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14 अक्टूबर 2026
मद्रास उच्च न्यायालय में दो अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त
राष्ट्रपति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद धर्मलिंगम लिंगेश्वरन और बालतण्डयुतम कार्तिकेयन को मद्रास उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया है।
चर्चा में क्यों?
- भारत के राष्ट्रपति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से परामर्श के बाद धर्मलिंगम लिंगेश्वरन और बालतण्डयुतम कार्तिकेयन को मद्रास उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया है।
उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीशों के बारे में
- संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224(1) उच्च न्यायालयों में अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- उद्देश्य: उच्च न्यायालय में मामलों का बोझ अस्थायी रूप से बढ़ने या लंबित मामलों की संख्या अधिक होने पर अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते हैं।
- कार्यकाल: अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए की जा सकती है।
- आयु सीमा: अतिरिक्त न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद पद पर नहीं रह सकता।
- नियुक्ति प्रक्रिया: नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया के अंतर्गत की जाती है, जिसमें संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों से परामर्श शामिल होता है।
- स्थायी रिक्तियां: अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का उद्देश्य अस्थायी रूप से बढ़े कार्यभार और लंबित मामलों का समाधान करना है। नियुक्ति की सिफारिश करते समय स्थायी रिक्तियों की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से संबंधित अन्य संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 216: उच्च न्यायालयों के गठन का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 217: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और सेवा की शर्तों से संबंधित है।
- अनुच्छेद 223: उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 224(2): आवश्यकता पड़ने पर कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 224A: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध करने की अनुमति देता है।
महत्व
- अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से उच्च न्यायालयों को बढ़ते कार्यभार को संभालने और मामलों के निपटारे में होने वाली देरी कम करने में सहायता मिल सकती है।
- समय पर नियुक्तियां न्याय तक पहुंच और न्यायिक दक्षता को मजबूत करती हैं।
- हालांकि, केवल नियुक्तियों से लंबित मामलों की समस्या समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढांचे, सहायक कर्मचारियों और प्रभावी मुकदमा प्रबंधन की भी आवश्यकता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और कॉलेजियम प्रणाली
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), संबंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती है।
कॉलेजियम प्रणाली:
- न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की यह व्यवस्था संसद के किसी अधिनियम या संविधान के स्पष्ट प्रावधान के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से विकसित हुई है।
कॉलेजियम प्रणाली का विकास:
- प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): परामर्श को सहमति नहीं माना गया, जिससे कार्यपालिका को प्राथमिकता मिली।
- द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993): कॉलेजियम प्रणाली स्थापित हुई और न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका को प्राथमिकता दी गई।
- तृतीय न्यायाधीश मामला (1998): स्पष्ट किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों के लिए CJI चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करेंगे।
- उच्च न्यायालय कॉलेजियम: संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश नियुक्तियों की सिफारिश की प्रक्रिया शुरू करते हैं।
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC): 99वें संविधान संशोधन, 2014 के माध्यम से कॉलेजियम के स्थान पर NJAC लाने का प्रयास किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में न्यायिक स्वतंत्रता के आधार पर इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।
- प्रमुख आलोचनाएँ: पारदर्शिता की कमी, पक्षपात के आरोप, न्यायिक रिक्तियां, महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की कमी।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. भारत में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और कॉलेजियम प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अनुच्छेद 224(1) उच्च न्यायालय में कार्यभार की अस्थायी वृद्धि या लंबित मामलों के निपटारे के लिए अधिकतम दो वर्ष की अवधि हेतु अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- प्रथम न्यायाधीश मामले (1981) में सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली स्थापित करते हुए यह निर्णय दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।
- तृतीय न्यायाधीश मामले (1998) में स्पष्ट किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों के लिए CJI को चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करना होगा।
- 99वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा स्थापित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में संवैधानिक घोषित किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 4
(d) केवल 1, 3 और 4
उत्तर: (b) केवल 1 और 3
व्याख्या
- कथन 1 सही है। अनुच्छेद 224(1) उच्च न्यायालय में कार्यभार की अस्थायी वृद्धि या लंबित मामलों के निपटारे के लिए अधिकतम दो वर्ष की अवधि हेतु अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- कथन 2 गलत है। प्रथम न्यायाधीश मामले (1981) में कार्यपालिका को प्राथमिकता दी गई थी। कॉलेजियम प्रणाली द्वितीय न्यायाधीश मामले (1993) के बाद विकसित हुई।
- कथन 3 सही है। तृतीय न्यायाधीश मामले (1998) में स्पष्ट किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों के लिए CJI को चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों वाले कॉलेजियम से परामर्श करना होगा।
- कथन 4 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में NJAC को न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था।