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Current Affairs - Daily 26 सितमबर 2026

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को सामाजिक समानता के आंदोलन में कैसे बदला?

डॉ. बी.आर. आंबेडकर का बौद्ध धर्म अपनाना केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि जातिगत असमानता और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध समानता, गरिमा और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को सामाजिक समानता के आंदोलन में कैसे बदला?

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को केवल धार्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, नैतिकता और मानवीय गरिमा पर आधारित सामाजिक एवं नैतिक व्यवस्था के रूप में देखा। उनका बौद्ध धर्म अपनाना जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध उनके व्यापक संघर्ष से जुड़ा था।

  • धर्म से सामाजिक परिवर्तन की ओर: आंबेडकर धर्म को एक नैतिक और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का माध्यम मानते थे। उन्होंने बौद्ध सिद्धांतों को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व से जोड़ा।
  • जाति-व्यवस्था की आलोचना: आंबेडकर ने जाति-व्यवस्था की कड़ी आलोचना की और इसे क्रमबद्ध असमानता (graded inequality) की व्यवस्था माना। वे ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहते थे जिसमें व्यक्ति की सामाजिक स्थिति जन्म से निर्धारित न हो।
  • बौद्ध धर्म क्यों? आंबेडकर बौद्ध धर्म के समानता, तर्क, करुणा और नैतिक आचरण से संबंधित विचारों से प्रभावित थे। उनका मानना था कि बौद्ध धर्म मानवीय गरिमा पर आधारित समाज के लिए नैतिक आधार प्रदान कर सकता है।
  • “मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूँगा”: 1935 में येवला में आंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वे हिंदू के रूप में जन्मे हैं, लेकिन हिंदू के रूप में मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे। यह उनके वैकल्पिक धार्मिक और सामाजिक पहचान की खोज में एक महत्वपूर्ण चरण था।
  • 1956 में नागपुर में धर्म परिवर्तन: 14 अक्टूबर 1956 को आंबेडकर ने नागपुर के दीक्षाभूमि में बड़ी संख्या में अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया।
  • 22 प्रतिज्ञाएँ: धर्म परिवर्तन समारोह के दौरान आंबेडकर ने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाईं। इन प्रतिज्ञाओं में जातिगत पदानुक्रम से जुड़ी मान्यताओं और प्रथाओं को अस्वीकार करने तथा बौद्ध मार्ग के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
  • नवयान बौद्ध धर्म: आंबेडकर की बौद्ध धर्म की व्याख्या को सामान्यतः नवयान या “नया यान” बौद्ध धर्म कहा जाता है। इसमें सामाजिक नैतिकता, मानवीय गरिमा, नैतिक आचरण और मुक्ति पर विशेष जोर दिया गया।
  • बौद्ध धर्म और लोकतंत्र: आंबेडकर ने बौद्ध नैतिक सिद्धांतों को लोकतांत्रिक मूल्यों, विशेषकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व, से जोड़ा।
  • नैतिक समुदाय के रूप में धर्म: आंबेडकर के अनुसार धर्म को नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना चाहिए, न कि जन्म के आधार पर असमानता को वैध ठहराना चाहिए।
  • सामाजिक समानता का उद्देश्य: उनका बौद्ध आंदोलन अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और सामाजिक अपमान के विरुद्ध संघर्ष से जुड़ा था तथा अनुयायियों को गरिमा पर आधारित वैकल्पिक सामूहिक पहचान प्रदान करता था।
  • संवैधानिक संबंध: समानता और गरिमा पर आंबेडकर का जोर संविधान के मूल्यों से भी जुड़ता है, जैसे कानून के समक्ष समानता, भेदभाव का निषेध और अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन।

मुख्य परीक्षा प्रश्न 

प्रश्न: “आंबेडकर का बौद्ध धर्म अपनाना केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि समानता, गरिमा और बंधुत्व के आधार पर सामाजिक संबंधों के पुनर्निर्माण का प्रयास था।” चर्चा कीजिए।

MCQ HINDI

प्रश्न. डॉ. बी.आर. आंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. आंबेडकर ने 1956 में नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म अपनाया।
  2. उनके धर्म परिवर्तन समारोह में 22 प्रतिज्ञाओं का विशेष महत्व था।
  3. आंबेडकर की बौद्ध धर्म की व्याख्या को सामान्यतः नवयान कहा जाता है।
  4. आंबेडकर जाति आधारित वंशानुगत सामाजिक पदानुक्रम को बौद्ध सामाजिक नैतिकता के अनुरूप मानते थे।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(A) केवल 1, 2 और 3
(B) केवल 1 और 4
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (A) केवल 1, 2 और 3

व्याख्या:

  • आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म अपनाया।
  • धर्म परिवर्तन समारोह में उनके अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाई गईं।
  • आंबेडकर की विशिष्ट बौद्ध व्याख्या को सामान्यतः नवयान कहा जाता है।
  • आंबेडकर जाति आधारित वंशानुगत सामाजिक पदानुक्रम के आलोचक थे और समानता तथा मानवीय गरिमा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के समर्थक थे।