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Current Affairs - Daily 14 अक्टूबर 2026

अर्थव्यवस्था के स्थिरीकरण में नोबेल पुरस्कार 2026

रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड के आर्थिक शोध ने उपभोग, ब्याज दरों, महँगाई और भविष्य की अपेक्षाओं के बीच संबंधों को समझने में योगदान दिया। उनके कार्य ने आधुनिक आर्थिक स्थिरीकरण नीतियों के विकास को प्रभावित किया।

चर्चा में क्यों?

  • अर्थशास्त्र में वर्ष 2026 का नोबेल पुरस्कार रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को व्यापक अर्थव्यवस्था के स्थिरीकरण की नीतियों के सूक्ष्म आर्थिक आधारों पर उनके योगदान के लिए दिया गया है।

व्यापक आर्थिक स्थिरीकरण क्या है?

  • इसका अर्थ आर्थिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने, कीमतों में स्थिरता बनाए रखने तथा रोजगार और आर्थिक विकास को समर्थन देने के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक द्वारा किए गए उपायों से है।

  • अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स के अनुसार, जब बाजार की शक्तियाँ पर्याप्त माँग बनाए रखने में विफल रहती हैं, तब सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है।

पृष्ठभूमि: 1970 के दशक का तेल संकट

  • पारंपरिक आर्थिक मॉडल में सामान्यतः उच्च बेरोजगारी का संबंध कम महँगाई से माना जाता था। इस संबंध को फिलिप्स वक्र के माध्यम से समझाया जाता है।

  • तेल संकट के कारण उत्पादन लागत बढ़ी, आर्थिक विकास कमजोर हुआ तथा बेरोजगारी और महँगाई एक साथ बढ़ीं। इस स्थिति को मुद्रास्फीतिजनित मंदी (Stagflation) कहा जाता है।

  • अर्थशास्त्री रॉबर्ट लुकास ने बताया कि सरकारी नीतियों में बदलाव होने पर आर्थिक चरों के बीच संबंध भी बदल सकते हैं।

प्रमुख योगदान

रॉबर्ट ई. हॉल

  • हॉल ने बताया कि परिवारों का उपभोग केवल वर्तमान आय पर नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली आय की अपेक्षाओं पर भी निर्भर करता है।

  • वर्ष 1978 के उनके शोध के अनुसार, जब परिवार उपलब्ध जानकारी के आधार पर खर्च के निर्णय लेते हैं, तो उनके उपभोग में होने वाले बदलावों का पूर्वानुमान लगाना कठिन हो सकता है।

  • परिवारों की बचत करने और ऋण लेने की क्षमता में अंतर के कारण कर कटौती जैसी नीतियों का प्रभाव भी अलग-अलग हो सकता है।

माइकल वुडफोर्ड

  • वुडफोर्ड ने ऐसा ढाँचा विकसित किया, जो परिवारों के खर्च, व्यवसायों द्वारा कीमतें तय करने और केंद्रीय बैंक की नीतियों के बीच संबंध स्पष्ट करता है।

  • उनके शोध में तीन प्रमुख कारकों पर जोर दिया गया:

    • ब्याज दरें: कम ब्याज दरें ऋण और खर्च को प्रोत्साहित कर सकती हैं, जबकि ऊँची दरें माँग और महँगाई के दबाव को कम कर सकती हैं।

    • कीमतों में कठोरता: लागत या माँग बदलने पर व्यवसाय कीमतों में तुरंत बदलाव नहीं कर पाते। इससे उत्पादन और रोजगार प्रभावित हो सकते हैं।

    • भविष्य की अपेक्षाएँ: महँगाई नियंत्रित करने के प्रति केंद्रीय बैंक की प्रतिबद्धता पर जनता का विश्वास खर्च, निवेश और कीमतें तय करने के निर्णयों को प्रभावित करता है।

  • तटस्थ ब्याज दर और उत्पादन अंतराल जैसी अवधारणाएँ नीति-निर्माताओं को आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करने में सहायता करती हैं।

महत्त्व

  • उनके शोध ने न्यू कीनेसियन आर्थिक मॉडलों के विकास में योगदान दिया, जिनका उपयोग केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय करते हैं।

  • ये मॉडल आर्थिक झटकों, महँगाई के दबाव तथा मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के प्रभाव का आकलन करने में सहायक हैं।

  • प्रमुख निष्कर्ष यह है कि प्रभावी आर्थिक नीति बनाने के लिए परिवारों और व्यवसायों के व्यवहार तथा भविष्य के प्रति उनकी अपेक्षाओं को समझना आवश्यक है।

 न्यू कीनेसियन अर्थशास्त्र

  • न्यू कीनेसियन अर्थशास्त्र एक आधुनिक व्यापक आर्थिक सिद्धांत है, जो बताता है कि कीमतों और मजदूरी में बदलाव अल्पकाल में आर्थिक उतार-चढ़ाव को कैसे प्रभावित करते हैं।

  • यह जॉन मेनार्ड कीन्स के विचारों पर आधारित है तथा परिवारों और व्यवसायों के व्यवहार जैसे सूक्ष्म आर्थिक पहलुओं को भी शामिल करता है।

पृष्ठभूमि एवं विकास

  • पारंपरिक कीनेसियन अर्थशास्त्र का विकास 1930 के दशक की महामंदी के दौरान हुआ। इसमें माँग बढ़ाने और आर्थिक विकास को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी व्यय बढ़ाने तथा करों में कमी करने पर जोर दिया गया।

  • 1970 के दशक की मुद्रास्फीतिजनित मंदी, जिसमें ऊँची महँगाई और बेरोजगारी के साथ आर्थिक विकास कमजोर रहा, ने पारंपरिक आर्थिक मॉडलों की सीमाओं को उजागर किया।

  • इसके बाद अर्थशास्त्रियों ने कीमतों, मजदूरी और व्यक्तिगत आर्थिक निर्णयों के व्यापक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का अध्ययन करने वाले नए दृष्टिकोण विकसित किए।

प्रमुख विशेषताएँ

  • कीमतों और मजदूरी में कठोरता: माँग और आपूर्ति में बदलाव होने पर कीमतें तथा मजदूरी हमेशा तुरंत नहीं बदलतीं।

  • बाजार की अपूर्णताएँ: अपूर्ण प्रतिस्पर्धा और बाजार की अन्य विफलताओं के कारण अर्थव्यवस्था हमेशा कुशल परिणाम प्राप्त नहीं कर पाती।

  • सरकार की भूमिका: आर्थिक मंदी के दौरान सार्वजनिक व्यय बढ़ाने जैसे सरकारी उपाय माँग और रोजगार को समर्थन दे सकते हैं।

  • परिवारों एवं व्यवसायों का व्यवहार: उपभोग, निवेश और कीमतें निर्धारित करने से जुड़े निर्णय आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।

  • सूचना की सीमाएँ: अधूरी या असमान जानकारी आर्थिक निर्णयों को प्रभावित कर सकती है और कीमतों में बदलाव को धीमा कर सकती है।

महत्त्व एवं सीमाएँ

  • वर्ष 1990 के दशक से न्यू कीनेसियन मॉडल मौद्रिक नीति और आर्थिक स्थिरीकरण की रणनीतियों को प्रभावित करते रहे हैं।

  • ये मॉडल समझने में सहायता करते हैं कि ब्याज दरें, महँगाई संबंधी अपेक्षाएँ और कीमतों में कठोरता आर्थिक विकास तथा रोजगार को कैसे प्रभावित करती हैं।

  • वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने बड़े वित्तीय संकटों का पूर्वानुमान लगाने में मौजूदा मॉडलों की क्षमता पर सवाल उठाए।

  • परिवारों और व्यवसायों के हमेशा तर्कसंगत व्यवहार करने तथा आर्थिक बदलावों पर अनुमानित प्रतिक्रिया देने की धारणा की भी आलोचना की गई है।

 

मुद्रास्फीतिजनित मंदी (Stagflation)

  • मुद्रास्फीतिजनित मंदी वह आर्थिक स्थिति है, जिसमें उच्च महँगाई, धीमा आर्थिक विकास और उच्च बेरोजगारी एक साथ मौजूद होते हैं।

  • इस शब्द का प्रयोग 1960 के दशक में शुरू हुआ और 1970 के दशक के तेल संकट के दौरान यह व्यापक रूप से प्रचलित हुआ।

  • इसे नियंत्रित करना कठिन होता है, क्योंकि महँगाई कम करने के उपाय आर्थिक विकास को और धीमा कर सकते हैं तथा बेरोजगारी बढ़ा सकते हैं।

मुद्रास्फीतिजनित मंदी के कारण

  • आपूर्ति संबंधी झटके: कच्चे तेल जैसे आवश्यक संसाधनों की कीमतों में अचानक वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ती है और आर्थिक उत्पादन घट सकता है।

  • नीतिगत गलतियाँ: राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच उचित समन्वय न होने से पर्याप्त आर्थिक विकास के बिना महँगाई बढ़ सकती है।

  • आयात शुल्क में वृद्धि: आयात पर अधिक शुल्क लगाने से आयातित वस्तुओं और उत्पादन में प्रयुक्त कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है, जिससे कीमतें बढ़ती हैं और माँग कमजोर पड़ सकती है।

अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न. न्यू कीनेसियन अर्थशास्त्र, व्यापक आर्थिक स्थिरीकरण और मुद्रास्फीतिजनित मंदी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. रॉबर्ट ई. हॉल के शोध के अनुसार, परिवारों का उपभोग भविष्य की आय संबंधी अपेक्षाओं पर निर्भर करता है तथा उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिए गए निर्णयों के कारण उपभोग में होने वाले बदलावों का पूर्वानुमान कठिन हो सकता है।

  2. न्यू कीनेसियन ढाँचे में कीमतों की कठोरता के कारण माँग में गिरावट का प्रभाव कीमतों में तत्काल आनुपातिक कमी के बजाय उत्पादन और रोजगार में गिरावट के रूप में सामने आ सकता है।

  3. लुकास की आलोचना के अनुसार, सरकारी नीतियों में बदलाव के बाद भी आर्थिक चरों के बीच ऐतिहासिक संबंधों को अपरिवर्तित माना जा सकता है।

  4. मुद्रास्फीतिजनित मंदी के दौरान केंद्रीय बैंक के सामने नीतिगत दुविधा हो सकती है, क्योंकि महँगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने से आर्थिक विकास और कमजोर हो सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2 
(b) केवल 1, 2 और 4 
(c) केवल 2, 3 और 4 
(d) केवल 1, 3 और 4

उत्तर: (b) 

व्याख्या

  • रॉबर्ट ई. हॉल के शोध ने परिवारों के उपभोग संबंधी निर्णयों में भविष्य की आय की अपेक्षाओं के महत्त्व को स्पष्ट किया। उपलब्ध जानकारी निर्णयों में शामिल होने के कारण उपभोग में होने वाले बदलावों का पूर्वानुमान कठिन हो सकता है। अतः कथन 1 सही है।

  • कीमतों में कठोरता का अर्थ है कि माँग में बदलाव होने पर व्यवसाय कीमतों में तुरंत संशोधन नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, माँग घटने पर उत्पादन और रोजगार में गिरावट आ सकती है। अतः कथन 2 सही है।

  • लुकास की आलोचना के अनुसार, सरकारी नीतियों में बदलाव होने पर आर्थिक चरों के बीच संबंध भी बदल सकते हैं। इसलिए ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर नई नीतियों के प्रभावों का विश्वसनीय पूर्वानुमान हमेशा संभव नहीं होता। अतः कथन 3 गलत है।

  • मुद्रास्फीतिजनित मंदी के दौरान ब्याज दरों में वृद्धि महँगाई को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है, लेकिन इससे ऋण, निवेश और आर्थिक गतिविधियाँ घट सकती हैं तथा बेरोजगारी बढ़ सकती है। अतः कथन 4 सही है।