रमिक क्षेत्रीय इकाइयाँ थीं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (a) केवल 1, 2 और 4
व्याख्या:
- पूम्पुहार में पश्चिम एशियाई टॉरपीडो जार का टुकड़ा मिलना पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के साथ उसके समुद्री संबंधों का संकेत देता है। अतः कथन 1 सही है।
- उत्तरमेरूर अभिलेखों में उल्लिखित कुडवोलै प्रणाली योग्य सदस्यों को स्थानीय समितियों के लिए चयनित करने से संबंधित थी। अतः कथन 2 सही है।
- वेलैक्कारर चोल शासकों के विशिष्ट/अभिजात शाही अंगरक्षक थे, जबकि पदिमगलिर को दिए गए स्रोत में राजा की महिला अंगरक्षक के रूप में वर्णित किया गया है। इसलिए कथन में दोनों के बारे में दी गई जानकारी गलत है। अतः कथन 3 गलत है।
चोल प्रशासन में मंडलम् (प्रांत), वलनाडु (उप-क्षेत्र) और नाडु (स्थानीय क्षेत्रीय इकाई) शामिल थे। अतः कथन 4 सही है।
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