दिल्ली उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति
दिल्ली उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति के संदर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 224 के प्रमुख प्रावधानों को दर्शाता इन्फोग्राफिक। इसमें अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति का आधार, अधिकतम दो वर्ष का कार्यकाल और संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद शामिल हैं।
चर्चा में क्यों?
5 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने गुरविंदर पाल सिंह को दिल्ली उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया। यह नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की गई। यह घटनाक्रम उच्च न्यायालयों में न्यायिक रिक्तियों तथा बढ़े हुए कार्यभार से निपटने के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
संवैधानिक प्रावधान
उच्च न्यायालयों में अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 224 में किया गया है।
अनुच्छेद 224(1) के अनुसार, यदि किसी उच्च न्यायालय के कार्यभार में अस्थायी वृद्धि हो या न्यायाधीशों के पदों पर अस्थायी रिक्तियां हों, तो राष्ट्रपति योग्य व्यक्तियों को अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकते हैं।
अनुच्छेद 224(2) के अनुसार, अतिरिक्त न्यायाधीश का कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जाता है, लेकिन यह दो वर्ष से अधिक नहीं हो सकता। अतिरिक्त या कार्यवाहक न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु के बाद पद पर नहीं रह सकते।
अतिरिक्त न्यायाधीशों की आवश्यकता
अतिरिक्त न्यायाधीशों की व्यवस्था मुख्य रूप से न्यायिक कार्यभार में अस्थायी वृद्धि और अस्थायी रिक्तियों से निपटने के लिए की गई है। इससे उच्च न्यायालयों की न्यायिक क्षमता बढ़ाने और लंबित मामलों के निस्तारण में सहायता मिल सकती है।
नियुक्ति प्रक्रिया
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सामान्यतः संबंधित उच्च न्यायालय का कॉलेजियम नामों की सिफारिश करता है।
इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के समक्ष आता है। अंतिम औपचारिक नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीश में अंतर
अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति उच्च न्यायालय के कार्यभार में अस्थायी वृद्धि या न्यायाधीशों के पदों पर अस्थायी रिक्तियों की स्थिति में की जाती है।
वहीं, कार्यवाहक न्यायाधीश की नियुक्ति तब की जा सकती है जब मुख्य न्यायाधीश के अलावा कोई न्यायाधीश अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो।
दोनों का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 224 है।
संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद
अनुच्छेद 217: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति एवं पद की शर्तें।
अनुच्छेद 223: उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति।
अनुच्छेद 224: अतिरिक्त एवं कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति।
अनुच्छेद 224A: उच्च न्यायालय में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को बैठने और कार्य करने के लिए आमंत्रित करने का प्रावधान।
MCQ – Hindi
प्रश्न: उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीशों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 224 में है।
उच्च न्यायालय के कार्यभार में अस्थायी वृद्धि होने पर अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते हैं।
अतिरिक्त न्यायाधीश का कार्यकाल दो वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(A) केवल 1
(B) केवल 1 और 2
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3
उत्तर: (D) 1, 2 और 3
व्याख्या: संविधान का अनुच्छेद 224 उच्च न्यायालयों में अतिरिक्त एवं कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। अस्थायी रूप से बढ़े हुए कार्यभार या अस्थायी रिक्तियों की स्थिति में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते हैं और उनका कार्यकाल दो वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।
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