2025 में लगातार चौथे वर्ष वैश्विक ग्लेशियरों का शुद्ध द्रव्यमान ह्रास
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार 2025 में सभी प्रमुख ग्लेशियर क्षेत्रों में लगातार चौथे वर्ष शुद्ध द्रव्यमान हानि दर्ज की गई। वैश्विक ग्लेशियरों ने लगभग 408 ± 132 गीगाटन द्रव्यमान खोया, जिसका समुद्र-स्तर वृद्धि में लगभग 1.1 ± 0.4 मिलीमीटर योगदान रहा।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की State of Global Water Resources 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2025 लगातार चौथा वर्ष रहा जब विश्व के प्रत्येक प्रमुख हिमाच्छादित क्षेत्र में ग्लेशियरों के द्रव्यमान में शुद्ध कमी दर्ज की गई।
अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के जलवैज्ञानिक वर्ष के दौरान दुनिया के ग्लेशियरों ने लगभग 408 ± 132 गीगाटन द्रव्यमान खोया, जो लगभग 1.1 ± 0.4 मिलीमीटर वैश्विक समुद्र-स्तर वृद्धि के बराबर है।
ग्लेशियरों का लगातार सिकुड़ना जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ वैश्विक मीठे जल संसाधनों और जल-चक्र में हो रहे बदलाव का महत्वपूर्ण संकेतक है।
ग्लेशियर लंबे समय तक संचित हिम से बनने वाले बर्फ के विशाल पिंड हैं, जो अपने भार के कारण धीरे-धीरे प्रवाहित होते हैं। इनके स्वास्थ्य का आकलन ग्लेशियर के द्रव्यमान संतुलन यानी Mass Balance से किया जाता है।
यह एक निश्चित अवधि में ग्लेशियर में जमा होने वाली बर्फ और पिघलने, उर्ध्वपातन तथा अन्य प्रक्रियाओं से होने वाली बर्फ की हानि के बीच का अंतर है। जब संचय हानि सेअधिक होता है तो द्रव्यमान संतुलन सकारात्मक होता है, जबकि हानि अधिक होने पर यह नकारात्मक हो जाता है। लंबे समय तक नकारात्मक द्रव्यमान संतुलन ग्लेशियर के पीछे हटने और उसमें संचित मीठे जल की मात्रा में कमी का संकेत देता है।
WMO के अनुसार, 2000 से 2025 के बीच पर्वतीय ग्लेशियरों ने अपने बर्फ द्रव्यमान का लगभग 6.2 प्रतिशत खो दिया। 1990 के दशक से लगभग सभी क्षेत्रों में बर्फ की हानि बढ़ी है और 2000 के बाद इसमें काफी तेजी आई।
इसका प्रमुख कारण यह है कि कई क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान होने वाला हिम-पिघलन सर्दियों में होने वाले हिम-संचय से लगातार अधिक रहा है। वैश्विक स्तर पर दर्ज सात सबसे बड़ी वार्षिक ग्लेशियर द्रव्यमान हानियों में से छह पिछले सात वर्षों में हुई हैं।
ग्लेशियरों के द्रव्यमान ह्रास का प्रमुख व्यापक कारण मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन से जुड़ी तापमान वृद्धि है। तापमान बढ़ने से सतही हिम-पिघलन तेज होता है।
कई क्षेत्रों में वर्षा और हिमपात के स्वरूप में बदलाव के कारण ऐसी नमी, जो पहले बर्फ के रूप में जमा होती थी, अब वर्षा के रूप में गिर सकती है। इससे ग्लेशियर में नए हिम के संचय में कमी आती है और द्रव्यमान संतुलन नकारात्मक होता जाता है।
बर्फ और हिम पर जमा Black Carbon या कालिख भी स्थानीय स्तर पर पिघलने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है।
गहरे रंग के ये कण बर्फ की Albedo यानी परावर्तन क्षमता को कम करते हैं और अधिक सौर विकिरण के अवशोषण को बढ़ाते हैं। इसके अलावा, हिमपात में कमी, अत्यधिक गर्मी, वर्षा के बदलते स्वरूप और क्षेत्रीय मौसम पैटर्न में परिवर्तन भी ग्लेशियरों के द्रव्यमान संतुलन को प्रभावित करते हैं।
ग्लेशियर प्राकृतिक मीठे जल भंडार के रूप में महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से पर्वतीय और शुष्क क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान ग्लेशियरों से निकलने वाला पिघला हुआ जल नदी प्रवाह में योगदान करता है।
तेजी से पिघलने की शुरुआती अवस्था में नदियों में अतिरिक्त जल उपलब्ध हो सकता है, लेकिन ग्लेशियर के आकार में लगातार कमी आने पर भविष्य में उपलब्ध बर्फ का भंडार भी घटता जाता है।
इसी संदर्भ में Peak Water की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ उस अवस्था से है जब ग्लेशियर के पिघलने से नदी में मिलने वाला जल अपने अधिकतम स्तर पर पहुंच जाता है और उसके बाद ग्लेशियर के लगातार सिकुड़ने के साथ दीर्घकालीन जल-प्रवाह घटने लगता है।
WMO के अनुसार, काकेशस, पश्चिमी कनाडा और अमेरिका तथा मध्य यूरोप के कुछ क्षेत्रों में Peak Water की स्थिति पहुंचने के संकेत मिले हैं।
भारत के लिए ग्लेशियरों का महत्व विशेष है क्योंकि हिमालय क्षेत्र सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों से जुड़ा है।
हिमालयी ग्लेशियरों और हिम-संचय में बदलाव का प्रभाव मौसमी नदी प्रवाह, कृषि, जलविद्युत, पारिस्थितिकी और downstream समुदायों पर पड़ सकता है। अल्पकाल में तेजी से हिम-पिघलन से अधिक जल प्रवाह और बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि दीर्घकाल में ग्लेशियरों के सिकुड़ने से शुष्क मौसम में उपलब्ध जल की मात्रा प्रभावित हो सकती है।
High Mountain Asia के लिए स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। WMO की State of the Climate in Asia 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के ग्लेशियोलॉजिकल वर्ष में इस क्षेत्र के निगरानी किए गए सभी 23 ग्लेशियरों में द्रव्यमान हानि दर्ज की गई।
इसके प्रमुख कारणों में औसत से अधिक तापमान और सर्दियों में औसत से कम हिम-संचय शामिल रहे। High Mountain Asia में अधिकांश ग्लेशियर पिछले कई दशकों से पीछे हट रहे हैं और 1990 के दशक के मध्य से इस प्रक्रिया में तेजी आई है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने से आपदा जोखिम भी बढ़ सकता है। ग्लेशियरों के पिघलने से हिमानी झीलों का विस्तार हो सकता है। यदि किसी झील का प्राकृतिक अवरोध या मोरेन बांध टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में जल नीचे की ओर आ सकता है।
इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है। इससे पर्वतीय बस्तियों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। WMO ने 2025 में High Mountain Asia में कई GLOF और ग्लेशियर ढहने की घटनाओं का उल्लेख किया है।
ग्लेशियरों के पिघलने से वैश्विक समुद्र-स्तर में भी वृद्धि होती है। 2025 में ग्लेशियरों से हुई लगभग 408 ± 132 गीगाटन द्रव्यमान हानि समुद्र-स्तर में लगभग 1.1 ± 0.4 मिलीमीटर वृद्धि के बराबर थी। हालांकि पर्वतीय ग्लेशियरों को Greenland और Antarctica की विशाल Ice Sheets से अलग समझना आवश्यक है, क्योंकि इनके आकार, भौगोलिक स्वरूप और द्रव्यमान संतुलन की प्रक्रियाएँ अलग होती हैं।
ग्लेशियरों की निगरानी के लिए मैदानी सर्वेक्षण के साथ उपग्रह आधारित Remote Sensing, Digital Elevation Models, GPS और अन्य वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। भारत के लिए ग्लेशियरों और हिमानी झीलों की नियमित निगरानी, संभावित GLOF क्षेत्रों का जोखिम मानचित्रण तथा प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली महत्वपूर्ण हैं।
साथ ही, हिमालयी देशों के बीच वैज्ञानिक और जलविज्ञान संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान आपदा जोखिम को कम करने में उपयोगी हो सकता है।
ग्लेशियर ह्रास की दीर्घकालीन चुनौती से निपटने के लिए जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों पर कार्रवाई के साथ अनुकूलन उपायों को भी मजबूत करना आवश्यक है।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, Black Carbon जैसे अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों में कमी, ग्लेशियर और हिमानी झीलों की निगरानी, GLOF पूर्व चेतावनी प्रणाली, जल-संसाधन प्रबंधन, जोखिम आधारित भूमि-उपयोग नियोजन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
2025 में लगातार चौथे वर्ष वैश्विक ग्लेशियरों में शुद्ध द्रव्यमान हानि यह दर्शाती है कि ग्लेशियरों का परिवर्तन केवल हिम और बर्फ से जुड़ा विषय नहीं है।
इसका संबंध जल सुरक्षा, कृषि, ऊर्जा, जैव-विविधता, आपदा जोखिम और समुद्र-स्तर वृद्धि से भी है। भारत के लिए हिमालयी ग्लेशियरों की निरंतर वैज्ञानिक निगरानी और जलवायु अनुकूलन क्षमता को मजबूत करना विशेष महत्व रखता है।
MCQ Hindi
प्रश्न. वैश्विक ग्लेशियर द्रव्यमान ह्रास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 2025 लगातार चौथा वर्ष था, जब सभी प्रमुख हिमाच्छादित क्षेत्रों में ग्लेशियरों की शुद्ध द्रव्यमान हानि दर्ज की गई।
2. 2025 के जलवैज्ञानिक वर्ष में वैश्विक ग्लेशियरों ने लगभग 408 ± 132 गीगाटन द्रव्यमान खोया।
3. 2025 में ग्लेशियर द्रव्यमान हानि लगभग 1.1 ± 0.4 मिलीमीटर वैश्विक समुद्र-स्तर वृद्धि के बराबर थी।
4. 2025 के ग्लेशियोलॉजिकल वर्ष में High Mountain Asia के सभी 23 निगरानी किए गए ग्लेशियरों में द्रव्यमान वृद्धि हुई।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1, 2 और 3
B. केवल 1 और 4
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2, 3 और 4
उत्तर: A
व्याख्या: WMO के अनुसार, 2025 लगातार चौथा वर्ष था जब सभी प्रमुख हिमाच्छादित क्षेत्रों में शुद्ध द्रव्यमान हानि दर्ज की गई। वैश्विक ग्लेशियरों ने लगभग 408 ± 132 गीगाटन द्रव्यमान खोया, जो लगभग 1.1 ± 0.4 मिलीमीटर समुद्र-स्तर वृद्धि के बराबर था। High Mountain Asia में निगरानी किए गए सभी 23 ग्लेशियरों ने 2025 में द्रव्यमान खोया था, इसलिए कथन 4 गलत है।
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