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Current Affairs - Daily 25 सितमबर 2026

कर्नाटक के तटीय जिलों में तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक भाषा का दर्जा

कर्नाटक सरकार ने दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में तुलु को दूसरी अतिरिक्त आधिकारिक प्रशासनिक भाषा का दर्जा दिया है, जिससे सरकारी कामकाज में इसके उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।

चर्चा में क्यों?

  • कर्नाटक मंत्रिमंडल ने दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में तुलु को दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा दिया है। 
  • अब इन जिलों के सरकारी कार्यालय कन्नड़ के साथ तुलु में भी आधिकारिक संचार कर सकेंगे। 
  • तुलु के अनुवाद, प्रशिक्षण और भाषा से जुड़ी गतिविधियों के लिए सरकार ₹82 लाख प्रतिवर्ष उपलब्ध कराएगी। 

तुलु के बारे में:

  • तुलु एक प्रमुख द्रविड़ भाषा है। अन्य प्रमुख द्रविड़ भाषाएँ तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम हैं।
  • यह मुख्य रूप से कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी तथा केरल के कासरगोड के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। 
  • तुलु के लगभग 18–20 लाख मातृभाषी होने का अनुमान है। 
  • इसमें समृद्ध मौखिक परंपरा और लोक संस्कृति है तथा इसका संबंध यक्षगान और भूत कोला जैसी सांस्कृतिक परंपराओं से है। 
  • तुलु की ऐतिहासिक रूप से अपनी तिगलारी लिपि थी, लेकिन वर्तमान में इसका व्यापक उपयोग नहीं होता। तुलु लिखने के लिए मुख्य रूप से कन्नड़ लिपि का प्रयोग किया जाता है। 
  • तुलु के उपलब्ध सबसे पुराने अभिलेख लगभग 14वीं–15वीं शताब्दी के माने जाते हैं।
  • तुलु को भारत की एक स्वतंत्र गैर-अनुसूचित भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है, लेकिन यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। 

संवैधानिक प्रावधान:

  • अनुच्छेद 345: राज्य विधानमंडल को राज्य में प्रचलित एक या अधिक भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने की शक्ति देता है। 
  • अनुच्छेद 347: पर्याप्त संख्या में लोगों द्वारा मांग किए जाने पर किसी भाषा को राज्य या उसके किसी हिस्से में आधिकारिक मान्यता देने से संबंधित प्रावधान करता है। 
  • संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ शामिल हैं; तुलु इसमें शामिल नहीं है। 

महत्व और चुनौतियाँ

  • इस निर्णय से सरकारी संचार, शिक्षा, सार्वजनिक संकेतकों और सांस्कृतिक गतिविधियों में तुलु के उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है। 
  • प्रमुख चुनौती तिगलारी लिपि के सीमित ज्ञान और तुलु के लिए कन्नड़ लिपि के व्यापक उपयोग की है। 
  • यह निर्णय 2023 में गठित शिक्षाविद् एम. मोहन अल्वा की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है।

 

अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: तुलु भाषा और कर्नाटक में इसकी हालिया मान्यता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. तुलु को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा दिया गया है, जिससे इसका उपयोग कन्नड़ के साथ सरकारी संचार में किया जा सकता है। 
  2. तुलु संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं में शामिल है। 
  3. तिगलारी लिपि का ऐतिहासिक रूप से तुलु भाषा से संबंध है, जबकि वर्तमान में इसे लिखने के लिए कन्नड़ लिपि का अधिक व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। 
  4. अनुच्छेद 345 राज्य विधानमंडल को राज्य में प्रचलित किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने की शक्ति देता है। 

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल 1, 3 और 4
 B. केवल 1 और 2
 C. केवल 2, 3 और 4
 D. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: A. केवल 1, 3 और 4

व्याख्या

  • तुलु को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा दिया गया है, जिससे इसका उपयोग कन्नड़ के साथ सरकारी संचार में किया जा सकता है। अतः कथन 1 सही है
  • तुलु एक स्वतंत्र गैर-अनुसूचित भाषा है, लेकिन यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है, जिसमें वर्तमान में 22 भाषाएँ हैं। अतः कथन 2 गलत है। 
  • तिगलारी लिपि का ऐतिहासिक रूप से तुलु से संबंध है, जबकि वर्तमान में तुलु लिखने के लिए कन्नड़ लिपि का अधिक प्रयोग किया जाता है। अतः कथन 3 सही है। 
  • अनुच्छेद 345 राज्य विधानमंडल को राज्य में प्रचलित किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने की शक्ति देता है। अतः कथन 4 सही है।