भारत में अंगदान: कानून, परोपकारी अंगदान और अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था
भारत में अंगदान और प्रत्यारोपण को मुख्य रूप से मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA), 1994 के तहत नियंत्रित किया जाता है। यह व्यवस्था अंगों के व्यावसायिक लेन-देन को रोकने और निष्पक्ष अंग आवंटन सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
खबरों में क्यों?
कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में 52 वर्षीय अविवाहित व्यक्ति को अपनी एक किडनी स्वेच्छा से किसी असंबंधित व्यक्ति को दान करने की अनुमति दी।
इस मामले ने परोपकारी अंगदान से संबंधित कानूनी व्यवस्था और अंगों के व्यावसायिक कारोबार को रोकने के उपायों पर ध्यान आकर्षित किया है।
कानूनी व्यवस्था
भारत में अंगदान मुख्य रूप से मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA), 1994 द्वारा नियंत्रित होता है, जिसे 2011 में संशोधित किया गया और 2014 में संबंधित नियम बनाए गए।
यह कानून मानव अंगों और ऊतकों को निकालने, सुरक्षित रखने और प्रत्यारोपित करने को नियंत्रित करता है तथा इनके व्यावसायिक लेन-देन पर रोक लगाता है।
कौन अंगदान कर सकता है?
जीवित दाताओं को निकट संबंधी या असंबंधित व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
निकट संबंधियों में पति या पत्नी, बच्चे, पोते-पोतियां, भाई-बहन, माता-पिता और दादा-दादी शामिल हैं।
असंबंधित व्यक्ति द्वारा अंगदान के लिए प्राधिकरण समिति की मंजूरी आवश्यक होती है। समिति यह जांचती है कि दान स्वैच्छिक है और इसके पीछे कोई आर्थिक उद्देश्य नहीं है।
परोपकारी अंगदान
परोपकारी अंगदान का अर्थ है बिना धन या किसी अन्य प्रतिबंधित लाभ की अपेक्षा के अंगदान करना।
THOTA की धारा 9(3) स्नेह, लगाव या अन्य विशेष कारणों से असंबंधित व्यक्ति को अंगदान की अनुमति देती है, बशर्ते इसमें कोई व्यावसायिक लेन-देन न हो।
दाता को यह सुनिश्चित करना होता है कि उसका निर्णय दबाव, प्रलोभन या आर्थिक प्रभाव के बिना लिया गया है।
वास्तविक दान को व्यावसायिक अंग व्यापार के रूप में छिपाने के लिए झूठे दस्तावेजों का इस्तेमाल दंडनीय है।
भारत में अंगदान की व्यवस्था
भारत में तीन-स्तरीय संस्थागत व्यवस्था है:
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन(NOTTO): राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय, रजिस्ट्री और अंग आवंटन।
क्षेत्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन(ROTTO): क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय।
राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (SOTTO): राज्य स्तर पर समन्वय और प्रतीक्षा सूची।
ये संस्थाएं मिलकर राष्ट्रीय अंग प्रतीक्षा-सूची व्यवस्था को संचालित करती हैं।
अंगदान के प्रकार
जीवित अंगदान: स्वस्थ जीवित व्यक्ति द्वारा अंग या उसके किसी हिस्से का दान, जिसमें सामान्यतः किडनी या यकृत का हिस्सा दान किया जाता है।
मृतक अंगदान: कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त ब्रेन-स्टेम मृत्यु के बाद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अंग निकाले जाते हैं।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम (NOTP) का उद्देश्य प्रत्यारोपण संबंधी बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, चिकित्सा कर्मियों को प्रशिक्षित करना और मृतक अंगदान को बढ़ावा देना है।
‘वन नेशन, वन पॉलिसी’ के तहत मृतक दाता से अंग प्राप्त करने के लिए पंजीकरण में राज्य के निवास की बाध्यता और अधिकतम आयु सीमा को हटा दिया गया है।
सरकार ने भारतीय अंगदान दिवस और अंगदान महोत्सव के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने के प्रयास भी किए हैं।
प्रमुख चुनौतियां
भारत में अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है।
जीवित दान की तुलना में मृतक अंगदान अभी भी कम है।
अन्य चुनौतियों में अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्यारोपण सुविधाओं की कमी, सांस्कृतिक संकोच और ब्रेन-स्टेम मृत्यु की पहचान एवं प्रमाणन से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं।
अधिकांश प्रत्यारोपण निजी अस्पतालों में होने के कारण पहुंच और वहनीयता को लेकर भी चिंताएं हैं।
जेनोट्रांसप्लांटेशन (Xenotransplantation) में संक्रामक एजेंटों के एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में फैलने का संभावित जोखिम भी मौजूद है।
जेनोट्रांसप्लांटेशन के बारे में:
जेनोट्रांसप्लांटेशन में गैर-मानव पशुओं से प्राप्त जीवित कोशिकाओं, ऊतकों या अंगों को मनुष्य में प्रत्यारोपित किया जाता है।
इसका विकास मुख्यतः मानव अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़े अंतर के कारण हुआ है।
यह मधुमेह और न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के उपचार में भी उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, इसमें प्रजातियों के बीच संक्रमण फैलने का जोखिम रहता है।
रेट्रोवायरस विशेष चिंता का विषय हैं क्योंकि वे लंबे समय तक निष्क्रिय रहकर बाद में बीमारी पैदा कर सकते हैं।
संक्रमण मनुष्य के संपर्कों और व्यापक आबादी तक भी फैल सकता है
अभ्यास प्रश्न
भारत में अंगदान और अंग प्रत्यारोपण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
THOTA के तहत असंबंधित जीवित दाता द्वारा अंगदान प्राधिकरण समिति की मंजूरी के बाद किया जा सकता है और इसमें व्यावसायिक उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
NOTTO, ROTTO और SOTTO भारत में अंग प्रत्यारोपण एवं अंग आवंटन के समन्वय के लिए त्रि-स्तरीय संस्थागत व्यवस्था बनाते हैं।
भारत में मृतक अंगदान कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त ब्रेन-स्टेम मृत्यु के बाद निर्धारित प्रक्रियाओं के अधीन किया जा सकता है।
जेनोट्रांसप्लांटेशन में संक्रामक एजेंटों के संक्रमण का कोई जोखिम नहीं होता क्योंकि इसमें जैविक सामग्री गैर-मानव पशुओं से प्राप्त होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b)
व्याख्या
कथन 1 सही है। THOTA असंबंधित जीवित दाताओं द्वारा परोपकारी अंगदान की अनुमति देता है, जिसके लिए प्राधिकरण समिति की मंजूरी आवश्यक है और इसमें कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अतः कथन 1 सही है।
कथन 2 सही है। NOTTO राष्ट्रीय स्तर पर, ROTTO क्षेत्रीय स्तर पर और SOTTO राज्य स्तर पर अंगदान, पंजीकरण और अंग आवंटन के समन्वय का कार्य करते हैं। अतः कथन 2 सही है।
कथन 3 सही है। भारत में मृतक अंगदान कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त ब्रेन-स्टेम मृत्यु के बाद निर्धारित प्रक्रियाओं के अधीन किया जा सकता है। अतः कथन 3 सही है।
कथन 4 गलत है। जेनोट्रांसप्लांटेशन में विभिन्न प्रजातियों के बीच ज्ञात और अज्ञात संक्रामक एजेंटों के संक्रमण का जोखिम होता है, जिसमें लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले रेट्रोवायरस भी शामिल हो सकते हैं। अतः कथन 4 गलत है।
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