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Current Affairs - Daily 19 अक्टूबर 2026

शैव धर्म और द्रविड़ पहचान

तमिल क्षेत्र में शैव भक्ति की ऐतिहासिक परंपरा और 19वीं सदी के नव-शैव आंदोलन ने तमिल धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित किया। बाद में इन विचारों ने गैर-ब्राह्मण और द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा को भी प्रभावित किया।

खबरों में क्यों?

  • तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हाल में कहा कि द्रविड़ परंपरा में शिव और आर्य परंपरा में राम की पूजा की जाती थी।
  • इस बयान के बाद दक्षिण भारत में शैव धर्म, तमिल पहचान और द्रविड़ आंदोलन के ऐतिहासिक संबंध पर चर्चा शुरू हुई।
  • इतिहासकारों के अनुसार दक्षिण भारत का धार्मिक इतिहास “दक्षिण में शिव और उत्तर में राम” जैसे सरल विभाजन से कहीं अधिक जटिल था।

दक्षिण भारत में शैव धर्म

  • तमिल क्षेत्र में लगभग छठी शताब्दी ईस्वी से मजबूत शैव भक्ति परंपरा विकसित हुई।
  • नयनार शैव कवि-संतों ने छठी से नौवीं शताब्दी के बीच शिव भक्ति के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • चोल काल (9वीं–13वीं शताब्दी) में शैव धर्म को राजकीय संरक्षण मिला।
  • मंदिर धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक जीवन के केंद्र भी बने।
  • बाद में शैव सिद्धांत ने शैव धार्मिक दर्शन को व्यवस्थित रूप दिया और शिव को सर्वोच्च सत्ता माना।
  • हालांकि तमिल क्षेत्र में शैव धर्म के साथ बौद्ध, जैन और वैष्णव परंपराएं भी मौजूद थीं।

नव-शैव आंदोलन

  • इतिहासकार वी. रवि वैथीस के अनुसार शैव धर्म को तमिल या द्रविड़ पहचान से विशेष रूप से जोड़ने की प्रक्रिया मुख्य रूप से 19वीं शताब्दी में मजबूत हुई।
  • इस दौर में शैव, वैष्णव और वेदांत परंपराओं के बीच धार्मिक और बौद्धिक बहसें हुईं।
  • सोमसुंदर नायकर प्रारंभिक प्रमुख शैव नेताओं में थे।
  • उनके शिष्य मरैमलाई अडिगल ने तमिल शैव पहचान को और विकसित किया।
  • आंदोलन ने संस्कृत, वैदिक परंपराओं और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की आलोचना की तथा तमिल को धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का आधार बनाया।
  • अडिगल ने शुद्ध तमिल आंदोलन का भी नेतृत्व किया।

औपनिवेशिक विद्वानों की भूमिका

  • औपनिवेशिक काल के भाषायी अध्ययन ने भारतीय भाषाओं को अलग-अलग भाषा परिवारों में वर्गीकृत किया।
  • सर विलियम जोन्स ने संस्कृत और इंडो-यूरोपीय भाषाओं के संबंध पर जोर दिया।
  • 1856 में रॉबर्ट काल्डवेल ने दक्षिण भारतीय भाषाओं को एक अलग द्रविड़ भाषा परिवार के रूप में प्रस्तुत किया।
  • बाद में तमिल बुद्धिजीवियों ने इन भाषायी तर्कों का उपयोग संस्कृत-केंद्रित भारतीय इतिहास की व्याख्याओं को चुनौती देने के लिए किया।

द्रविड़ आंदोलन से संबंध

  • नव-शैव आंदोलन ने बाद के गैर-ब्राह्मण और द्रविड़ आंदोलनों की कुछ वैचारिक आधारभूमि तैयार की।
  • इनमें ब्राह्मणवादी प्रभुत्व, संस्कृत के प्रभाव और जातिगत असमानता का विरोध शामिल था।
  • ई.वी. रामासामी पेरियार के नेतृत्व वाले आत्मसम्मान आंदोलन ने आगे चलकर तर्कवाद और नास्तिकता पर अधिक जोर दिया।
  • सी.एन. अन्नादुरै ने बाद में तमिल पहचान और गैर-ब्राह्मण राजनीति के कई तत्वों को आगे बढ़ाया।

उत्तर-दक्षिण धार्मिक विभाजन की सीमा

  • भारत के धार्मिक इतिहास को केवल शैव दक्षिण और वैष्णव उत्तर में बांटना उचित नहीं है।
  • उत्तर भारत में तुलसीदास, कबीर और मीराबाई जैसे भक्तों ने राम और कृष्ण सहित वैष्णव भक्ति को लोकप्रिय बनाया।
  • दक्षिण भारत में भी वैष्णव परंपरा मजबूत रही।
  • शैव धर्म स्वयं अखिल भारतीय परंपरा थी, जिसके प्रमुख केंद्र कश्मीर, काशी और मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्रों में भी थे।
  • इसलिए किसी विशेष देवता को किसी एक क्षेत्र या जातीय समूह से जोड़ना मुख्यतः आधुनिक राजनीतिक और सांस्कृतिक निर्माण के रूप में समझा जाना चाहिए।

भक्ति आंदोलन 

  • भक्ति आंदोलन एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था, जिसने कर्मकांड और कठोर सामाजिक विभाजनों की बजाय ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति पर जोर दिया।
  • उद्भव: इसका प्रमुख विकास दक्षिण भारत में 6वीं से 9वीं शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ। आलवार (वैष्णव भक्त) और नयनार (शैव भक्त) इसके प्रारंभिक प्रमुख प्रतिनिधि थे। बाद में यह उत्तर और पश्चिम भारत में भी फैल गया।
  • प्रमुख संत: रामानुज, रामानंद, कबीर, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास और नामदेव आदि विभिन्न भक्ति परंपराओं से जुड़े प्रमुख संत थे।
  • प्रमुख विशेषताएँ:
    • ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत और भावनात्मक भक्ति पर जोर।
    • शिव और विष्णु जैसे व्यक्तिगत देवताओं की आराधना।
    • क्षेत्रीय/लोक भाषाओं में धार्मिक विचारों और साहित्य की रचना।
    • सामान्य लोगों तक धार्मिक संदेश को पहुंचाना।
    • कई संतों द्वारा कर्मकांड और जातिगत भेदभाव की आलोचना।
    • महिलाओं तथा निम्न सामाजिक समूहों सहित विभिन्न वर्गों की भागीदारी।
    • भक्ति काव्य, गीत और संगीत का विकास।
    • कुछ संतों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में घूमकर अपने विचारों का प्रचार।
  • सामाजिक प्रभाव:
    • रूढ़िवादी धार्मिक व्यवस्था में मौजूद धार्मिक अधिकार के एकाधिकार को चुनौती दी।
    • आध्यात्मिक क्षेत्र में जाति आधारित प्रतिबंधों पर प्रश्न उठाए।
    • समानता, आध्यात्मिक बंधुत्व और भक्ति के विचारों को बढ़ावा दिया।
    • क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
    • भारतीय कविता, संगीत और लोकप्रिय धार्मिक परंपराओं को प्रभावित किया।
  • भक्ति आंदोलन का कोई एक संस्थापक नहीं था। यह विभिन्न क्षेत्रों में कई संतों और कवियों के योगदान से लंबे समय में विकसित हुआ।
  • प्रमुख संत और विचार:
    • रामानुज: वैष्णव परंपरा तथा विष्णु के प्रति भक्ति से जुड़े।
    • कबीर: धार्मिक कर्मकांड और बाहरी आडंबर की आलोचना तथा निराकार ईश्वर की भक्ति पर जोर।
    • मीराबाई: कृष्ण के प्रति गहन भक्ति और भक्ति काव्य के लिए प्रसिद्ध।
    • नामदेव: महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा के महत्वपूर्ण संत।
  • उद्भव और विस्तार के प्रमुख कारण:
    • आलवार और नयनार संतों की भक्ति परंपराओं ने प्रारंभिक आधार प्रदान किया।
    • बौद्ध और जैन धर्म के प्रभाव में कमी ने नए धार्मिक आंदोलनों के लिए स्थान बनाया।
    • इस्लामी परंपराओं के साथ संपर्क ने मध्यकालीन धार्मिक वातावरण को प्रभावित किया।
    • विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक विखंडन ने भी विविध धार्मिक आंदोलनों के विकास के लिए परिस्थितियाँ प्रदान कीं।

अभ्यास प्रश्न 

प्र. भक्ति आंदोलन, शैव धर्म और द्रविड़ आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. नयनार और आलवार क्रमशः शैव और वैष्णव भक्ति परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते थे, जिनका दक्षिण भारत में 6वीं से 9वीं शताब्दी ईस्वी के बीच प्रमुख विकास हुआ। 
  2. शैव धर्म को तमिल या द्रविड़ पहचान के साथ विशेष रूप से जोड़ना प्रारंभिक मध्यकालीन भक्ति परंपरा की विशेषता थी और द्रविड़ आंदोलन के उदय तक यह स्थिति अपरिवर्तित रही। 
  3. शैव और वैष्णव परंपराओं का ऐतिहासिक प्रसार इस स्पष्ट भौगोलिक विभाजन का समर्थन करता है कि शैव धर्म मुख्यतः दक्षिण भारतीय और वैष्णव धर्म मुख्यतः उत्तर भारतीय परंपरा थी।
  4. रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा दक्षिण भारतीय भाषाओं को एक अलग द्रविड़ भाषा परिवार के रूप में वर्गीकृत करने के विचार का बाद में तमिल बुद्धिजीवियों ने संस्कृत-केंद्रित भारतीय सांस्कृतिक व्याख्याओं को चुनौती देने के लिए उपयोग किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

A. केवल 1 और 4 
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 4
D. केवल 1, 3 और 4 

उत्तर: A. केवल 1 और 3

व्याख्या

  • नयनार शैव और आलवार वैष्णव भक्त कवि-संत थे, जिन्होंने दक्षिण भारत में भक्ति परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतः कथन 1 सही है।
  • शैव धर्म को तमिल/द्रविड़ पहचान से विशेष रूप से जोड़ने की प्रक्रिया मुख्यतः 19वीं शताब्दी के नव-शैव आंदोलन के दौरान मजबूत हुई; यह प्रारंभिक मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की अपरिवर्तित विशेषता नहीं थी। अतः कथन 2 गलत है।
  • शैव धर्म की परंपरा अखिल भारतीय थी और दक्षिण भारत में भी मजबूत वैष्णव परंपराएं मौजूद थीं। इसलिए उत्तर और दक्षिण के बीच ऐसा सरल धार्मिक विभाजन ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। अतः कथन 3 गलत है।
  • रॉबर्ट काल्डवेल ने दक्षिण भारतीय भाषाओं को एक अलग द्रविड़ भाषा परिवार के रूप में प्रस्तुत किया और बाद में तमिल बुद्धिजीवियों ने इन विचारों का उपयोग संस्कृत-केंद्रित भारतीय इतिहास एवं संस्कृति की व्याख्याओं को चुनौती देने के लिए किया। अतः कथन 4 सही है।