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Current Affairs - Daily 9 अक्टूबर 2026

पूर्वी समुद्री गलियारा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा

भारत की ऊंची तेल और गैस आयात निर्भरता तथा पश्चिमी समुद्री मार्गों पर अत्यधिक एकाग्रता ऊर्जा सुरक्षा को chokepoint risks के प्रति संवेदनशील बनाती है। Chennai-Vladivostok Eastern Maritime Corridor इस जोखिम को कम करने का एक संभावित विकल्प है।

पूर्वी समुद्री गलियारा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा

  • पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — भारत-रूस संबंध और विदेश नीति; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — ऊर्जा सुरक्षा, अवसंरचना, बंदरगाह, बाह्य व्यापार और महत्त्वपूर्ण खनिज।
  • स्रोत एवं तिथि: द इंडियन एक्सप्रेस, 8 अक्टूबर 2026।

चर्चा में क्यों?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को प्रभावित करने वाले संघर्ष और लाल सागर–बाब-अल-मंदेब गलियारे के आसपास हमलों ने भारत की संवेदनशील समुद्री ऊर्जा मार्गों पर निर्भरता की ओर फिर से ध्यान आकर्षित किया है।

भारत अपनी कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई आयात करता है और कच्चे तेल, एलएनजी तथा एलपीजी के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है। इन आयातों का एक बड़ा हिस्सा तथा भारत की रिफाइनिंग और एलएनजी रीगैसिफिकेशन क्षमता का अधिकांश भाग पश्चिमी तट पर केंद्रित है।

इसलिए चेन्नई–व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारे (EMC) का रणनीतिक महत्त्व बढ़ा है, क्योंकि यह भारत को रूसी सुदूर पूर्व से सीधे जोड़ने वाला संभावित पूर्वी ऊर्जा और व्यापार मार्ग है।

मूल ऊर्जा-सुरक्षा मुद्दा है:

आपूर्तिकर्ता विविधीकरण के बिना मार्ग विविधीकरण नहीं → रणनीतिक संवेदनशीलता बनी रहती है

भारत के ऊर्जा आयात समुद्री मार्गों पर अत्यधिक निर्भर

भारत विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं और आयातकों में शामिल है।

स्रोत के अनुसार कच्चे तेल की आयात निर्भरता लगभग 85-90%, एलएनजी की लगभग 50% और एलपीजी की करीब 60% है। इसका अर्थ है कि नौवहन मार्गों में व्यवधान घरेलू ऊर्जा उपलब्धता, कीमतों और महंगाई को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए ऊर्जा सुरक्षा केवल विदेशों में आपूर्तिकर्ताओं को सुरक्षित करने से कहीं अधिक व्यापक है।

इसके लिए आवश्यक हैं:

आपूर्तिकर्ता विविधता + मार्ग विविधता + भंडारण + रिफाइनिंग क्षमता + लचीले बंदरगाह

पश्चिमी तट पर संकेंद्रण रणनीतिक संवेदनशीलता 

भारत की ऊर्जा अवसंरचना का झुकाव पश्चिमी तट की ओर अधिक है।

स्रोत के अनुसार लगभग 65-70% तेल आयात और 75-80% एलएनजी आयात पश्चिमी तट पर संभाले जाते हैं। भारत की रिफाइनिंग और एलएनजी रीगैसिफिकेशन क्षमता का बड़ा हिस्सा भी वहीं स्थित है।

इससे संकेंद्रण जोखिम पैदा होता है:

पश्चिमी बंदरगाह + अरब सागर मार्ग → होर्मुज़/बाब-अल-मंदेब जोखिम → व्यवधान का खतरा

इसलिए विविधीकृत आपूर्तिकर्ता आधार भारत की संवेदनशीलता को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, यदि वे आपूर्तियाँ उन्हीं समुद्री गलियारों से होकर आती रहें।

रूस एक प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता

हाल के वर्षों में रूस भारत के लिए कच्चे तेल का एक प्रमुख स्रोत बनकर उभरा है।

हालाँकि रूसी तेल का बड़ा हिस्सा बाल्टिक बंदरगाहों से स्वेज–लाल सागर मार्ग के माध्यम से भारत पहुँचता रहा है और अंततः पश्चिमी भारतीय बंदरगाहों पर उतरता है।

इससे एक महत्त्वपूर्ण विरोधाभास पैदा होता है:

विविधीकृत आपूर्तिकर्ता → वही संवेदनशील मार्ग → अधूरा ऊर्जा विविधीकरण

इसलिए रणनीतिक उद्देश्य आपूर्तिकर्ता आधार के साथ-साथ परिवहन संरचना का भी विविधीकरण करना है।

पूर्वी समुद्री गलियारा द्वारा वैकल्पिक मार्ग

पूर्वी समुद्री गलियारा चेन्नई को रूस के सुदूर पूर्व में स्थित व्लादिवोस्तोक से जोड़ता है।

इसे 2019 में भारत की एक्ट फार ईस्ट नीति के साथ शुरू किया गया था।

यह गलियारा लगभग 10,470 किमी लंबा है, जबकि स्वेज के रास्ते पारंपरिक मुंबई–सेंट पीटर्सबर्ग मार्ग लगभग 16,070 किमी है। इससे अनुमानित पारगमन समय लगभग 36 दिनों से घटकर 24 दिन हो सकता है।

रणनीतिक श्रृंखला है:

व्लादिवोस्तोक → पूर्वी एशियाई समुद्र → चेन्नई → पूर्वी भारत

इससे स्वेज से जुड़े पश्चिममुखी नौवहन मार्गों पर निर्भरता कम की जा सकती है।

EMC भारत की व्यापक यूरेशियाई कनेक्टिविटी का पूरक

भारत दो व्यापक दिशाओं से रूस से जुड़ता है।

पश्चिमी दिशा में अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) बहु-माध्यमीय परिवहन नेटवर्क के माध्यम से भारत को रूस और यूरेशिया की ओर जोड़ता है।

पूर्वी दिशा में पूर्वी समुद्री गलियारा भारत को व्लादिवोस्तोक से जोड़ता है।

रूस का व्यापक ट्रांस-आर्कटिक परिवहन गलियारा समुद्र, रेल, सड़क और अंतर्देशीय जलमार्गों का उपयोग कर उसके पश्चिमी, आर्कटिक और सुदूर पूर्वी परिवहन तंत्रों को जोड़ने का प्रयास करता है।

साथ मिलकर ये संभावनाएँ प्रदान करते हैं:

पश्चिमी यूरेशियाई कनेक्टिविटी + पूर्वी समुद्री कनेक्टिविटी = अधिक मार्ग लचीलापन

रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक संसाधनों तक पहुँच बढ़ा सकते

यह गलियारा संसाधन-संपन्न रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक तक भारत की पहुँच में भी सुधार कर सकता है।

इस क्षेत्र में तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला, निकल, तांबा, बहुमूल्य धातुएँ, औद्योगिक खनिज और दुर्लभ मृदा तत्वों के पर्याप्त भंडार हैं।

इससे EMC की प्रासंगिकता केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहती।

यह समर्थन कर सकता है:

ऊर्जा सुरक्षा + महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा + उर्वरक सुरक्षा + औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाएँ

भारत के लिए खनिजों और ऊर्जा संसाधनों में विविधीकरण का महत्त्व बढ़ रहा है क्योंकि स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत विनिर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्रियों तक विश्वसनीय पहुँच आवश्यक है।

एलएनजी रीगैसिफिकेशन ऊर्जा अवसंरचना की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी

एलएनजी वह प्राकृतिक गैस है जिसे लगभग −162°C तक ठंडा किया जाता है, जिससे उसका समुद्री परिवहन आर्थिक रूप से संभव हो जाता है।

गंतव्य पर विशेष टर्मिनल एलएनजी को रीगैसिफिकेशन के माध्यम से दोबारा गैसीय रूप में बदलते हैं, जिसके बाद इसे पाइपलाइन नेटवर्क में भेजा जाता है।

इस प्रकार:

प्राकृतिक गैस → द्रवीकरण → समुद्री परिवहन → एलएनजी टर्मिनल → रीगैसिफिकेशन → पाइपलाइन वितरण

इसलिए रीगैसिफिकेशन अवसंरचना का भौगोलिक संकेंद्रण स्वयं ऊर्जा-सुरक्षा की संवेदनशीलता पैदा कर सकता है।

वाणिज्यिक व्यवहार्यता अभी भी सबसे बड़ी कमी

यद्यपि EMC को परिचालन में घोषित किया गया है और माल की आवाजाही हो रही है, स्रोत इस बात पर जोर देता है कि अभी भी प्रमुख भारतीय बंदरगाहों और रूसी सुदूर पूर्व को जोड़ने वाली कोई नियमित सीधी लाइनर सेवा उपलब्ध नहीं है।

पूर्वानुमेय नौवहन सेवा के बिना व्यवसायों को सामना करना पड़ता है:

अनिश्चित पारगमन समय + अस्थिर मालभाड़ा दरें + कमजोर डिलीवरी विश्वसनीयता

इस कारण कुछ माल अभी भी तीसरे देशों के बंदरगाहों के माध्यम से अप्रत्यक्ष ट्रांसशिपमेंट पर निर्भर रहता है।

महत्त्वपूर्ण अंतर है:

कभी-कभार जहाज की आवाजाही ≠ वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य गलियारा

व्यापार असंतुलन द्वारा बैकहॉल समस्या उत्पन्न 

भारत-रूस व्यापार रूसी निर्यात, विशेषकर थोक वस्तुओं, के पक्ष में अत्यधिक असंतुलित है।

इससे बैकहॉल समस्या उत्पन्न होती है: रूस से कच्चा तेल, कोयला या उर्वरक लेकर भारत की ओर आने वाले जहाजों के पास वापसी यात्रा के लिए पर्याप्त वाणिज्यिक माल नहीं हो सकता।

इसलिए टिकाऊ गलियारे के लिए भारत से अधिक निर्यात आवश्यक हैं, जैसे:

फार्मास्यूटिकल्स + इंजीनियरिंग वस्तुएँ + रसायन + कृषि उत्पाद

नियमित अनुसूचित सेवाओं को समर्थन देने के लिए गलियारे में दोनों दिशाओं में पर्याप्त माल प्रवाह आवश्यक है।

एक विश्वसनीय पूर्वी ऊर्जा गलियारा बनाना

स्रोत प्रारंभिक वाणिज्यिक जोखिम की समस्या को दूर करने के लिए अस्थायी प्रोत्साहन, रियायती बंदरगाह शुल्क, सुनिश्चित बर्थिंग विंडो, न्यूनतम माल प्रतिबद्धता और भारतीय तथा रूसी नौवहन कंपनियों के बीच सहयोग जैसे उपायों की पहचान करता है।

नीतिगत परिवर्तन होना चाहिए:

मार्ग की उपलब्धता → अनुसूचित नौवहन → पूर्वानुमेय लॉजिस्टिक्स → अधिक माल मात्रा → टिकाऊ गलियारा

मूल नीतिगत सीख

भारत की ऊर्जा-सुरक्षा बहस को केवल नए आपूर्तिकर्ताओं की पहचान से आगे बढ़ना होगा।

आयातित हाइड्रोकार्बन पर निर्भर कोई देश तब भी संवेदनशील रहता है जब उसके ऊर्जा शिपमेंट, बंदरगाह और प्रसंस्करण अवसंरचना सीमित मार्गों पर केंद्रित हों।

इसलिए EMC एक व्यापक रणनीतिक सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करता है:

आपूर्तिकर्ता विविधीकरण + मार्ग विविधीकरण + भौगोलिक अवसंरचना विविधीकरण = मजबूत ऊर्जा लचीलापन

हालाँकि इसकी सफलता का अंतिम आकलन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कोई जहाज चेन्नई और व्लादिवोस्तोक के बीच यात्रा कर सकता है या नहीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि आयातक और निर्यातक नियमित और वाणिज्यिक रूप से टिकाऊ समुद्री सेवा पर भरोसा कर सकते हैं या नहीं।


संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल आपूर्तिकर्ताओं का ही नहीं, बल्कि परिवहन मार्गों और अवसंरचना का भी विविधीकरण आवश्यक है।” चेन्नई–व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारे के रणनीतिक महत्त्व और वाणिज्यिक चुनौतियों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।


प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न 1

निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:

  1. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ — फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी
  2. बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य — लाल सागर और अदन की खाड़ी
  3. स्वेज नहर — भूमध्य सागर और लाल सागर

उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?

A. केवल एक
B. केवल दो
C. सभी तीन
D. कोई नहीं

सही उत्तर: C

व्याख्या: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है; बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है; और स्वेज नहर भूमध्य सागर तथा लाल सागर के बीच समुद्री संपर्क प्रदान करती है। ये सभी वैश्विक ऊर्जा और वस्तु व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण चोकपॉइंट हैं।

प्रश्न 2

ऊर्जा और परिवहन अवसंरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. रीगैसिफिकेशन एलएनजी को संचरण और उपयोग के लिए पुनः गैसीय प्राकृतिक गैस में बदलता है।
  2. अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा समुद्र, रेल और सड़क संपर्कों को शामिल करने वाले बहु-माध्यमीय कनेक्टिविटी नेटवर्क के रूप में डिजाइन किया गया है।
  3. कोई समुद्री गलियारा केवल एक बार किसी मालवाहक जहाज के मार्ग पूरा कर लेने से स्वतः वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य बन जाता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

व्याख्या: एलएनजी को सामान्य गैस-वितरण प्रणालियों में प्रवेश से पहले रीगैसिफाई किया जाता है, जबकि INSTC एक बहु-माध्यमीय परिवहन नेटवर्क है। किसी समुद्री गलियारे की वाणिज्यिक व्यवहार्यता के लिए पूर्वानुमेय समय-सारणी, पर्याप्त माल मात्रा, प्रतिस्पर्धी मालभाड़ा दरें और विश्वसनीय बंदरगाह सेवाएँ भी आवश्यक होती हैं।