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Current Affairs - Daily 23 सितमबर 2026

नेपाल की जलवायु न्याय मांग: हानि एवं क्षति से हिमालयी क्षेत्रीय सहयोग तक

नेपाल की 2026 की विनाशकारी बाढ़ ने जलवायु न्याय, हानि एवं क्षति वित्त और हिमालयी क्षेत्र में भारत-नेपाल सहयोग पर नई बहस शुरू की है। चुनौती केवल राहत देने की नहीं, बल्कि साझा जलवायु जोखिमों के लिए दीर्घकालिक वित्त, पूर्व चेतावनी और लचीलेपन की व्यवस्था बनाने की है।

नेपाल की जलवायु न्याय मांग: हानि एवं क्षति से हिमालयी क्षेत्रीय सहयोग तक

पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — भारत और उसका पड़ोस, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, अवसंरचना और पर्यावरण।

स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस में 22 सितंबर 2026 को प्रकाशित विचार-लेख, साथ में नेपाल सरकार, संयुक्त राष्ट्र, हरित जलवायु कोष और यूएनएफसीसीसी स्रोत। मूल तर्क यह है कि बार-बार होने वाली आपदा के बाद की राहत से आगे बढ़कर क्षेत्रीय जलवायु-जोखिम वित्तपोषण की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

नेपाल की जलवायु अपील क्यों महत्त्वपूर्ण है?

26 अगस्त 2026 की आपदा ने नेपाल के भोटे कोशी–त्रिशूली गलियारे को गंभीर रूप से प्रभावित किया। बस्तियों, सड़कों, कृषि क्षेत्र और जलविद्युत अवसंरचना को नुकसान पहुँचा।

नेपाल सरकार के अनुमान के अनुसार:

  • लगभग 1.8 अरब डॉलर की भौतिक क्षति हुई।
  • लगभग 883 मिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ।
  • पुनर्निर्माण आवश्यकता लगभग 4.78 अरब डॉलर आंकी गई।

नेपाल ने इसके बाद हानि एवं क्षति प्रतिक्रिया कोष से सहायता की मांग की है।

नेपाल का तर्क व्यापक जलवायु न्याय के सिद्धांत से जुड़ा है:

जिन देशों का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान अपेक्षाकृत कम है, वे भी गंभीर जलवायु प्रभाव झेल सकते हैं।

इससे नीति-विमर्श का क्रम बदलता है:

आपातकालीन राहत → पुनर्निर्माण वित्त → जलवायु न्याय → दीर्घकालिक लचीलापन

हानि एवं क्षति क्या है?

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में हानि एवं क्षति उन प्रभावों को संदर्भित करता है जिन्हें केवल उत्सर्जन न्यूनीकरण या अनुकूलन उपायों से पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।

अर्थात:

न्यूनीकरण: उत्सर्जन कम करना
अनुकूलन: जलवायु प्रभावों के अनुरूप व्यवस्था बनाना
हानि एवं क्षति: बची हुई या अपरिहार्य जलवायु हानि से निपटना

हानि एवं क्षति प्रतिक्रिया कोष का उद्देश्य विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील विकासशील देशों की सहायता करना है।

नेपाल की मांग अभी विचाराधीन है।

जलवायु न्याय से इसका संबंध

हानि एवं क्षति सामान्य आपदा सहायता से अलग अवधारणा है।

इसके पीछे जलवायु न्याय का तर्क है कि:

ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन करने वाले और अधिक वित्तीय क्षमता रखने वाले देशों की जिम्मेदारी अधिक होनी चाहिए।

भारत अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में लगातार निम्न सिद्धांतों पर बल देता रहा है:

  • समानता
  • ऐतिहासिक उत्तरदायित्व
  • साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएँ

भारत का व्यापक रुख रहा है कि विकसित देशों को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में नेतृत्व करना चाहिए।

वैश्विक जलवायु वित्त - एक लंबित प्रक्रिया 

नेपाल का अनुभव बहुपक्षीय जलवायु वित्त की एक प्रमुख समस्या को दिखाता है—लंबी स्वीकृति प्रक्रिया।

हिमनद झील विस्फोट बाढ़ और जलवायु-बाढ़ लचीलेपन से संबंधित 49.9 मिलियन डॉलर की हरित जलवायु कोष परियोजना का:

  • अवधारणा-पत्र 2018 में आया।
  • बोर्ड अनुमोदन जुलाई 2025 में मिला।
  • परियोजना मार्च 2026 में प्रभावी हुई।

तेजी से बदलते हिमालयी जोखिमों में यह देरी एक महत्त्वपूर्ण अंतर पैदा करती है:

जोखिम की पहचान → वित्त स्वीकृति → वास्तविक अवसंरचना निर्माण

यदि इन तीनों के बीच वर्षों का अंतर हो, तो संवेदनशील समुदायों और बुनियादी ढाँचे पर जोखिम बना रहता है।

यही कारण है कि क्षेत्रीय स्तर पर अधिक तेज वित्तीय साधनों की मांग उठती है।

भारत इस जोखिम से सीधे क्यों जुड़ा है?

भारत और नेपाल केवल भौगोलिक पड़ोसी नहीं हैं। दोनों कई स्तरों पर परस्पर जुड़े हैं:

  • साझा नदी प्रणालियाँ
  • सीमा-पार विद्युत व्यापार
  • जलविद्युत निवेश
  • सड़क और ऊर्जा अवसंरचना
  • सीमा-पार आपदा जोखिम

भारतीय संस्थाएँ नेपाल की प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं से भी जुड़ी हुई हैं, जिनमें:

  • 900 मेगावाट अरुण-III
  • 900 मेगावाट अपर कर्णाली

जैसी परियोजनाएँ शामिल हैं।

2026 की बाढ़ से 13 जलविद्युत परियोजनाएँ और लगभग 783 मेगावाट क्षमता प्रभावित हुई।

इससे स्पष्ट है कि हिमालयी जलवायु आपदा केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है।

यह एक साथ प्रभावित कर सकती है:

ऊर्जा सुरक्षा + अवसंरचना सुरक्षा + आपदा प्रबंधन + द्विपक्षीय संबंध

भारत के सामने नीतिगत दुविधा

भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण नीति-संतुलन यह हो सकता है कि वह दो अवधारणाओं को अलग रखे:

वैश्विक जलवायु उत्तरदायित्व

और

क्षेत्रीय जलवायु लचीलापन सहयोग

पहले स्तर पर भारत विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और जलवायु वित्त की प्रतिबद्धताओं पर जोर जारी रख सकता है।

दूसरे स्तर पर भारत पड़ोसी देशों के साथ साझा जोखिम कम करने के लिए व्यावहारिक सहयोग कर सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं होगा कि भारत हर सीमा-पार जलवायु हानि के लिए कानूनी क्षतिपूर्ति-दायित्व स्वीकार कर रहा है।

बल्कि यह हो सकता है:

दोष-आधारित क्षतिपूर्ति के बिना जोखिम-साझेदारी और क्षेत्रीय लचीलापन सहयोग

क्षेत्रीय तंत्र कैसा हो सकता है?

स्रोत सामग्री एक दक्षिण एशियाई लचीलापन एवं बीमा सुविधा जैसी व्यवस्था का प्रस्ताव रखती है।

यह वर्तमान में मौजूद संस्था नहीं है, बल्कि एक नीतिगत प्रस्ताव है।

इसके संभावित घटक हो सकते हैं:

  • पैरामीट्रिक बीमा: तय वर्षा, हिमनद, बाढ़ या उपग्रह संकेतक सीमा पार करते ही तेज भुगतान।
  • रियायती पुनर्निर्माण खिड़की: पहले से घट चुकी आपदाओं के पुनर्निर्माण के लिए सस्ता वित्त।
  • लचीलापन घटक: अवसंरचना निवेश का एक भाग ढाल स्थिरीकरण, अनुकूलन और स्थानीय लचीले निर्माण के लिए आरक्षित।
  • साझा पूर्व चेतावनी मंच: उपग्रह, नदी और हिमनद झील संबंधी आँकड़ों का सीमा-पार उपयोग।
  • बहुपक्षीय पूंजीकरण: एआईआईबी, न्यू डेवलपमेंट बैंक या बिम्सटेक जैसे मंचों की भागीदारी, ताकि पूरा भार एक देश पर न पड़े।

पैरामीट्रिक बीमा क्या है?

पारंपरिक क्षतिपूर्ति बीमा में सामान्यतः वास्तविक नुकसान का विस्तृत आकलन किया जाता है।

लेकिन पैरामीट्रिक बीमा पूर्वनिर्धारित मापनीय संकेतक से जुड़ा होता है।

उदाहरण:

यदि किसी नदी का जलस्तर तय सीमा पार करे → भुगतान सक्रिय

या

यदि उपग्रह आधारित वर्षा सूचकांक तय स्तर पार करे → भुगतान सक्रिय

इससे आपदा के तुरंत बाद धन उपलब्ध हो सकता है।

लेकिन इसकी एक समस्या है:

ट्रिगर और वास्तविक नुकसान हमेशा समान नहीं होते।

इसे आधार जोखिम कहा जाता है।

क्षेत्रीय व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ

  • आधार जोखिम: कभी-कभी पूर्वनिर्धारित संकेतक सक्रिय नहीं होता, जबकि जमीन पर वास्तविक नुकसान बहुत अधिक हो सकता है।

    • संभावित समाधान: स्वचालित भुगतान के साथ तेज जमीनी सत्यापन।
  • प्रमुख वित्तदाता की समस्या:यदि भारत ही अधिकांश धन देता है, तो व्यवस्था बहुपक्षीय क्षेत्रीय तंत्र के बजाय द्विपक्षीय सहायता जैसी दिख सकती है।

    • संभावित समाधान: बहुपक्षीय पूंजीकरण और आर्थिक क्षमता के अनुसार अलग-अलग योगदान।
  • क्षेत्रीय राजनीति:दक्षिण एशिया में राजनीतिक तनाव संस्थागत सहयोग को कठिन बना सकता है।

    • संभावित समाधान: व्यापक राजनीतिक मंच के बजाय विशेष कार्यात्मक मंच—जैसे आपदा लचीलापन, बीमा या पूर्व चेतावनी।
  • संवेदनशील आँकड़े: जल प्रवाह और जलवैज्ञानिक जानकारी को कई बार सामरिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।

    • संभावित समाधान: पहले से सहमत स्वचालित आँकड़ा-साझाकरण प्रोटोकॉल।

हिमनद झील विस्फोट बाढ़ क्यों महत्त्वपूर्ण है?

हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि से हिमनद पीछे हट सकते हैं और हिमनद झीलों का विस्तार हो सकता है।

ऐसी झील का बाँध अचानक टूटने पर बड़ी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों में तेजी से बह सकता है।

इसे हिमनद झील विस्फोट बाढ़ कहा जाता है।

इसके प्रभाव केवल ऊपरी पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते।

संभावित प्रभाव-श्रृंखला:

हिमनद अस्थिरता → अचानक बाढ़ → सड़क/पुल क्षति → जलविद्युत परियोजना प्रभावित → अनुप्रवाहगामी जोखिम → आर्थिक नुकसान

यही कारण है कि हिमालयी आपदा प्रबंधन में केवल स्थानीय राहत पर्याप्त नहीं है।

जलविद्युत और जलवायु जोखिम

नेपाल के लिए जलविद्युत आर्थिक विकास और विद्युत निर्यात का महत्त्वपूर्ण आधार है।

भारत के लिए नेपाल से बिजली व्यापार:

  • ऊर्जा उपलब्धता,
  • सीमा-पार विद्युत बाजार,
  • स्वच्छ ऊर्जा मिश्रण,
  • और द्विपक्षीय आर्थिक संबंध

से जुड़ा है।

इसलिए नेपाल के जलविद्युत ढाँचे की जलवायु-सुरक्षा भारत के लिए भी महत्त्व रखती है।

हिमालयी जलवायु जोखिम को केवल नेपाल की घरेलू समस्या मानना इस परस्पर निर्भरता को नज़रअंदाज़ करेगा।

राहत से जोखिम-साझेदारी की ओर

अब तक क्षेत्रीय आपदा सहयोग प्रायः इस क्रम में चलता है:

आपदा → मानवीय सहायता → पुनर्निर्माण

लेकिन प्रस्तावित नया दृष्टिकोण होगा:

जोखिम की पूर्व पहचान → पूर्व-वित्तपोषित बीमा → साझा चेतावनी → त्वरित भुगतान → लचीला पुनर्निर्माण

यही बदलाव आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक मॉडल से पूर्व-व्यवस्थित जोखिम प्रबंधन की ओर ले जाता है।

सीओपी31 का संदर्भ

सीओपी31 का आयोजन 9–20 नवंबर 2026 को अंताल्या में होना है।

इससे जलवायु वित्त, हानि एवं क्षति और कार्यान्वयन का प्रश्न वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक बना हुआ है।

यूपीएससी के लिए यह मुद्दा कई विषयों को जोड़ता है:

पड़ोसी नीति + जलवायु न्याय + सीबीडीआर-आरसी + जलवायु वित्त + आपदा कूटनीति + सीमा-पार पारिस्थितिक सुरक्षा


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“हिमालयी जलवायु जोखिम आपदा राहत के प्रश्न को क्षेत्रीय जलवायु वित्त और रणनीतिक सहयोग के प्रश्न में बदल रहे हैं।” नेपाल की हालिया हानि एवं क्षति अपील और भारत के लिए उसके निहितार्थों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में ‘हानि एवं क्षति’ के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह उन जलवायु प्रभावों से संबंधित है जिन्हें न्यूनीकरण या अनुकूलन के माध्यम से हमेशा पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।
  2. हानि एवं क्षति प्रतिक्रिया कोष विशेष रूप से संवेदनशील विकासशील देशों की सहायता के लिए बनाया गया है।
  3. हानि एवं क्षति उत्सर्जन घटाने के लिए दिए जाने वाले न्यूनीकरण वित्त के समान ही है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 1 और 2

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: हानि एवं क्षति उन अवशिष्ट या अपरिहार्य जलवायु प्रभावों से संबंधित है जिन्हें न्यूनीकरण और अनुकूलन से पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत न्यूनीकरण वित्त का प्राथमिक उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना है।

प्रश्न 2

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. पैरामीट्रिक बीमा का भुगतान केवल प्रत्येक भौतिक नुकसान का पारंपरिक विस्तृत आकलन पूरा होने के बाद होता है।
  2. हरित जलवायु कोष न्यूनीकरण और अनुकूलन दोनों गतिविधियों का वित्तपोषण करता है।
  3. भारत अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में सीबीडीआर-आरसी और ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों का उल्लेख करता रहा है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 2

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: C

व्याख्या: पैरामीट्रिक बीमा सामान्यतः किसी पूर्वनिर्धारित मापनीय ट्रिगर से जुड़ा होता है और पूर्ण पारंपरिक नुकसान-आकलन की प्रतीक्षा किए बिना भुगतान कर सकता है। भारत जलवायु वार्ताओं में समानता, ऐतिहासिक उत्तरदायित्व और सीबीडीआर-आरसी पर बल देता रहा है।