Current Affairs - Daily
14 अक्टूबर 2026
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा त्वचा रोगों का खतरा: वैश्विक अध्ययन
एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन त्वचा रोगों की व्यापकता और गंभीरता को प्रभावित कर रहा है। निम्न आय वाले देशों में इसका प्रभाव अधिक देखा गया है।
चर्चा में क्यों?
- 136 देशों में किए गए एक वैश्विक अध्ययन ने त्वचा के स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को उजागर किया है।
- इस अध्ययन के निष्कर्ष सितंबर 2026 में ऑस्ट्रिया के वियना में आयोजित यूरोपियन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी (EADV) कांग्रेस में प्रस्तुत किए गए।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- वैश्विक प्रभाव: सर्वेक्षण में शामिल लगभग 42.6% देशों ने जलवायु परिवर्तन के कारण त्वचा रोगों की व्यापकता या गंभीरता में बदलाव की सूचना दी।
- आय के आधार पर अंतर: निम्न आय वाले 55.6% और निम्न-मध्यम आय वाले 52.5% देशों ने ऐसे बदलावों की सूचना दी। उच्च-मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा 43.8% और उच्च आय वाले देशों में 28.3% था।
- क्षेत्रीय अंतर: पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक 64.7% प्रभाव दर्ज किया गया। इसके बाद पूर्वी भूमध्यसागरीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों में 60%-60% प्रभाव दर्ज हुआ। यूरोप में यह आंकड़ा 16.1% था।
- त्वचा रोगों के प्रकार: जलवायु परिवर्तन से प्रभावित 58 देशों में से 81% ने घमौरियों, 75.9% ने सूजन संबंधी त्वचा रोगों और 62.1% ने संक्रामक त्वचा रोगों में वृद्धि की सूचना दी।
- वाहक-जनित रोग: इनमें से आधे देशों ने मच्छरों और किलनी जैसे वाहकों से फैलने वाले रोगों में बदलाव की जानकारी दी।
जलवायु परिवर्तन त्वचा के स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है?
- बढ़ता तापमान और आर्द्रता: अधिक पसीना आने और त्वचा में जलन के कारण कुछ त्वचा रोगों की स्थिति बिगड़ सकती है।
- वायु प्रदूषण: पर्यावरण में मौजूद प्रदूषक त्वचा में सूजन पैदा कर सकते हैं या उसे बढ़ा सकते हैं।
- वर्षा के बदलते स्वरूप: तापमान और वर्षा में बदलाव से रोग फैलाने वाले जीवों के रहने योग्य क्षेत्रों का विस्तार हो सकता है।
- अधिक आर्द्रता: शोध के अनुसार, अधिक नमी त्वचा में मौजूद सूक्ष्मजीवों के संतुलन को प्रभावित कर सकती है और सोरायसिस नामक सूजन संबंधी त्वचा रोग के दोबारा उभरने में योगदान दे सकती है।
निम्न आय वाले देश अधिक संवेदनशील क्यों हैं?
- इन देशों में अक्सर अत्यधिक गर्मी और वर्षा के बदलते स्वरूप का सामना करना पड़ता है, जबकि वैश्विक जलवायु परिवर्तन में उनका योगदान अपेक्षाकृत कम है।
- स्वास्थ्य सेवाओं, त्वचा रोग विशेषज्ञों और दवाओं तक सीमित पहुंच के कारण रोगों की रोकथाम और उपचार कठिन हो जाता है।
- अगस्त 2026 में JAMA Dermatology में प्रकाशित एक अध्ययन ने अफ्रीका में त्वचा रोग विशेषज्ञों की गंभीर कमी को रेखांकित किया। पूरे महाद्वीप में प्रति दस लाख लोगों पर तीन से भी कम त्वचा रोग विशेषज्ञ हैं।
आगे की राह
- जलवायु से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं की निगरानी और अनुसंधान को मजबूत करना।
- जन-जागरूकता बढ़ाना और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करना।
- स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रोगों की रोकथाम और उपचार की रणनीतियां विकसित करना।
- जलवायु अनुकूलन योजनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों में त्वचा के स्वास्थ्य को शामिल करना।
वेक्टर-जनित रोग क्या हैं?
- वेक्टर-जनित रोग ऐसे संक्रमण हैं जो वायरस, बैक्टीरिया या परजीवियों के कारण होते हैं और संक्रमित जीवित वाहकों यानी वेक्टर के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंचते हैं।
- प्रमुख वेक्टरों में मच्छर, किलनी, पिस्सू, सैंडफ्लाई, जूं और ट्से-ट्से मक्खियां शामिल हैं।
- संक्रमण सामान्यतः संक्रमित वेक्टर के काटने से फैलता है।
- कई वेक्टरों का प्रजनन और प्रसार तापमान, वर्षा और जलवायु परिस्थितियों से प्रभावित होता है।
- ये रोग मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं और कमजोर तथा गरीब आबादी को अधिक प्रभावित कर सकते हैं।
- समय पर उपचार न मिलने पर ये रोग गंभीर बीमारी या मृत्यु का कारण बन सकते हैं।
प्रमुख उदाहरण
- मच्छर: मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जीका, पीला बुखार, फाइलेरियासिस, जापानी इंसेफेलाइटिस और वेस्ट नाइल फीवर।
- ट्से-ट्से मक्खियां: अफ्रीकी ट्रिपैनोसोमियासिस।
- सैंडफ्लाई: लीशमैनियासिस (काला-जार)।
- किलनी (Ticks): लाइम रोग, टिक-जनित इंसेफेलाइटिस, क्रीमियन-कांगो हेमोरेजिक फीवर, रिलैप्सिंग फीवर और रिकेट्सियल रोग।
- जूं: टाइफस और जूं-जनित रिलैप्सिंग फीवर।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. जलवायु परिवर्तन, त्वचा स्वास्थ्य और वेक्टर-जनित रोगों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से संबंधित त्वचा रोगों में बदलाव की सूचना देने वाले देशों का अनुपात यूरोपीय क्षेत्र से अधिक था।
- जलवायु संबंधी प्रभावों की सूचना देने वाले देशों में त्वचा के संक्रामक रोगों की तुलना में हीट रैश में वृद्धि अधिक सामान्य थी।
- तापमान और वर्षा में जलवायु संबंधी बदलाव रोग फैलाने वाले वेक्टरों के आवास को प्रभावित कर सकते हैं।
- वेक्टर-जनित रोग केवल परजीवियों के कारण होते हैं और केवल मच्छरों तथा किलनी के माध्यम से फैलते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 4
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 3
(d) केवल 2, 3 और 4
उत्तर: (c) केवल 1, 2 और 3
व्याख्या
- कथन 1 सही है। पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में 64.7% देशों ने त्वचा रोगों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की सूचना दी, जबकि यूरोपीय क्षेत्र में यह केवल 16.1% था।
- कथन 2 सही है। जलवायु संबंधी प्रभावों की सूचना देने वाले 58 देशों में 81% ने हीट रैश में वृद्धि बताई, जबकि 62.1% ने संक्रामक त्वचा रोगों में बदलाव की सूचना दी।
- कथन 3 सही है। तापमान और वर्षा में बदलाव मच्छरों और किलनी जैसे वेक्टरों के आवास तथा वितरण को प्रभावित कर सकते हैं और इस प्रकार वेक्टर-जनित रोगों के प्रसार को बदल सकते हैं।
- कथन 4 गलत है। वेक्टर-जनित रोग वायरस, बैक्टीरिया या परजीवियों के कारण हो सकते हैं तथा इनके वाहकों में मच्छर, किलनी, पिस्सू, सैंडफ्लाई, जूं और ट्से-ट्से मक्खियां शामिल हैं। इसलिए “केवल” शब्द कथन को गलत बनाता है।