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Current Affairs - Daily 28 सितमबर 2026

भारत में लॉटरी विनियमन: पूर्ण प्रतिबंध या जवाबदेह नियंत्रण?

भारत में सरकारी लॉटरी वैध हो सकती है, लेकिन यह Lotteries (Regulation) Act, 1998 की शर्तों और राज्यों की नीतियों के अधीन है। प्रमुख नीतिगत प्रश्न यह है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय कड़ा और पारदर्शी विनियमन सामाजिक जोखिमों को नियंत्रित करते हुए अवैध बाजारों को सीमित कर सकता है या नहीं।

भारत में लॉटरी विनियमन: पूर्ण प्रतिबंध या जवाबदेह नियंत्रण?

पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — केंद्र-राज्य संबंध, विधायी शक्तियों का विभाजन और शासन; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — सार्वजनिक वित्त, कराधान और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV — पितृसत्तात्मक नियमन, व्यक्तिगत विकल्प और नियामकीय नैतिकता।

स्रोत एवं तिथि: द हिंदू, 27 सितंबर 2026; साथ में लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998, संसदीय आँकड़े और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित निर्णय।

भारत में लॉटरी का वर्तमान कानूनी ढाँचा 

भारत में लॉटरी को सामान्य जुए की तरह एक ही संवैधानिक प्रविष्टि के अंतर्गत नहीं रखा गया है।

संविधान में:

  • संघ सूची की प्रविष्टि 40 — भारत सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा आयोजित लॉटरी , जबकि:
  • राज्य सूची की प्रविष्टि 34 — सट्टेबाजी और जुआ से संबंधित है।

 सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर है:  सरकारी लॉटरी ≠ सामान्य सट्टेबाजी और जुआ

सरकारी लॉटरी पर संसद को विशेष विधायी शक्ति प्राप्त है, जबकि सामान्य सट्टेबाजी और जुआ मुख्यतः राज्यों के विधायी क्षेत्र में आते हैं।

लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 क्या करता है?

संसद ने सरकारी लॉटरी के विनियमन के लिए लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 बनाया।

यह कानून राज्यों को लॉटरी:

  • आयोजित करने,
  • संचालित करने,
  • प्रोत्साहित करने

की अनुमति देता है, लेकिन यह अनुमति बिना शर्त नहीं है।

धारा 4 राज्य सरकारों द्वारा आयोजित लॉटरी के लिए विभिन्न अनिवार्य शर्तें निर्धारित करती है।

इनका उद्देश्य लॉटरी को एक नियंत्रित सरकारी गतिविधि के रूप में संचालित करना है।

धारा 4 क्यों महत्त्वपूर्ण है?

धारा 4 लॉटरी आयोजित करने की शर्तों से संबंधित है।

इसमें लॉटरी टिकटों, ड्रॉ, पुरस्कारों और संचालन से जुड़े नियामकीय पहलुओं के लिए आधार प्रदान किया गया है।

इसका व्यापक उद्देश्य है: सरकारी लॉटरी → वैधानिक शर्तों के अधीन नियंत्रित गतिविधि

अर्थात कोई राज्य केवल यह कहकर अनियमित तरीके से लॉटरी संचालित नहीं कर सकता कि यह सरकारी लॉटरी है।

भारत में कौन-से राज्य लॉटरी चलाते हैं?

2023 में लोकसभा में दिए गए उत्तर के अनुसार उस समय नौ राज्य सरकारी लॉटरी संचालित कर रहे थे:

  • अरुणाचल प्रदेश
  • गोवा
  • केरल
  • महाराष्ट्र
  • मिजोरम
  • नागालैंड
  • पंजाब
  • सिक्किम
  • पश्चिम बंगाल

इससे स्पष्ट है कि भारत में राज्य लॉटरी पर कोई देशव्यापी पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।

राज्य अपनी नीति और लागू कानून के अनुसार अलग-अलग दृष्टिकोण अपना सकते हैं।

धारा 5 क्यों सबसे विवादास्पद है?

लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 की धारा 5 राज्य सरकार को अन्य राज्यों द्वारा आयोजित लॉटरी के टिकटों की बिक्री पर रोक लगाने की शक्ति देती है।

प्रथम दृष्टया इससे ऐसा लग सकता है कि: राज्य अपनी लॉटरी चला सकता है + दूसरे राज्यों की लॉटरी पर रोक लगा सकता है

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस शक्ति की ऐसी व्याख्या स्वीकार नहीं की।

बी.आर. एंटरप्राइजेज निर्णय क्या कहता है?

बी.आर. एंटरप्राइजेज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 5 की व्याख्या की।

न्यायालय ने कहा कि यदि कोई राज्य दूसरे राज्यों की लॉटरी पर प्रतिबंध लगाना चाहता है, तो उसे स्वयं भी लॉटरी-मुक्त नीति अपनानी होगी।

अर्थात वर्तमान न्यायिक स्थिति में: अपनी लॉटरी जारी + सभी दूसरे राज्यों की लॉटरी प्रतिबंधित = स्वीकार्य नहीं

यदि कोई राज्य लॉटरी से पूरी तरह मुक्त होना चाहता है, तो वह अन्य राज्यों की लॉटरी भी रोक सकता है।

लेकिन वह अपनी सरकारी लॉटरी को बनाए रखते हुए पूरे बाहरी बाजार को अपने क्षेत्र से बाहर नहीं कर सकता।

धारा 5 के पीछे संघीय प्रश्न क्या है?

यह व्यवस्था संघवाद से जुड़ा एक रोचक प्रश्न पैदा करती है।

मान लीजिए कोई राज्य अपनी लॉटरी संचालित करता है।

वह यह नहीं कह सकता कि: मेरी लॉटरी वैध + बाकी सभी राज्यों की लॉटरी अवैध

क्योंकि इससे राज्य अपने घरेलू लॉटरी बाजार को सुरक्षित रखते हुए अन्य राज्यों के समान सरकारी उत्पादों को बाहर कर सकता है।

इसलिए बी.आर. एंटरप्राइजेज निर्णय का व्यापक सिद्धांत है:

राज्य का प्रतिबंध वास्तविक लॉटरी-विरोधी नीति पर आधारित हो, आर्थिक संरक्षणवाद पर नहीं।

लॉटरी को सामान्य व्यापार जैसा संरक्षण क्यों नहीं मिलता?

सुप्रीम कोर्ट ने लॉटरी को जुए का एक रूप माना है।

न्यायिक दृष्टिकोण में इसे रेस एक्स्ट्रा कॉमर्शियम की अवधारणा से जोड़ा गया है।

इसका अर्थ broadly यह है कि ऐसी गतिविधियों को सामान्य वैध व्यापार की तरह समान संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं होता।

इसलिए लॉटरी व्यवसाय को अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत सामान्य व्यापार, व्यवसाय या पेशे जैसा पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है।

इसी प्रकार इसे अनुच्छेद 301 के तहत सामान्य अंतरराज्यीय व्यापार की स्वतंत्रता जैसा संरक्षण भी नहीं मिलता।

इसलिए सरकारों के पास लॉटरी को:

  • नियंत्रित करने,
  • सीमित करने,
  • प्रतिबंधित करने

के लिए अपेक्षाकृत व्यापक संवैधानिक क्षेत्र उपलब्ध है।

वैध लॉटरी का अर्थ सामाजिक रूप से हानिरहित गतिविधि नहीं

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है: कानूनी अनुमति ≠ सामाजिक स्वीकृति

किसी लॉटरी का कानून के तहत संचालित होना यह सिद्ध नहीं करता कि उसमें सामाजिक जोखिम नहीं हैं।

लॉटरी में:

  • अत्यंत कम जीत संभावना,
  • बार-बार टिकट खरीदना,
  • बड़े पुरस्कारों का आकर्षण,
  • हानि की भरपाई के लिए पुनः खेलने की प्रवृत्ति

जैसे जोखिम मौजूद हो सकते हैं।

इसलिए कानूनी प्रश्न और सामाजिक नीति का प्रश्न अलग-अलग हैं।

पूर्ण प्रतिबंध बनाम कड़ा विनियमन

लॉटरी नीति में मुख्य बहस है: पूर्ण प्रतिबंध या नियंत्रित वैध बाजार?

पूर्ण प्रतिबंध कानूनी टिकट आपूर्ति को समाप्त कर सकता है।

लेकिन इससे जुए की मांग अपने-आप समाप्त हो जाए, यह आवश्यक नहीं है।

ऐसी मांग स्थानांतरित हो सकती है: मटका + सट्टा + तस्करी की लॉटरी टिकट + विदेशी ऑनलाइन जुआ मंच + अनियमित डिजिटल संचालक इसलिए नीति का वास्तविक प्रश्न केवल: लॉटरी हो या न हो नहीं है।

बल्कि: जोखिमपूर्ण जुआ मांग को किस नियामकीय व्यवस्था में अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है?

अवैध जुआ बाजार अधिक जोखिमपूर्ण क्यों हो सकता है?

अनियमित बाजारों में सामान्यतः निम्न सुरक्षा कमजोर या अनुपस्थित हो सकती हैं:

  • पुरस्कार कोष का लेखा-परीक्षण,
  • ड्रॉ की पारदर्शिता,
  • न्यूनतम आयु की शर्त,
  • शिकायत निवारण,
  • भुगतान का रिकॉर्ड,
  • वित्तीय निगरानी,
  • जिम्मेदार जुआ मानक।

इसलिए पूर्ण प्रतिबंध का एक संभावित अनपेक्षित परिणाम हो सकता है: वैध बाजार में कमी + भूमिगत बाजार में वृद्धि , यह हर स्थिति में होगा, ऐसा निश्चित नहीं है, लेकिन नीति-निर्माण में इस जोखिम पर विचार आवश्यक है।

सामाजिक जोखिम किन लोगों पर अधिक पड़ सकते हैं?

लॉटरी का भार निम्न-आय परिवारों पर अनुपातहीन रूप से पड़ सकता है।

यदि सीमित आय वाला व्यक्ति नियमित रूप से अत्यंत कम संभावना वाले पुरस्कार के लिए धन खर्च करता है, तो इसका प्रभाव उसके आवश्यक घरेलू व्यय पर पड़ सकता है।

विशेष चिंता पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं:

  • बहुत तेजी से होने वाले ड्रॉ,
  • बहुत बड़े जैकपॉट,
  • आक्रामक विज्ञापन,
  • जीत की संभावना का अतिरंजित चित्रण,
  • हानि के बाद और अधिक पैसा लगाना।

इसलिए लॉटरी नीति केवल राजस्व का प्रश्न नहीं है।

यह: उपभोक्ता संरक्षण + सार्वजनिक स्वास्थ्य + वित्तीय व्यवहार का भी प्रश्न है।

जिम्मेदार विनियमन में क्या होना चाहिए?

यदि कोई राज्य लॉटरी संचालित करता है, तो मजबूत उपभोक्ता सुरक्षा आवश्यक है।

एक जवाबदेह ढाँचे में शामिल हो सकते हैं:

न्यूनतम आयु + जीत की वास्तविक संभावना का स्पष्ट खुलासा + विज्ञापन प्रतिबंध + उधार लेकर टिकट खरीदने पर रोक/सीमा + सुरक्षित पुरस्कार कोष + स्वतंत्र लेखा-परीक्षण + जिम्मेदार जुआ सुरक्षा

इसका उद्देश्य लॉटरी को निवेश या धन-सृजन साधन के रूप में प्रचारित करना नहीं होना चाहिए।

लॉटरी को स्पष्ट रूप से: उच्च जोखिम वाली मनोरंजन/जुआ गतिविधि के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

राज्य लॉटरी से राजस्व क्यों चाहते हैं?

लॉटरी राज्यों को दो प्रकार से राजस्व दे सकती है: गैर-कर राजस्व + जीएसटी प्राप्तियाँ

केरल इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

वित्त वर्ष 2023-24 में केरल ने लॉटरी से लगभग ₹1,129.71 करोड़ शुद्ध राजस्व दर्ज किया।

इसके अतिरिक्त लॉटरी गतिविधि से जीएसटी प्राप्तियाँ भी होती हैं।

इसलिए राज्यों के लिए लॉटरी: अतिरिक्त सार्वजनिक राजस्व स्रोत हो सकती है।

केरल मॉडल 

केरल में लॉटरी विभागीय ढाँचे के माध्यम से संचालित की जाती है।

यह मॉडल इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें राज्य की भूमिका केवल नियामक की नहीं, बल्कि सीधे संचालक की भी है।

सार्वजनिक संचालक मॉडल में सरकार:

  • टिकट व्यवस्था,
  • ड्रॉ,
  • पुरस्कार वितरण,
  • वित्तीय अभिलेख,
  • वितरण नेटवर्क

पर अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण रख सकती है।

लेकिन यह अपने साथ एक नैतिक समस्या भी पैदा करता है।

राज्य की तिहरी भूमिका

लॉटरी में राज्य कई भूमिकाएँ निभा सकता है: नियामक + संचालक + राजस्व लाभार्थी

यहीं हितों का संभावित टकराव पैदा होता है।

जो सरकार सामाजिक हानि सीमित करने के लिए जिम्मेदार है, वही लॉटरी बिक्री बढ़ने से अधिक राजस्व भी प्राप्त कर सकती है।

इसलिए: राजस्व प्रोत्साहन ≠ नियामकीय उद्देश्य दोनों को अलग रखना आवश्यक है।

राज्य का लक्ष्य टिकट बिक्री अधिकतम करना नहीं, बल्कि यदि लॉटरी की अनुमति है तो सामाजिक जोखिम न्यूनतम करना होना चाहिए।

लॉटरी राजस्व पर अत्यधिक निर्भरता क्यों जोखिमपूर्ण है?

यदि कोई सरकार लॉटरी आय पर अत्यधिक निर्भर हो जाती है, तो उसके सामने नीति-विरोधाभास पैदा हो सकता है।

एक ओर: अधिक बिक्री → अधिक राजस्व

दूसरी ओर: अधिक जुआ → संभावित सामाजिक हानि

इसलिए राजस्व प्राप्ति को उपभोक्ता संरक्षण पर प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए।

एक जवाबदेह मॉडल में लॉटरी अधिशेष का उपयोग पारदर्शी रूप से:

  • स्वास्थ्य,
  • सामाजिक सुरक्षा,
  • शिक्षा,
  • कल्याण कार्यक्रम

जैसे सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए दिखाया जा सकता है।

क्या धारा 5 में संशोधन किया जा सकता है?

एक सुधार प्रस्ताव यह है कि धारा 5 में संशोधन किया जाए।

इसके तहत किसी राज्य को अपनी लॉटरी चलाते हुए भी अन्य राज्यों की लॉटरी को अपने क्षेत्र में प्रतिबंधित करने की शक्ति दी जा सकती है।

लेकिन ऐसी शक्ति के साथ भेदभाव-रोधी सिद्धांत आवश्यक होगा।

उदाहरण के लिए राज्य: कुछ चुनिंदा बाहरी राज्यों को अनुमति + अन्य को प्रतिबंध जैसी मनमानी व्यवस्था न बनाए।

एक संभावित मॉडल हो सकता है: सभी पात्र बाहरी राज्य लॉटरी की अनुमति या सभी बाहरी राज्य लॉटरी पर समान प्रतिबंध

यह अभी वर्तमान कानून नहीं है, बल्कि सुधार प्रस्ताव है।

क्या कई राज्य मिलकर साझा लॉटरी चला सकते हैं?

एक अन्य सुधार प्रस्ताव यह है कि दो या अधिक राज्यों को वैधानिक रूप से एक संयुक्त लॉटरी व्यवस्था बनाने की अनुमति दी जाए।

ऐसे मॉडल में राज्य साझा कर सकते हैं:

  • प्रतिभागियों का व्यापक आधार,
  • पुरस्कार कोष,
  • तकनीकी मंच,
  • प्रशासनिक लागत,
  • नियामकीय अवसंरचना।

इससे बड़े संयुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था मिल सकती है, जबकि भागीदार राज्य अपनी नियामकीय भूमिका बनाए रख सकते हैं।

लेकिन: बहु-राज्य संयुक्त लॉटरी का ऐसा नया मॉडल वर्तमान वैधानिक ढाँचे का हिस्सा नहीं है।

इसके लिए विधायी संशोधन आवश्यक होगा।

सार्वजनिक संचालक मॉडल कैसा हो सकता है?

एक मजबूत लॉटरी व्यवस्था में मुख्य कार्य सरकार, वैधानिक निकाय या कड़े सार्वजनिक नियंत्रण वाली व्यवस्था के तहत किए जा सकते हैं।

निजी कंपनियाँ:

  • तकनीकी सेवाएँ,
  • टिकट वितरण,
  • खुदरा नेटवर्क

जैसी सहायक भूमिकाएँ निभा सकती हैं।

लेकिन मुख्य कार्यों पर सार्वजनिक निगरानी आवश्यक है: ड्रॉ की सत्यनिष्ठा + पुरस्कार कोष + बिक्री अभिलेख + वित्तीय रिपोर्टिंग

इससे निजी लाभ अधिकतमकरण और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संघर्ष कम किया जा सकता है।

खुदरा नेटवर्क का सामाजिक आयाम

लॉटरी वितरण व्यवस्था को जीविकोपार्जन से भी जोड़ा जा सकता है।

खुदरा नेटवर्क में प्राथमिकता या अवसर दिए जा सकते हैं:

  • छोटे विक्रेताओं,
  • दिव्यांग व्यक्तियों,
  • महिला स्वयं सहायता समूहों,
  • सहकारी संस्थाओं

को।

इससे लॉटरी की सामाजिक वैधता स्वतः सिद्ध नहीं होती, लेकिन वितरण नीति में समावेशन का एक आयाम जुड़ सकता है।

तकनीक पारदर्शिता कैसे बढ़ा सकती है?

तकनीक का उपयोग लॉटरी संचालन को अधिक लेखा-परीक्षण योग्य बना सकता है।

उदाहरण:

  • डिजिटल टिकट सत्यापन,
  • केंद्रीकृत बिक्री आँकड़े,
  • वास्तविक समय बिक्री रिकॉर्ड,
  • पुरस्कार भुगतान की डिजिटल ट्रैकिंग,
  • टिकट संख्या और ड्रॉ का मिलान,
  • स्वचालित वित्तीय सामंजस्य।

इससे: नकली टिकट + पुरस्कार धोखाधड़ी + अपारदर्शी बिक्री + राजस्व रिसाव

कम करने में सहायता मिल सकती है।

जवाबदेह लॉटरी व्यवस्था में क्या आवश्यक है?

विश्वसनीय लॉटरी व्यवस्था में निम्न तत्व होने चाहिए:

पारदर्शी ड्रॉ + स्वतंत्र लेखा-परीक्षण + वास्तविक समय बिक्री अभिलेख + पता लगाने योग्य पुरस्कार भुगतान + जिम्मेदार विज्ञापन + नाबालिगों की सुरक्षा + राजस्व उपयोग का सार्वजनिक प्रकटीकरण + अवैध संचालकों पर कठोर कार्रवाई

इसका उद्देश्य होना चाहिए: जुए को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि अनुमत गतिविधि से होने वाली हानि को कम करना।

संघवाद का प्रश्न

लॉटरी विनियमन भारत के संघीय ढाँचे की एक विशेषता दिखाता है।

एक ओर सरकारी लॉटरी पर संसद की शक्ति है:

संघ सूची प्रविष्टि 40

  • दूसरी ओर राज्यों के पास अपने क्षेत्र में सामान्य जुआ और सट्टेबाजी से संबंधित शक्ति है:

राज्य सूची प्रविष्टि 34

  • इसके अतिरिक्त लॉटरी (विनियमन) अधिनियम राज्यों को अपने क्षेत्र में कुछ नीतिगत निर्णय लेने की भूमिका देता है।

इसलिए लॉटरी व्यवस्था में: केंद्रीय कानून + राज्य नीति + न्यायिक व्याख्या

तीनों का संयोजन दिखाई देता है।

प्रतिबंध और व्यक्तिगत विकल्प

लॉटरी नीति में एक नैतिक प्रश्न यह भी है कि राज्य वयस्क व्यक्तियों के निजी आर्थिक विकल्पों को किस सीमा तक नियंत्रित करे।

एक दृष्टिकोण कहता है कि व्यक्ति को अपने धन का उपयोग करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि:

  • लत,
  • संज्ञानात्मक भ्रम,
  • असमान आर्थिक प्रभाव,
  • भ्रामक विज्ञापन

जैसे जोखिम राज्य हस्तक्षेप को उचित ठहरा सकते हैं।

यही पितृसत्तात्मक नियमन बनाम व्यक्तिगत स्वायत्तता का प्रश्न है।

पूर्ण मुक्त बाजार भी समाधान क्यों नहीं?

यदि लॉटरी को सामान्य वाणिज्यिक उत्पाद की तरह बिना कड़े नियंत्रण के बेचने दिया जाए, तो कंपनियों और संचालकों को:

  • अधिक टिकट बिक्री,
  • अधिक बार ड्रॉ,
  • बड़े जैकपॉट,
  • आक्रामक प्रचार

के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।

इससे समस्याग्रस्त जुआ व्यवहार बढ़ सकता है।

इसलिए दो अतियों के बीच संतुलन आवश्यक है:

पूर्ण प्रतिबंध ← कड़ा विनियमन → अनियंत्रित व्यावसायीकरण

नीति का उद्देश्य मध्य मार्ग में सामाजिक जोखिम को न्यूनतम करना होना चाहिए।

मूल नीतिगत प्रश्न

भारत में लॉटरी नीति तीन उद्देश्यों के बीच संतुलन का प्रश्न है:

व्यक्तिगत विकल्प + सामाजिक सुरक्षा + राज्य राजस्व

पूर्ण प्रतिबंध कानूनी उपलब्धता कम कर सकता है, लेकिन भूमिगत जुआ बाजार बढ़ने का जोखिम पैदा कर सकता है।

अनियंत्रित व्यावसायीकरण लत, प्रतिगामी व्यय और शोषण का जोखिम बढ़ा सकता है।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“भारत में लॉटरी विनियमन पितृसत्तात्मक सामाजिक नीति, राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता और व्यक्तिगत विकल्प के बीच तनाव को दर्शाता है।” लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 और विधायी शक्तियों के संघीय विभाजन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

भारत में लॉटरी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत सरकार या राज्य सरकार द्वारा आयोजित लॉटरी संघ सूची की प्रविष्टि 40 के अंतर्गत आती है।
  2. सट्टेबाजी और जुआ सामान्यतः राज्य सूची में आते हैं।
  3. वर्तमान न्यायिक व्याख्या के अनुसार कोई राज्य अपनी लॉटरी संचालित करते हुए सभी अन्य राज्यों की लॉटरी पर प्रतिबंध लगा सकता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 1 और 2

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: सरकारी लॉटरी संघ सूची की प्रविष्टि 40 के अंतर्गत आती है, जबकि सट्टेबाजी और जुआ सामान्यतः राज्य सूची की प्रविष्टि 34 से संबंधित हैं। बी.आर. एंटरप्राइजेज निर्णय के अनुसार किसी राज्य को दूसरे राज्यों की लॉटरी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए स्वयं भी लॉटरी-मुक्त नीति अपनानी होगी।

प्रश्न 2

लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. धारा 4 उन शर्तों से संबंधित है जिनके अधीन राज्य लॉटरी आयोजित की जा सकती है।
  2. धारा 5 अन्य राज्यों द्वारा आयोजित लॉटरी के संबंध में राज्य की प्रतिबंध शक्ति से जुड़ी है।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य-आयोजित लॉटरी को अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत सामान्य व्यापार के समान पूर्ण संवैधानिक संरक्षण प्राप्त गतिविधि माना है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1

B. केवल 1 और 2

C. केवल 2 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: धारा 4 राज्य लॉटरी आयोजित करने की शर्तें निर्धारित करती है, जबकि धारा 5 अन्य राज्यों की लॉटरी के संबंध में प्रतिबंध की शक्ति से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने लॉटरी को जुए का एक रूप माना है और इसे सामान्य व्यापार की तरह अनुच्छेद 19(1)(g) का पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है।