भारत में नागरिक अवसंरचना का संकट: दुर्घटनाओं से आगे प्रणालीगत शहरी शासन की विफलता
भारत में बार-बार होने वाली भवन, पुल और अन्य नागरिक अवसंरचना दुर्घटनाएँ दिखाती हैं कि समस्या केवल मानकों की कमी नहीं बल्कि कमजोर प्रवर्तन, रखरखाव, नगर निकाय क्षमता और जवाबदेही की भी है।
भारत में नागरिक अवसंरचना का संकट
पाठ्यक्रम मानचित्रण: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — शहरीकरण और उससे संबंधित समस्याएँ; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — स्थानीय शासन, जवाबदेही और सेवा वितरण; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अवसंरचना और आपदा प्रबंधन; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV — लोक सेवा जवाबदेही।
स्रोत एवं तिथि: द हिंदू विचार लेख, 23 सितंबर 2026; साथ में भारतीय मानक ब्यूरो, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय तथा आपदा प्रबंधन अधिनियम से संबंधित आधिकारिक सामग्री। मूल विश्लेषण बार-बार होने वाली नागरिक अवसंरचना दुर्घटनाओं को कमजोर प्रवर्तन, प्रशासनिक जवाबदेही और अपर्याप्त रखरखाव से जोड़ता है।
नागरिक अवसंरचना चर्चा में क्यों?
भारतीय शहरों में समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएँ—जैसे:
- इमारतों का गिरना,
- अवैध या असुरक्षित निर्माण,
- पुलों की विफलता,
- असुरक्षित होर्डिंग,
- जलमग्न बेसमेंट,
- खराब होती सार्वजनिक संरचनाएँ,
एक व्यापक शहरी शासन समस्या की ओर संकेत करती हैं।
अक्सर प्रशासनिक प्रतिक्रिया एक परिचित चक्र में दिखाई देती है:
दुर्घटना → गिरफ्तारी/निलंबन → मुआवज़ा → जाँच समिति → सार्वजनिक ध्यान कम → अगली दुर्घटना
मूल समस्या यह है कि दुर्घटना के बाद की सक्रियता को दुर्घटना से पहले की नियमित रोकथाम में पर्याप्त रूप से परिवर्तित नहीं किया जाता।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार 2020 से 2024 के बीच भारत में संरचनाओं के गिरने की घटनाओं में 7,874 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि पाँच वर्षों में दिल्ली में ऐसी घटनाओं से 169 मौतें दर्ज की गईं।
मूल समस्या: नियमों की कमी नहीं, प्रवर्तन की कमी
भारत में भवन सुरक्षा और शहरी निर्माण के लिए नियामकीय ढाँचा उपलब्ध है।
लेकिन वास्तविक कमजोरी अक्सर इस श्रृंखला में दिखाई देती है:
मानक → स्वीकृति → निरीक्षण → प्रवर्तन → रखरखाव
यदि किसी इमारत में अवैध निर्माण, संरचनात्मक बदलाव या सुरक्षा उल्लंघन वर्षों तक जारी रहता है, तो केवल भवन-मालिक या ठेकेदार को दोष देना पर्याप्त नहीं है।
प्रश्न यह भी उठता है:
- निरीक्षण किसने किया?
- उल्लंघन दर्ज क्यों नहीं हुआ?
- कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- यदि उल्लंघन ज्ञात था तो उसे जारी क्यों रहने दिया गया?
यहीं नागरिक अवसंरचना का प्रश्न शहरी शासन और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
इसे प्रधान–प्रतिनिधि समस्या के रूप में भी समझा जा सकता है।
नागरिक प्रशासन को सार्वजनिक सुरक्षा नियम लागू करने की जिम्मेदारी देता है, लेकिन यदि अधिकारियों के पास पर्याप्त क्षमता, प्रोत्साहन या जवाबदेही न हो, तो नियम व्यवहार में कमजोर पड़ सकते हैं।
वर्तमान भवन-सुरक्षा ढाँचा क्या है?
भारतीय मानक ब्यूरो ने 30 अप्रैल 2026 को SP 7:2026 — राष्ट्रीय भवन निर्माण मानक 2026 स्थापित किया।
इसी तिथि को पूर्ववर्ती SP 7:2016 — राष्ट्रीय भवन संहिता, 2016 को वापस लिया गया।
इसलिए यूपीएससी के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य है:
SP 7:2016 → अब नवीनतम मानक नहीं
SP 7:2026 → राष्ट्रीय भवन निर्माण मानक 2026
भारतीय मानक ब्यूरो का भवन कोड ढाँचा निर्माण गतिविधियों के नियमन के लिए एक मॉडल राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान करता है और इसमें:
- प्रशासनिक विनियमन,
- विकास नियंत्रण,
- अग्नि सुरक्षा,
- संरचनात्मक डिजाइन,
- निर्माण सुरक्षा,
- सामग्री,
- भवन सेवाएँ,
- स्थिरता,
- संपत्ति एवं सुविधा प्रबंधन
जैसे आयाम शामिल हैं।
मॉडल भवन उपविधियाँ, 2016 की भूमिका
मॉडल भवन उपविधियाँ, 2016 राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों, विकास प्राधिकरणों और अन्य नियोजन संस्थाओं के लिए मार्गदर्शक ढाँचा हैं।
इनका उद्देश्य निर्माण को व्यवस्थित करना तथा भवनों को:
- आग,
- भूकंप,
- संरचनात्मक विफलता,
- अन्य प्राकृतिक और मानव-जनित जोखिमों
से सुरक्षित बनाने के लिए नियामकीय व्यवस्था प्रदान करना है।
उपविधियों में अनधिकृत निर्माण की स्थिति में कार्रवाई के विकल्प भी दिए गए हैं, जिनमें:
- अवैध निर्माण का ध्वस्तीकरण,
- परिसर सील करना,
- अभियोजन,
- अन्य लागू कानूनी कार्रवाई
शामिल हो सकती है।
लेकिन यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंतर है:
मॉडल मानक ≠ स्वतः स्थानीय कानून
इनका वास्तविक प्रभाव राज्य कानूनों, स्थानीय भवन उपविधियों और स्थानीय प्रशासन द्वारा इन्हें अपनाने तथा लागू करने पर निर्भर करता है।
शहरी स्थानीय निकाय क्यों केंद्रीय भूमिका में हैं?
शहरी सुरक्षा का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर संचालित होता है।
नगर निकाय और विकास प्राधिकरण प्रायः निम्न क्षेत्रों से जुड़े होते हैं:
- भवन अनुमति,
- भू-उपयोग नियंत्रण,
- स्थानीय सड़कें,
- जल निकासी,
- संपत्ति अभिलेख,
- निर्माण निरीक्षण,
- स्थानीय सेवाएँ,
- अग्नि सुरक्षा समन्वय,
- अवैध निर्माण पर कार्रवाई।
इसलिए नागरिक अवसंरचना की विफलता को केवल इंजीनियरिंग की समस्या मानना अधूरा दृष्टिकोण है।
यह स्थानीय शासन क्षमता का भी प्रश्न है।
नगर निकायों की प्रमुख कमजोरियाँ
कई भारतीय शहरों में शहरी स्थानीय निकाय निम्न समस्याओं से जूझते हैं:
- योग्य इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी,
- विभागों के बीच विभाजित अधिकार क्षेत्र,
- अपर्याप्त निरीक्षण क्षमता,
- अधूरे या पुराने भवन अभिलेख,
- राजनीतिक दबाव,
- भ्रष्टाचार,
- कमजोर प्रवर्तन,
- सीमित रखरखाव बजट।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण निर्माण और अवसंरचना का विस्तार उस संस्थागत क्षमता से तेज हो सकता है जो उन्हें नियंत्रित करने के लिए उपलब्ध है।
इससे एक स्थिति बनती है:
तेज शहरी विस्तार + कमजोर स्थानीय संस्थाएँ = बढ़ता संरचनात्मक जोखिम
74वाँ संविधान संशोधन और शहरी शासन
भारत में शहरी स्थानीय शासन का संवैधानिक आधार 74वें संविधान संशोधन से मजबूत हुआ।
इसके तहत नगर निकायों को लोकतांत्रिक स्थानीय शासन की संस्थाओं के रूप में संवैधानिक मान्यता दी गई।
लेकिन केवल संवैधानिक दर्जा पर्याप्त नहीं है।
प्रभावी शहरी शासन के लिए आवश्यक है:
कार्य + वित्त + कर्मचारी + तकनीकी क्षमता + जवाबदेही
यदि किसी नगर निकाय को भवन सुरक्षा और शहरी सेवाओं की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन उसके पास पर्याप्त अभियंता, डिजिटल रिकॉर्ड, निरीक्षण व्यवस्था या वित्त नहीं है, तो वास्तविक विकेंद्रीकरण अधूरा रह सकता है।
आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक से निवारक बनाना होगा
आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल दुर्घटना के बाद राहत और बचाव नहीं है।
आपदा प्रबंधन अधिनियम स्थानीय प्राधिकरणों को अपने अधिकार क्षेत्र में निर्माण को आपदा-निवारण और शमन मानकों के अनुरूप सुनिश्चित करने की भूमिका देता है।
आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम, 2025 ने एक नया धारा 41A जोड़ा, जिसके तहत राज्य सरकारें राज्य की राजधानियों और नगर निगम वाले शहरों के लिए अलग शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठित कर सकती हैं; दिल्ली और चंडीगढ़ इसके अपवाद हैं।
धारा 41A के तहत:
- नगर आयुक्त — पदेन अध्यक्ष,
- संबंधित जिले का जिला कलेक्टर — पदेन उपाध्यक्ष,
- अन्य राज्य-निर्धारित सदस्य
प्राधिकरण का हिस्सा हो सकते हैं।
शहरी प्राधिकरण को शहरी आपदा प्रबंधन योजना तैयार करने और उसके कार्यान्वयन के समन्वय की जिम्मेदारी दी गई है।
इसका महत्त्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन है:
ढहने के बाद बचाव → ढहने से पहले जोखिम पहचान
रखरखाव उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना नया निर्माण
भारत की अवसंरचना चुनौती केवल अधिक सड़कें, पुल या भवन बनाने की नहीं है।
पहले से मौजूद संपत्तियों को सुरक्षित बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
अवसंरचना के लिए जीवन-चक्र दृष्टिकोण होना चाहिए:
डिज़ाइन → निर्माण गुणवत्ता → निरीक्षण → रखरखाव → संरचनात्मक ऑडिट → पुनर्वास
यदि सरकार या नगर निकाय किसी संपत्ति को केवल निर्माण तक पूंजीगत व्यय मानते हैं और उसके बाद नियमित रखरखाव के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं रखते, तो समय के साथ जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए:
नई परिसंपत्ति बनाना ≠ सुरक्षित परिसंपत्ति बनाए रखना
निवारक रखरखाव क्या है?
निवारक रखरखाव का अर्थ है किसी संरचना के विफल होने की प्रतीक्षा करने के बजाय नियमित रूप से उसकी स्थिति का मूल्यांकन करना।
उदाहरण:
- पुल की संरचनात्मक जाँच,
- पुरानी इमारत का सुरक्षा ऑडिट,
- जल निकासी तंत्र की पूर्व-मानसून सफाई,
- क्षतिग्रस्त कंक्रीट की समय पर मरम्मत,
- अग्नि सुरक्षा उपकरणों की नियमित जाँच।
इसका मूल सिद्धांत है:
छोटी खराबी की समय पर मरम्मत → बड़ी दुर्घटना की संभावना में कमी
संरचनात्मक ऑडिट की भूमिका
पुरानी, अधिक उपयोग वाली या जोखिम-युक्त इमारतों के लिए संरचनात्मक ऑडिट महत्त्वपूर्ण उपकरण हो सकता है।
इसमें भवन की:
- नींव,
- स्तंभ,
- बीम,
- स्लैब,
- दरारें,
- जंग,
- भार-वहन क्षमता,
- अनधिकृत परिवर्तन
जैसी स्थितियों का तकनीकी मूल्यांकन किया जा सकता है।
लेकिन संरचनात्मक ऑडिट तभी प्रभावी है जब:
ऑडिट → निष्कर्ष → समयबद्ध मरम्मत → अनुपालन सत्यापन
पूरी श्रृंखला लागू हो।
केवल प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेना सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता।

चयनात्मक प्रवर्तन विधि के शासन को कमजोर करता है
अतिक्रमण या भवन-सुरक्षा नियमों का प्रवर्तन तभी वैध और विश्वसनीय माना जाएगा जब वह निष्पक्ष हो।
यदि कार्रवाई मुख्यतः कमजोर या राजनीतिक प्रभाव से वंचित समूहों पर हो, जबकि समान प्रकार के उल्लंघन प्रभावशाली व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा किए जाने पर अनदेखे रहें, तो शासन की वैधता कमजोर होती है।
इसलिए आवश्यक है:
समान मानक + पारदर्शी प्रवर्तन + अपील की व्यवस्था + आनुपातिक कार्रवाई
सुरक्षा नियमों का प्रयोग व्यक्ति की राजनीतिक या सामाजिक शक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि उल्लंघन की प्रकृति और जोखिम के आधार पर होना चाहिए।
दुर्घटना के बाद गिरफ्तारी पर्याप्त क्यों नहीं?
अक्सर किसी बड़ी दुर्घटना के बाद:
- इंजीनियर निलंबित होते हैं,
- ठेकेदार गिरफ्तार किए जाते हैं,
- जाँच समिति बनती है,
- मुआवज़ा घोषित होता है।
ये कार्रवाइयाँ आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन वे निवारक शासन का विकल्प नहीं हैं।
यदि हर दुर्घटना के बाद वही प्रशासनिक प्रतिक्रिया दोहराई जाती है, लेकिन निरीक्षण प्रणाली, रखरखाव प्रोटोकॉल और जवाबदेही तंत्र नहीं बदलते, तो जोखिम संरचनात्मक रूप से बना रहता है।
इसलिए शासन का लक्ष्य होना चाहिए:
व्यक्ति-आधारित दोष निर्धारण + प्रणालीगत सुधार
क्या बदलना चाहिए?
भारत को दुर्घटना-प्रेरित प्रशासन से आगे बढ़कर निरंतर शहरी जोखिम प्रबंधन अपनाना होगा।
इसके लिए निम्न सुधार उपयोगी हो सकते हैं:
- डिजिटल भवन रजिस्ट्री: प्रत्येक भवन की अनुमति, स्वामित्व, उपयोग और सुरक्षा स्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड।
- जोखिम-आधारित निरीक्षण: हर भवन की समान आवृत्ति से जाँच करने के बजाय पुराने, ऊँचे, अधिक भीड़ वाले या संरचनात्मक रूप से संवेदनशील भवनों को प्राथमिकता।
- आवधिक संरचनात्मक ऑडिट: जोखिमयुक्त संपत्तियों के लिए अनिवार्य तकनीकी जाँच।
- सार्वजनिक अनुपालन प्रमाणपत्र: नागरिक यह देख सकें कि भवन ने कौन-सी सुरक्षा जाँच पूरी की है।
- अधिकारी-विशिष्ट जवाबदेही: निरीक्षण और प्रवर्तन की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से निर्धारित हो।
- रखरखाव बजट: नई परियोजनाओं के साथ जीवन-चक्र रखरखाव की वित्तीय योजना।
- तकनीक आधारित निगरानी: भू-स्थानिक प्रणाली, ड्रोन, डिजिटल अनुमति प्रणाली और निरीक्षण रिकॉर्ड।
एकीकृत अभिलेख: भवन अनुमति, संपत्ति कर, अग्नि सुरक्षा और उपयोग प्रमाणपत्र के आँकड़ों को जोड़ना।

सार्वजनिक अनुपालन आकड़ों की उपलब्धता
यदि नागरिक किसी भवन, विद्यालय, मॉल, अस्पताल या वाणिज्यिक परिसर के बारे में यह देख सकें कि:
- उसकी निर्माण स्वीकृति कब हुई,
- अंतिम निरीक्षण कब हुआ,
- अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र वैध है या नहीं,
- कोई संरचनात्मक उल्लंघन दर्ज है या नहीं,
- ऑडिट की अगली तिथि क्या है,
तो नियमन केवल प्रशासन और भवन-मालिक के बीच बंद प्रक्रिया नहीं रहेगा।
इससे नागरिकों को सूचित विकल्प मिल सकता है और संस्थागत जवाबदेही बढ़ सकती है।
नागरिक अवसंरचना में जवाबदेही का सही ढाँचा
जवाबदेही केवल दुर्घटना के बाद किसी एक अधिकारी को निलंबित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
इसे तीन स्तरों पर देखना चाहिए:
व्यक्तिगत जवाबदेही + संस्थागत जवाबदेही + प्रणालीगत जवाबदेही
- व्यक्तिगत जवाबदेही: किस अधिकारी या ठेकेदार ने नियम तोड़ा?
- संस्थागत जवाबदेही: निरीक्षण और निगरानी प्रणाली क्यों विफल हुई?
- प्रणालीगत जवाबदेही: क्या वित्त, कर्मचारी, तकनीकी क्षमता या कानून में संरचनात्मक कमी थी?
मूल शासन सिद्धांत
सुरक्षित नागरिक अवसंरचना केवल भवन संहिता लिख देने से नहीं बनती।
इसके लिए आवश्यक है:
मानक + स्वीकृति + निर्माण पर्यवेक्षण + निरीक्षण + रखरखाव + पारदर्शिता + जवाबदेही
संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न
“भारतीय शहरों में नागरिक अवसंरचना की बार-बार होने वाली विफलता मानकों की अनुपस्थिति से अधिक कमजोर प्रवर्तन, रखरखाव और नगर प्रशासन की जवाबदेही की समस्या है।” चर्चा कीजिए।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
प्रश्न 1
भारत में भवन नियमन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- SP 7:2026 का शीर्षक राष्ट्रीय भवन निर्माण मानक 2026 है।
- SP 7:2026 ने SP 7:2016 — राष्ट्रीय भवन संहिता, 2016 का स्थान लिया।
- मॉडल भवन उपविधियाँ, 2016 राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों और विकास प्राधिकरणों के मार्गदर्शन के लिए तैयार की गई थीं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: D
व्याख्या: भारतीय मानक ब्यूरो ने 30 अप्रैल 2026 को SP 7:2026 स्थापित किया और SP 7:2016 को उसी तिथि से वापस लिया। मॉडल भवन उपविधियाँ, 2016 राज्यों तथा शहरी प्राधिकरणों को अपने भवन नियमों में सुधार के लिए मार्गदर्शक ढाँचा देती हैं।
प्रश्न 2
आपदा प्रबंधन अधिनियम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- स्थानीय प्राधिकरणों की जिम्मेदारियों में निर्माण को आपदा-निवारण और शमन मानकों के अनुरूप रखने से संबंधित दायित्व शामिल हैं।
- धारा 41A शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों का प्रावधान करती है।
- शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की शहरी आपदा प्रबंधन योजना तैयार करने में कोई भूमिका नहीं है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: B
व्याख्या: स्थानीय निकायों की आपदा-निवारण संबंधी भूमिका है। 2025 के संशोधन से जोड़ी गई धारा 41A शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों का प्रावधान करती है, और ऐसा प्राधिकरण शहरी योजना तैयार करने तथा उसके कार्यान्वयन के समन्वय के लिए जिम्मेदार है।
More Current Affairs - Daily
- भारत निर्वाचन आयोग: संवैधानिक संरचना और तीन सदस्यीय संस्था का विकास 12 अक्ट 2026
- लोकनायक जयप्रकाश नारायण: संपूर्ण क्रांति और लोकतंत्र में योगदान 12 अक्ट 2026
- रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की पहल: काला सागर से रणनीतिक स्वायत्तता तक 12 अक्ट 2026
- जयप्रकाश नारायण: संपूर्ण क्रांति के जनक और लोकतंत्र के प्रहरी 12 अक्ट 2026