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30 सितमबर 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हुक्का सेवाओं पर लगाई रोक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक स्थानों पर निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में भी व्यावसायिक हुक्का सेवाओं को प्रतिबंधित कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में रेस्टोरेंट्स में हुक्का सेवाओं पर लगाई रोक
चर्चा में क्यों?
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि उत्तर प्रदेश के रेस्टोरेंट सार्वजनिक स्थानों पर बनाए गए निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों (Designated Smoking Areas) में भी हुक्का सेवा नहीं दे सकते।
- यह फैसला हुक्का सेवा जारी रखने की अनुमति मांगने वाले रेस्टोरेंट्स की 81 याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
- इस अधिकार को किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने के अधिकार के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
- कोर्ट ने माना कि रेस्टोरेंट में हुक्का उपलब्ध कराना Prohibition of Smoking in Public Places Rules, 2008 के नियम 4(3) का उल्लंघन है।
- निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र केवल धूम्रपान की अनुमति का सीमित अपवाद है। इसे रेस्टोरेंट द्वारा धूम्रपान संबंधी व्यावसायिक सेवाएं देने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
- कोर्ट ने निम्न तरीकों से प्रतिबंध से बचने के तर्क को भी खारिज किया:
- ग्राहकों को स्वयं हुक्का इस्तेमाल करने देना
- हुक्का उपकरण किराए पर देना
- धूम्रपान क्षेत्र के बाहर हुक्का तैयार करना या उपलब्ध कराना
फैसले का महत्व
- कोर्ट के अनुसार ग्राहक के लिए हुक्का तैयार करना, जोड़ना, पहुंचाना, जलाना, दोबारा भरना या उसका रखरखाव करना सेवा प्रदान करना माना जाएगा।
- कोर्ट ने 2017 में नियम 4(3) में किए गए बदलाव को महत्वपूर्ण माना, जिससे निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में सेवाएं देने पर प्रतिबंध और स्पष्ट हुआ।
- कोर्ट ने कहा कि खाद्य विभाग या नगर निकाय उत्तर प्रदेश में हुक्का बार चलाने के लिए अलग से लाइसेंस जारी नहीं कर सकते।
- COTPA, 2003 के तहत नियमों के उल्लंघन पर तलाशी, जब्ती और दंड जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
व्यापक संदर्भ
- भारत ने 2004 में WHO Framework Convention on Tobacco Control (WHO FCTC) को स्वीकार किया था।
- कोर्ट ने गुजरात, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों द्वारा हुक्का बार पर कड़े प्रावधानों का भी उल्लेख किया।
- यह फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य, मौलिक अधिकारों और व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन के मुद्दे को सामने लाता है।
अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार के बारे में:
- अनुच्छेद 21 संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12–35) में दिया गया मौलिक अधिकार है। यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है।
- मूल पाठ: “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा।”
- यह नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों पर लागू होता है।
- राज्य किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- ‘जीवन’ का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है।
- ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ में निजता, आवागमन और आजीविका जैसी विभिन्न स्वतंत्रताएं शामिल हैं।
विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया बनाम विधि की सम्यक प्रक्रिया
- विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law):
- यदि राज्य किसी विधिवत बनाए गए कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्य करता है, तो जीवन या स्वतंत्रता को सीमित किया जा सकता है।
- इसकी अवधारणा जापान के संविधान से जुड़ी है।
- विधि की सम्यक प्रक्रिया (Due Process of Law):
- इसमें न्यायालय यह भी देख सकता है कि कानून और उसकी प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत है या नहीं।
- यह अवधारणा अमेरिकी संविधान से जुड़ी है।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978): सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को व्यापक बनाया और कहा कि जीवन या स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए।
महत्वपूर्ण संवैधानिक विकास
- 42वां संशोधन (1976): आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों से संबंधित प्रावधानों को प्रभावित किया।
- 44वां संशोधन (1978): आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 की सुरक्षा को मजबूत किया।
- 86वां संशोधन (2002): अनुच्छेद 21A जोड़ा गया, जिसके तहत 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
अनुच्छेद 21 से जुड़े प्रमुख अधिकार
न्यायिक व्याख्या के माध्यम से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत कई अधिकार विकसित हुए हैं:
- निजता का अधिकार
- आजीविका का अधिकार
- स्वास्थ्य का अधिकार
- आश्रय का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- स्वच्छ वायु और जल का अधिकार
- हिरासत में मृत्यु और यातना से सुरक्षा
- विचाराधीन कैदियों की सुरक्षा
- मनमानी हथकड़ी और एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार
- मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. अनुच्छेद 21 और उत्तर प्रदेश में हुक्का सेवाओं के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ वायु में सांस लेने के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के एक पहलू के रूप में मान्यता दी गई है।
- सार्वजनिक स्थान पर निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र किसी प्रतिष्ठान को धूम्रपान से संबंधित व्यावसायिक सेवाएं प्रदान करने की अनुमति देता है, बशर्ते धूम्रपान उसी क्षेत्र तक सीमित हो।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या का विस्तार करते हुए कहा कि जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए।
- अनुच्छेद 21 केवल भारतीय नागरिकों को उपलब्ध है, जबकि अनुच्छेद 19 नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b) केवल 1 और 3
व्याख्या
- सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ वायु में सांस लेने का अधिकार न्यायालयों द्वारा अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार के व्यापक अर्थ के अंतर्गत माना गया है। अतः कथन 1 सही है।
- निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान के सामान्य प्रतिबंध का एक सीमित अपवाद है। यह रेस्टोरेंट को हुक्का या अन्य धूम्रपान संबंधी व्यावसायिक सेवाएं प्रदान करने की अनुमति नहीं देता। अतः कथन 2 गलत है।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को व्यापक बनाया और कहा कि जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए। अतः कथन 3 सही है।
- अनुच्छेद 21 में “No person” का प्रयोग हुआ है, इसलिए यह नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को संरक्षण प्रदान करता है। अतः कथन 4 गलत है।
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