मृदा स्वास्थ्य: मिट्टी की सेहत पर नज़र रखने की जरूरत
मृदा मानव सभ्यता की खाद्य, आजीविका और पारिस्थितिक सुरक्षा का आधार है। मृदा स्वास्थ्य केवल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्वों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मृदा की रासायनिक, भौतिक और जैविक गुणवत्ता शामिल होती है। भारत में Soil Health Card के माध्यम से मृदा के प्रमुख मानकों का परीक्षण किया जाता है, लेकिन मृदा में मौजूद सूक्ष्मजीवों, जैविक गतिविधि, संरचना और कार्बन की स्थिति की व्यापक निगरानी को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
मिट्टी की सेहत: व्यापक निगरानी की ज़रूरत
- मृदा मानव सभ्यता की खाद्य, आजीविका और पारिस्थितिक सुरक्षा का आधार है। स्वस्थ मृदा केवल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम की उपलब्धता का नाम नहीं है, बल्कि यह खनिज, जैविक पदार्थ, सूक्ष्मजीव, जल, वायु और भौतिक संरचना के बीच संतुलित एवं गतिशील तंत्र है। इसलिए मृदा को केवल इनपुट प्राप्त करने वाले माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखना आवश्यक है।
वर्तमान मृदा स्वास्थ्य आकलन की स्थिति
- भारत में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना 2015 में शुरू की गई थी। इसके अंतर्गत मृदा के 12 प्रमुख मानकों का परीक्षण किया जाता है। इनमें नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K), सल्फर (S), जिंक (Zn), आयरन (Fe), कॉपर (Cu), मैंगनीज (Mn), बोरॉन (B), pH, विद्युत चालकता (EC) और ऑर्गेनिक कार्बन शामिल हैं। परीक्षण के आधार पर किसानों को उर्वरक के उपयुक्त प्रयोग और मृदा-संशोधन संबंधी जानकारी दी जाती है।
- इस व्यवस्था का उद्देश्य संतुलित उर्वरक प्रयोग को बढ़ावा देना तथा मृदा में पोषक तत्वों के बेहतर प्रबंधन में सहायता करना है। सरकारी जानकारी के अनुसार, मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक सिफारिशें इनपुट लागत को कम करने और फसल उत्पादकता में सुधार करने में योगदान दे सकती हैं।
- हालाँकि, मृदा स्वास्थ्य का आकलन केवल रासायनिक उर्वरता तक सीमित नहीं होना चाहिए। आधुनिक मृदा विज्ञान मृदा की भौतिक एवं जैविक सेहत को भी महत्वपूर्ण मानता है।
- मृदा की जैविक सेहत क्यों महत्वपूर्ण है?
- मृदा में बैक्टीरिया, कवक, शैवाल, प्रोटोजोआ, केंचुए और अन्य जीव पाए जाते हैं। ये जीव पोषक तत्वों के चक्रण, जैविक पदार्थों के अपघटन, मृदा संरचना और पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- इसलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि मिट्टी में कितनी मात्रा में पोषक तत्व मौजूद हैं। यह समझना भी आवश्यक है कि मृदा में जैविक प्रक्रियाएँ इन पोषक तत्वों के चक्रण और पौधों के लिए उनकी उपलब्धता में किस प्रकार योगदान कर रही हैं।
- ऑर्गेनिक कार्बन मृदा की स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। हालांकि, केवल कुल मृदा ऑर्गेनिक कार्बन से मृदा के भीतर सक्रिय जैविक प्रक्रियाओं की पूरी तस्वीर प्राप्त नहीं होती।
वर्तमान स्थिति की प्रमुख चिंताएँ
- बड़ी संख्या में Soil Health Card नमूनों के विश्लेषण से भारतीय मृदाओं में पोषक तत्वों और ऑर्गेनिक कार्बन की कमी से संबंधित चिंताएँ सामने आई हैं। ये निष्कर्ष संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
- मृदा की गुणवत्ता में गिरावट से बाहरीकृषि इनपुट पर निर्भरता बढ़ सकती है, खेती की लागत प्रभावित हो सकती है और कृषि तंत्र की दीर्घकालिक उत्पादकता एवं जलवायु-लचीलापन कमजोर हो सकता है।
मृदा स्वास्थ्य का समग्र आकलन
- मृदा स्वास्थ्य की निगरानी में तीन प्रमुख आयामों को शामिल किया जाना चाहिए—
- रासायनिक: pH, विद्युत चालकता, NPK, सूक्ष्म पोषक तत्व और ऑर्गेनिक कार्बन।
- भौतिक: मृदा घनत्व, संरचना, जल धारण क्षमता, जल-अवशोषण और अपरदन।
- जैविक: माइक्रोबियल बायोमास, माइक्रोबियल विविधता, एंजाइम गतिविधि, केंचुआ गतिविधि और सक्रिय कार्बन।
- ऐसी समग्र व्यवस्था से मृदा की वास्तविक उत्पादक क्षमता और दीर्घकालिक प्रत्यास्थता का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा।
आगे की राह
- पहला, Soil Health Card को केवल पोषक तत्वों की सिफारिश तक सीमित रखने के बजाय व्यापक मृदा स्वास्थ्य आकलन व्यवस्था के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
- दूसरा, नियमित मृदा परीक्षण में चयनित भौतिक और जैविक संकेतकों को चरणबद्ध तरीके से शामिल किया जाना चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म, GIS, रिमोट सेंसिंग और उभरती AI आधारित तकनीकें मृदा मानचित्रण एवं निगरानी में उपयोगी हो सकती हैं।
- तीसरा, संतुलित उर्वरक प्रयोग के साथ कम्पोस्ट, हरी खाद, जैव-उर्वरक, फसल-अवशेष प्रबंधन, फसल विविधीकरण और उपयुक्त फसल चक्र जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना चाहिए।
- चौथा, कृषि अनुसंधान एवं नीतियों में मृदा जैविक पदार्थ, मृदा जैव विविधता, कार्बन अवशोषण और जलवायु-लचीली कृषि को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
- निष्कर्ष
- भारतीय कृषि का भविष्य केवल बाहरी इनपुट बढ़ाने में नहीं, बल्कि मृदा की प्राकृतिक उत्पादक क्षमता को बनाए रखने और पुनर्जीवित करने में है। स्वस्थ मृदा कृषि उत्पादकता, संसाधन दक्षता, कार्बन भंडारण और पारिस्थितिक लचीलेपन को मजबूत कर सकती है।
- इसलिए भारत को “मृदा उर्वरता” से आगे बढ़कर “मृदा स्वास्थ्य” और अंततः “मृदा पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन” की दिशा में आगे बढ़ना होगा। मृदा की रासायनिक, भौतिक और जैविक आधारभूत संरचना की रक्षा करना भविष्य की खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि के लिए आवश्यक है।
MCQ HINDI
प्रश्न. भारत में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे वर्ष 2015 में शुरू किया गया था।
2. इसके अंतर्गत pH, विद्युत चालकता और ऑर्गेनिक कार्बन जैसे मृदा मानकों का परीक्षण किया जाता है।
3. इसका आकलन केवल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम तक सीमित है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3
उत्तर: (A) केवल 1 और 2
व्याख्या:
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना वर्ष 2015 में शुरू की गई थी।
- इसके अंतर्गत N, P, K, सल्फर, विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ pH, विद्युत चालकता और ऑर्गेनिक कार्बन जैसे मानकों का परीक्षण किया जाता है।
- इसलिए इसका आकलन केवल NPK तक सीमित नहीं है।
- मृदा स्वास्थ्य की व्यापक समझ के लिए भौतिक और जैविक संकेतकों को भी महत्व देना आवश्यक है।
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