RWA Civil Services
Current Affairs - Daily 24 अक्टूबर 2026

भारत में सजा निर्धारण और सेंटेंसिंग काउंसिल

भारत में सजा निर्धारण के लिए व्यापक और समान दिशानिर्देशों का अभाव न्यायिक परिणामों में असमानता पैदा कर सकता है। एक सेंटेंसिंग काउंसिल न्यायिक विवेक को समाप्त किए बिना उसे संरचित और जवाबदेह बना सकती है।

भारत में सजा निर्धारण और सेंटेंसिंग काउंसिल

  • पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — न्यायपालिका, आपराधिक न्याय सुधार, मौलिक अधिकार और शासन।
  • स्रोत एवं तिथि: द हिन्दु , 23 अक्टूबर 2026।

हालिया संदर्भ

भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था दोषसिद्धि के बाद सटीक दंड तय करते समय न्यायाधीशों को व्यापक विवेकाधिकार प्रदान करती है। कानून सामान्यतः अधिकतम और कुछ मामलों में न्यूनतम सजा निर्धारित करते हैं, लेकिन ऐसा कोई व्यापक राष्ट्रीय ढाँचा नहीं है जो यह स्पष्ट करे कि न्यायालयों को क्षति, दोषिता, दंड-वृद्धिकारी परिस्थितियों, दंड-न्यूनकारी परिस्थितियों, पुनर्वास और कारावास के विकल्पों को किस प्रकार लगातार और समान रूप से तौलना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय पूर्व में चेतावनी दे चुका है कि सजा निर्धारण “लॉटरी” नहीं बनना चाहिए और उसने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय सजा-निर्धारण नीति की व्यवहार्यता पर विचार करने को भी कहा है।

सजा निर्धारण क्या है?

सजा निर्धारण वह चरण है, जिसमें न्यायालय कानून द्वारा निर्धारित दंड की सीमा को किसी विशिष्ट दंड में परिवर्तित करता है।

उदाहरण के लिए, यदि कानून “दस वर्ष तक” कारावास की अनुमति देता है, तो न्यायाधीश को अपराध के तथ्यों और अपराधी की परिस्थितियों को देखते हुए वास्तविक अवधि तय करनी होती है। न्यायालय जुर्माना, परिवीक्षा और अन्य वैध विकल्पों पर भी विचार कर सकता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है, जब समान मामलों में केवल इसलिए बहुत अलग-अलग सजाएँ दी जाती हैं क्योंकि अलग-अलग न्यायाधीश समान कारकों को अलग-अलग महत्त्व देते हैं।

अनियंत्रित न्यायिक विवेक क्यों समस्या है?

न्यायिक विवेक आवश्यक है, क्योंकि कोई भी दो मामले पूरी तरह समान नहीं होते। लेकिन स्पष्ट सिद्धांतों के बिना विवेक मनमानी और असमानता पैदा कर सकता है।

सजा निर्धारण पर हुए अध्ययनों से यह सामने आया है कि न्यायालयों ने कभी-कभी अप्रासंगिक कारकों पर निर्भर किया है, जबकि मनोवैज्ञानिक क्षति, विश्वास के दुरुपयोग या पीड़ित की संवेदनशीलता जैसे कारकों को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया गया।

इसके संवैधानिक निहितार्थ भी हैं, क्योंकि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 21 यह अपेक्षा करता है कि स्वतंत्रता से किसी भी वंचन की प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तिसंगत हो।

 

कारावास के विकल्पों का कम उपयोग

भारतीय कानून पहले से ही कारावास के विकल्प उपलब्ध कराता है।

अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (Probation of Offenders Act, 1958) पात्र मामलों में न्यायालयों को अपराधियों को तुरंत कारागार भेजने के बजाय परिवीक्षा पर छोड़ने की अनुमति देता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita—BNSS) में भी सजा निर्धारण और दोषसिद्धि के बाद राहत से संबंधित प्रावधान हैं।

हालाँकि भारत में ऐसा कोई सामान्य ढाँचा नहीं है जो स्पष्ट करे कि पुनर्वास, निवारण, सार्वजनिक सुरक्षा या सुधार में से किसे किन परिस्थितियों में अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए।

परिणामस्वरूप, ऐसे मामलों में भी कारावास का उपयोग किया जा सकता है जहाँ संरचित आकलन किसी गैर-कारावासी विकल्प का समर्थन कर सकता हो।

सेंटेंसिंग काउंसिल क्या कर सकती है?

एक वैधानिक सेंटेंसिंग काउंसिल अपराध-विशिष्ट दिशानिर्देश विकसित कर सकती है।

न्यायालय पहले दोषिता और क्षति के आधार पर अपराध की गंभीरता का आकलन कर सकते हैं। इसके बाद एक प्रारंभिक स्तर और सजा की सीमा निर्धारित की जा सकती है, जिसे मान्यता प्राप्त दंड-वृद्धिकारी या दंड-न्यूनकारी परिस्थितियों के आधार पर समायोजित किया जाए।

उद्देश्य हर मामले में समान दंड देना नहीं होगा। उद्देश्य होगा न्यायिक विवेक के प्रयोग के लिए समान सिद्धांत प्रदान करना।

आँकड़े सजा नीति को बेहतर बना सकते हैं

सेंटेंसिंग काउंसिल एक राष्ट्रीय सजा-निर्धारण डेटाबेस भी बनाए रख सकती है, जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड से भी जानकारी ली जा सकती है।

अपराध के प्रकार, क्षति, दोषिता, समायोजन और अंतिम दंड से संबंधित गुमनाम आँकड़े यह दिखा सकते हैं कि असमानताएँ कहाँ अधिक हैं और विशेष दिशानिर्देश कितने प्रभावी हैं।

ऐसे प्रमाण सजा नीति का कारागारों में भीड़ और पुनरावृत्ति अपराध पर प्रभाव समझने में भी सहायता कर सकते हैं।

इंग्लैंड और वेल्स से सीख

इंग्लैंड और वेल्स में एक वैधानिक सेंटेंसिंग काउंसिल कार्यरत है, जो विस्तृत दिशानिर्देश जारी करती है।

न्यायालय दोषिता और क्षति का आकलन करते हैं, अपराध की श्रेणी और सजा-सीमा निर्धारित करते हैं और फिर दंड-वृद्धिकारी तथा दंड-न्यूनकारी परिस्थितियों के आधार पर सजा में बदलाव करते हैं। न्यायाधीश दिशानिर्देशों से अलग जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें कारण बताना होता है।

यह मॉडल दिखाता है कि दिशानिर्देश न्यायिक विवेक को निर्देशित कर सकते हैं, नियंत्रित नहीं।

दिशानिर्देश आधारित व्यवस्था के जोखिम

सजा-निर्धारण दिशानिर्देश अपने आप में लाभकारी नहीं होते।

राजनीतिक दबाव दंडात्मक लोकलुभावनवाद को बढ़ावा दे सकता है, जिससे अधिक कठोर कारावास दंड लागू किए जा सकते हैं, भले ही अधिक निवारक प्रभाव के प्रमाण उपलब्ध न हों। अत्यधिक मानकीकरण कारागार क्षमता और सामाजिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय अंतर की अनदेखी भी कर सकता है।

यह जोखिम भी है कि न्यायाधीश व्यक्तिगत परिस्थितियों पर वास्तविक विचार करने के बजाय केवल औपचारिक जाँच-सूची पूरी करने लगें।

इसलिए भारत में किसी भी सेंटेंसिंग काउंसिल के लिए संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शी आँकड़े और समय-समय पर समीक्षा आवश्यक होगी।

मूल नीतिगत सीख

भारत में सजा निर्धारण की समस्या यह नहीं है कि न्यायाधीशों के पास विवेकाधिकार है, बल्कि यह है कि यह विवेक अक्सर किसी साझा राष्ट्रीय ढाँचे के बिना प्रयोग किया जाता है।

एक सेंटेंसिंग काउंसिल अनुभवजन्य प्रमाणों पर आधारित सिद्धांत उपलब्ध कराकर संगति, पारदर्शिता और आनुपातिकता में सुधार कर सकती है, जबकि न्यायालयों को व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार दंड निर्धारित करने की स्वतंत्रता भी बनी रह सकती है।

लक्ष्य समान सजा नहीं, बल्कि समान तर्क और जवाबदेह न्यायिक विवेक होना चाहिए।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“सजा निर्धारण सुधार का उद्देश्य न्यायिक विवेक को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे संरचित करना होना चाहिए।” भारत में सेंटेंसिंग काउंसिल की आवश्यकता तथा न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों की चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न

भारत में सजा निर्धारण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. आपराधिक कानून ऐसी सीमा निर्धारित कर सकते हैं, जिसके भीतर न्यायालय वास्तविक दंड तय करते हैं।
  2. सजा निर्धारण में न्यायिक विवेक स्वतः संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।
  3. पात्र मामलों में परिवीक्षा कारावास का एक विकल्प हो सकती है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1
B. केवल 1 और 3
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: न्यायिक विवेक स्वयं में असंवैधानिक नहीं है। चिंता तब उत्पन्न होती है, जब उसका प्रयोग मनमाने ढंग से हो या उसके लिए सिद्धांतगत मार्गदर्शन का अभाव हो। उपयुक्त मामलों में परिवीक्षा एक मान्य गैर-कारावासी विकल्प है।