शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय 20वीं सदी के प्रमुख बंगाली उपन्यासकार और कहानीकार थे। उनके साहित्य ने ग्रामीण बंगाल के सामाजिक जीवन, महिलाओं की स्थिति, सामाजिक असमानताओं और राष्ट्रवादी चेतना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
- शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 15 सितंबर 1876 को देबानंदपुर, हुगली, बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था।
- उनका निधन 16 जनवरी 1938 को कोलकाता में 61 वर्ष की आयु में हुआ।
- वे 20वीं सदी के प्रारंभिक दौर के सबसे प्रभावशाली बंगाली उपन्यासकारों और कहानीकारों में से एक थे।
- उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं में सामाजिक यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई और हाशिए के वर्गों के प्रति संवेदनशीलता शामिल हैं।
- उनकी रचनाओं में 19वीं सदी के भारतीय समाज, विशेषकर ग्रामीण बंगाल के सामाजिक जीवन, का संवेदनशील चित्रण मिलता है।
- उनके साहित्य में निम्नलिखित सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता मिली:
- पितृसत्ता और लैंगिक असमानता।
- जातिगत भेदभाव।
- अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़िवादिता।
- कठोर सामाजिक परंपराएं एवं प्रथाएं।
- सामाजिक असमानता और मानवीय गरिमा।
- उन्होंने महिलाओं के अनुभवों और agency/स्वायत्तता को विशेष महत्व दिया तथा विधवाओं, वेश्याओं और स्वतंत्र विचार रखने वाली महिलाओं को गरिमा और भावनात्मक गहराई के साथ चित्रित किया।
- उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में शामिल हैं:
- परिणीता (1914)
- देवदास (1917)
- श्रीकांत (1917–1933)
- चरित्रहीन (1917)
- पथेर दाबी (1926)
- बिराज बहू
- निष्कृति
- शेष प्रश्न
- पथेर दाबी (1926) में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी प्रतिरोध को चित्रित किया गया था और इसे औपनिवेशिक सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था।
- उनकी रचनाओं पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रवादी राजनीति का प्रभाव दिखाई देता है।
- शरत चंद्र का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से भी संबंध था और वे 1921 से 1936 तक हावड़ा जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहे।
- उन्होंने असहयोग आंदोलन तथा जमीनी स्तर की राजनीतिक गतिविधियों में भी भाग लिया।
- वर्ष 1903 में वे बर्मा (वर्तमान म्यांमार) चले गए और लगभग एक दशक तक रंगून में कार्य किया। इसके बाद वे 1916 में बंगाल लौटे।
प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न
प्रश्न. शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
पथेर दाबी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी प्रतिरोध से संबंधित थी और इसे औपनिवेशिक सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था।
शरत चंद्र ने हावड़ा जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के रूप में उस अवधि में कार्य किया, जब असहयोग आंदोलन का उदय हुआ।
उनकी रचनाएं मुख्यतः अभिजात्य शहरी बंगाली समाज पर केंद्रित थीं और उन्होंने जाति, पितृसत्ता तथा महिलाओं की स्वायत्तता जैसे प्रश्नों से सामान्यतः परहेज किया।
उन्होंने अपने प्रारंभिक पेशेवर जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बर्मा में बिताया और बाद में बंगाल लौटे।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b) केवल 1, 2 और 4
व्याख्या:
कथन 1, 2 और 4 सही हैं। पथेर दाबी में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी प्रतिरोध को चित्रित किया गया और इसे औपनिवेशिक सरकार ने प्रतिबंधित किया। शरत चंद्र 1921–1936 तक हावड़ा जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहे, जो असहयोग आंदोलन के काल से भी जुड़ा हुआ था। उन्होंने 1903 से बर्मा में रहकर कार्य किया और बाद में बंगाल लौटे।
कथन 3 गलत है क्योंकि उनके साहित्य में सामाजिक असमानता, पितृसत्ता, जातिगत भेदभाव और महिलाओं के अनुभवों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है।
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