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Current Affairs - Daily 1 अक्टूबर 2026

उत्तराखंड में पहली ग्लेशियल झील अर्ली वार्निंग प्रणाली स्थापित

उत्तराखंड के चमोली स्थित वसुंधरा ताल में ग्लेशियल झील से होने वाली बाढ़ के खतरे की निगरानी के लिए राज्य की पहली अर्ली वार्निंग प्रणाली स्थापित की जा रही है।

उत्तराखंड में पहली ग्लेशियल झील अर्ली वार्निंग प्रणाली

चर्चा में क्यों?

  • उत्तराखंड के चमोली स्थित वसुंधरा ताल में ग्लेशियल झील से आने वाली बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए राज्य की पहली रियल-टाइम अर्ली वार्निंग प्रणाली स्थापित की जा रही है। 
  • इस प्रणाली को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून के विशेषज्ञों की टीम स्थापित कर रही है। 
  • अभियान में SDRF, NDRF और ITBP सहयोग कर रहे हैं। 

प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ

  • प्रणाली लगातार निम्नलिखित की निगरानी करेगी: 
    • जल स्तर और जल प्रवाह, ताकि अचानक होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सके। 
    • वर्षा, तापमान, आर्द्रता और हवा की गति एवं दिशा। 
    • बर्फ की गहराई और सतह के नीचे का तापमान। 
    • भूमि की हलचल और कंपन, जिनकी निगरानी विशेष सेंसर से की जाएगी। 
  • मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण डेटा को सैटेलाइट संचार के माध्यम से भेजा जाएगा।
  • एक निगरानी प्रणाली निर्धारित सीमा से अधिक बदलाव होने पर अलर्ट जारी करेगी।

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने उत्तराखंड में 13 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान की है। इनमें 5 को सबसे उच्च जोखिम वाली श्रेणी-A में रखा गया है। 
  • राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने 2023 में उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान की थी। 
  • 13 उच्च जोखिम वाली झीलों में 6 पिथौरागढ़, 4 चमोली तथा 1-1 बागेश्वर, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी में हैं। 
  • छह झीलों में बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा हो चुका है: 
    • सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल – चमोली 
    • केदारताल – उत्तरकाशी 
    • माबांग, प्युनग्रू और स्यूंकती यांकती – पिथौरागढ़ की दारमा घाटी

महत्व

  • यह पहल संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की केवल पहचान करने से आगे बढ़कर उनकी वास्तविक समय में निगरानी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 
  • समय रहते असामान्य बदलावों का पता लगने से प्रशासन को बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को संभावित बाढ़ से बचाने तथा समय पर बचाव एवं निकासी उपाय करने में मदद मिल सकती है।
  • मुख्य चुनौती केवल झील में बदलाव का पता लगाना नहीं, बल्कि इस जानकारी को समय पर चेतावनी में बदलकर प्रभावित समुदायों तक पहुँचाना है। 

ग्लेशियल झीलें क्या हैं?

  • ग्लेशियल झीलें वे जल निकाय हैं जो ग्लेशियरों द्वारा बनाए गए गड्ढों में पिघले पानी के जमा होने से बनती हैं। 
  • पीछे हटते ग्लेशियर चट्टानों को काटकर गड्ढे बनाते हैं, जिनमें बाद में पिघला हुआ पानी जमा हो जाता है। 
  • मोरेन से बनी झीलें अधिक अस्थिर होती हैं क्योंकि इनके प्राकृतिक बांध ढीली चट्टानों, मिट्टी और बर्फ से बने होते हैं। 

GLOF के प्रमुख कारण

  • ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) तब आती है जब ग्लेशियल झील का प्राकृतिक बांध टूट जाता है और बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बहता है। 
  • इसके प्रमुख कारण हैं: 
    • जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना। 
    • भारी वर्षा और बादल फटना, जिससे झील का जलस्तर बढ़ता है। 
    • हिमस्खलन, भूस्खलन और चट्टानों का गिरना, जिससे झील में अचानक बड़ी लहर पैदा हो सकती है। 
    • भूकंप, जो ढलानों और मोरेन बांधों को अस्थिर कर सकते हैं। 
    • मोरेन में मौजूद बर्फ का लगातार पिघलना। 
    • वर्षा, बर्फ पिघलने और ग्लेशियर के पानी से अचानक जलभराव। 
    • सड़कों, सुरंगों, जलविद्युत परियोजनाओं और अत्यधिक पर्यटन जैसी अवैज्ञानिक मानवीय गतिविधियाँ भी जोखिम बढ़ा सकती हैं। 

सरकारी पहल

  • भारत ने संवेदनशील ग्लेशियल झीलों के लिए राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम शुरू किया है। 
  • आपदा प्रबंधन का दृष्टिकोण अब केवल राहत और बचाव से हटकर रोकथाम, निगरानी और अर्ली वार्निंग पर केंद्रित हो रहा है। 
  • संवेदनशील झीलों के पास स्वचालित मौसम और जल निगरानी केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। 
  • GSI, IMD, ISRO, DRDO और केंद्रीय जल आयोग जैसी संस्थाएँ ग्लेशियर, वर्षा, जल प्रवाह और आपदा जोखिम की निगरानी में योगदान देती हैं। 
  • विभिन्न शोध कार्यक्रम ग्लेशियरों के पीछे हटने, जलवायु परिवर्तन और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन कर रहे हैं। 
  • ITBP, स्थानीय स्वयंसेवकों और आपदा प्रतिक्रिया दलों को निकासी एवं बचाव कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)

  • NDMA भारत में आपदा प्रबंधन की सर्वोच्च वैधानिक संस्था है। 
  • इसका गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया और यह 27 सितंबर 2006 को औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया। 
  • इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा इसमें अन्य सदस्य होते हैं, जिनमें से एक को उपाध्यक्ष बनाया जाता है। 
  • इसका मुख्य कार्य आपदा प्रबंधन से संबंधित नीतियाँ, योजनाएँ और दिशा-निर्देश तैयार करना तथा तैयारी, रोकथाम और राहत क्षमता को मजबूत करना है। 
  • इसका उद्देश्य सुरक्षित और आपदा-रोधी भारत का निर्माण करना है। 

NDMA के प्रमुख कार्य

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को मंजूरी देना। 
  • आपदा प्रबंधन से संबंधित राष्ट्रीय नीतियाँ और दिशा-निर्देश तैयार करना। 
  • केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों की आपदा प्रबंधन योजनाओं को मंजूरी देना। 
  • राज्यों को आपदा प्रबंधन योजनाएँ तैयार करने के लिए दिशा-निर्देश देना। 
  • विकास परियोजनाओं में आपदा रोकथाम और जोखिम न्यूनीकरण को शामिल करने को बढ़ावा देना। 
  • आपदा प्रबंधन नीतियों एवं योजनाओं के क्रियान्वयन में समन्वय करना। 
  • आपदा न्यूनीकरण और तैयारी के लिए धन उपलब्ध कराने की सिफारिश करना। 

भारत में आपदा प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था

  • आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है। 
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति, 2009 आपदा प्रबंधन के लिए समग्र और समन्वित ढांचा प्रदान करती है। 
  • आपदा प्रबंधन की व्यवस्था तीन स्तरों पर है: 
    • राष्ट्रीय स्तर: NDMA — अध्यक्ष प्रधानमंत्री। 
    • राज्य स्तर: SDMA — अध्यक्ष मुख्यमंत्री। 
    • जिला स्तर: DDMA — अध्यक्ष जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर/उपायुक्त। 
  • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC), NDMA की सहायता करती है।
  • राज्य स्तर पर राज्य कार्यकारी समिति (SEC), SDMA की सहायता करती है। 
  • भारत आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (SFDRR) का भी हस्ताक्षरकर्ता है। 

राज्य स्तरीय संस्थाएँ

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

  • इसका अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है। 
  • राज्य में आपदा प्रबंधन से संबंधित नीतियाँ और योजनाएँ तैयार करता है। 
  • राज्य आपदा प्रबंधन योजना के क्रियान्वयन में समन्वय करता है। 
  • आपदा न्यूनीकरण और तैयारी के लिए धन की सिफारिश करता है। 
  • विकास योजनाओं में आपदा रोकथाम और जोखिम न्यूनीकरण को शामिल करने की समीक्षा करता है। 

राज्य कार्यकारी समिति (SEC)

  • इसका अध्यक्ष मुख्य सचिव होता है। 
  • राष्ट्रीय और राज्य स्तर की आपदा प्रबंधन नीतियों एवं योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी और समन्वय करती है। 

जिला स्तरीय संस्था

जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA)

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 25 के तहत प्रत्येक जिले में इसका गठन किया जाता है। 
  • सामान्यतः इसका अध्यक्ष जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर/उपायुक्त होता है। 
  • जिले में आपदा प्रबंधन की योजना, समन्वय और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती है। 
  • यह निर्माण कार्यों की जांच कर सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कर सकता है।
  • जिला स्तर पर राहत, तैयारी और आपातकालीन प्रतिक्रिया का समन्वय करता है।

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF)

  • NDRF भारत की प्रमुख विशेषीकृत बल है, जो प्राकृतिक और मानव-जनित आपदाओं के दौरान बचाव एवं राहत कार्य करता है। 
  • इसका गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत हुआ और यह 2006 में कार्यशील हुआ।
  • यह गृह मंत्रालय (MHA) के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है। 
  • इसका समन्वय NDMA, राज्य सरकारों, SDRF और जिला प्रशासन के साथ रहता है। 
  • इसका प्रमुख महानिदेशक (DG) होता है। 
  • इसका आदर्श वाक्य है — “आपदा सेवा सदैव सर्वत्र”। 
  • वर्तमान में NDRF में 16 विशेषीकृत बटालियन हैं। 

संगठन और तैनाती

  • NDRF में BSF, CRPF, CISF, ITBP, SSB और असम राइफल्स से कर्मियों की प्रतिनियुक्ति की जाती है। 
  • प्रत्येक बटालियन में लगभग 1,149 कर्मी होते हैं और इसमें विशेष खोज एवं बचाव दल होते हैं। 
  • बटालियनों को आपदा-संभावित क्षेत्रों में रणनीतिक रूप से तैनात किया जाता है, ताकि प्रतिक्रिया समय कम किया जा सके। 
  • त्वरित कार्रवाई के लिए क्षेत्रीय प्रतिक्रिया केंद्र और अग्रिम तैनाती स्थल भी बनाए गए हैं। 

प्रमुख कार्य

  • निम्नलिखित आपदाओं में खोज, बचाव और निकासी कार्य: 
    • बाढ़ और चक्रवात 
    • भूकंप और भूस्खलन 
    • इमारतों का ढहना 
    • औद्योगिक दुर्घटनाएँ 
    • रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (CBRN) आपात स्थितियाँ 
    • पर्वतीय और जल-आधारित आपदाएँ 
  • घायलों को प्राथमिक उपचार और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना। 
  • राज्यों की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करना। 
  • SDRF कर्मियों, सरकारी अधिकारियों और स्थानीय स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देना।
  • आपदा जागरूकता अभियान और मॉक ड्रिल आयोजित करना। 
  • आवश्यकता पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता और बचाव अभियानों में भाग लेना।

कानूनी आधार

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 National Disaster Response Force(NDRF) के गठन और कार्यप्रणाली का कानूनी आधार है। 
  • धारा 44 NDRF की स्थापना से संबंधित है। 
  • धारा 45 इसके नियंत्रण, प्रशिक्षण और तैनाती से संबंधित है। 
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (National Disaster Response Fund) एक अलग वित्तीय व्यवस्था है; इसे NDRF बल से अलग समझना चाहिए। 
  • धारा 46: आपदा के दौरान राहत एवं प्रतिक्रिया कार्यों के वित्तपोषण के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) की स्थापना का प्रावधान करती है।

 

अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी तथा आपदा प्रबंधन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. वसुंधरा ताल में स्थापित की जा रही प्रणाली जल-स्तर, जल-प्रवाह, मौसम संबंधी परिस्थितियों तथा भू-गतियों की रियल-टाइम निगरानी करेगी। 
  2. उत्तराखंड में NDMA द्वारा चिन्हित 13 उच्च-जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों में से पाँच Category A में आती हैं। 
  3. उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए मोबाइल नेटवर्क की अनुपलब्धता को देखते हुए प्रणाली में उपग्रह संचार का उपयोग किया जाएगा। 
  4. Disaster Management Act, 2005 की धारा 44 National Disaster Response Fund की स्थापना से संबंधित है, जबकि धारा 45 NDRF के प्रशिक्षण और तैनाती से संबंधित है। 

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 1 और 4
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (a) केवल 1, 2 और 3

व्याख्या

  • वसुंधरा ताल की प्रणाली जल-स्तर, जल-प्रवाह, मौसम संबंधी परिस्थितियों तथा भू-गतियों और कंपन की लगातार निगरानी करेगी। अतः कथन 1 सही है। 
  • NDMA ने उत्तराखंड में 13 उच्च-जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान की है, जिनमें 5 Category A, यानी सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी में हैं। अतः कथन 2 सही है। 
  • क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रणाली से डेटा भेजने के लिए satellite communication का प्रयोग किया जाएगा। कथन 3 सही है।
  • Section 44 NDRF(National Disaster Response Force) की स्थापना से संबंधित है, जबकि Section 45 NDRFNational Disaster Response Force) के नियंत्रण, प्रशिक्षण और तैनाती से संबंधित है। National Disaster Response Fund एक अलग वित्तीय तंत्र है। अतः कथन 4 गलत है।